नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में गंभीर रूप से बीमार लोगों की इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत को मान्यता दे दी है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने शुक्रवार (9 मार्च) को ये फैसला सुनाया। लगभग 35 साल से कोमा में पड़ी मुंबई की नर्स अरुणा शानबॉग को इच्छा मृत्यु देने से सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में इनकार कर दिया था।

क्या है मामला ?
इस बारे में अदालत में एक याचिका दायर हुई थी। इसमें मरणासन्न व्यक्ति के इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को मान्यता देने की मांग की गई थी। ‘लिविंग विल’ एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। इच्छा मृत्यु के लिए मरणासन्न व्यक्ति को इलाज देना बंद कर दिया जाता है।

याचिका में क्या दलील दी गई थी ?
संविधान पीठ ने साल 2017 के अक्टूबर महीने में इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा था। एनजीओ कॉमन कॉज ने याचिका में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। केंद्र सरकार ने याचिका पर कहा था कि इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न का सपॉर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।

कैसे तय हो कि ठीक नहीं हो सकता मरीज
याचिका पर अदालत ने सवाल किया कि आखिर यह कैसे तय होगा कि मरीज ठीक नहीं हो सकता? इस पर एनजीओ के वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि ऐसा डॉक्टर तय कर सकते हैं। अब तक कोई कानून न होने की वजह से मरीज को जबरन लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर रखा जाता है।