• प्रिया गौड़

एक दिन सुबह-सुबह मेरे कलीग के पास एक कॉल आती है। वो कॉल उनके जिगरी दोस्त की थी। उन्होंने मेरे कलीग को बताया कि उनकी लड़की एक इंग्लिश मीडियम स्‍कूल में क्लास 5 में पढ़ती है। उन्हें उसका सेक्शन बदलवाना था और उसके लिए क्‍लास टीचर को अंग्रेजी में एक एप्लीकेशन देनी थी। इसके लिए वो मेरे कलीग से मदद मांग रहे थे। बहरहाल, मेरे कलीग ने उन्‍हें एप्‍लीकेशन लिखकर दिया और उनकी बेटी का सेक्‍शन बदल गया।

आपको बता दें कि जिस शख्स ने मेरे कलीग के पास एप्लीकेशन लिखवाने के लिए फ़ोन किया था, उन्होंने जर्नलिज्म में एमए किया है और उनकी पत्नी ने एमएससी किया है वो भी फर्स्‍ट क्लास। इसके बावजूद ये दंपति अंग्रेजी में एक एप्लीकेशन तक नहीं लिख पाए। आप ये सोच रहे होंगे कि मैं आपसे ये सारी बातें क्यों कह रही हूं?

वास्‍तव में न जाने कितने ऐसे माँ-बाप हैं, जो अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ा जरूर रहे हैं लेकिन वो खुद उस माहौल में एडजस्‍ट नहीं कर पाते हैं। इसकी वजह से उनमें हीन भावना पैदा हो जाती है और उसके चलते न तो वो अपने बच्चों के बीच कंफर्ट हो पाते हैं और न ही उनके स्कूल में। यही कारण है कि अब बड़ी संख्‍या में पेरेंट्स इंग्लिश सीखने के लिए आगे आ रहे हैं।

क्या कहते हैं लखनऊ के टीचर

लखनऊ के किड जी स्कूल की नर्सरी क्लास की टीचर तूलिका श्रीवास्‍तव का कहना है कि हर पेरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चों की स्टार्टिंग अच्छी हो, लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि बच्चों को स्कूल वाला एनवायरमेंट घर पर नहीं मिल पाता है। बच्‍चों को स्कूल में जो होम वर्क दिया जाता है, पेरेंट्स उसे पूरा करने में सहज नहीं महसूस नहीं करते हैं। कई बार तो चीजें ठीक से पता न होने के कारण अभिभावक बच्चे को गलत बता देते हैं। इसका गलत असर बच्चे पर तो पड़ता ही है, साथ ही पेरेंट्स को भी बच्चे के सामने शर्मिंदा होना पड़ता है।

हर एज ग्रुप के लोग सीखने आ रहे इंग्लिश : दीप्ति

जब इस बारे में हमने अलीगंज, लखनऊ के इंग्लिश स्पीकिंग कोचिंग इंस्‍टीट्यूट ‘मेटामोर्फ्स’ की डायरेक्‍टर दीप्ति अग्रवाल से पूछा कि केवल इंग्लिश में कमजोर स्टूडेंट ही आपके यहां इंग्लिश सीखने आते हैं या फिर कुछ पेरेंट्स भी, तो उन्होंने बताया कि उनके वहां हर एज ग्रुप के लोग इंग्लिश सीखने के लिए आते हैं। उन्‍होंने बताया कि इधर बीते कुछ सालों से हाउस वाइफ भी इंग्लिश सीखने और बोलने में काफी रुचि दिखा रही हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि वो अपना कॉन्फिडेंस बढ़ाना चाहती हैं। वे खुद को इस लायक बनाना चाहती हैं कि वो अपने बच्चों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें और उनके साथ एडजस्‍ट कर सकें।

क्या कहते हैं लखनऊ के पेरेंट्स

सनी टोयोटा कम्पनी में मैनेजर नितिन गौड़ ग्रेजुएट हैं। उन्‍होंने बताया कि हाल ही में वे अपने बेटे का एडमिशन कराने स्टेला मैरी स्‍कूल गए थे। वहां पर बच्चों के इंटरव्यू के साथ पेरेंट्स का भी इंटरव्यू हो रहा था। स्कूल की टीचर इंग्लिश में बात कर रही थीं। जो पेरेंट्स इंग्लिश में इंटरव्यू नहीं दे पा रहे थे, उनके बच्चे को रिजेक्ट कर दिया जा रहा था, भले ही बच्चे का इंटरव्यू अच्‍छा हुआ हो। उन्‍होंने बताया कि इंग्लिश मीडियम स्‍कूलों का यह मानना है कि अगर पेरेंट्स इंग्लिश में कंफर्टेबल नहीं हैं तो बच्चे को अच्छी गाइडेंस नहीं मिल पाएगी।