• ज्ञानपीठ, साहित्‍य अकादमी समेत कई पुरस्‍कारों से नवाजे गए, साहित्‍य जगत में शोक की लहर

नई दिल्‍ली। हिंदी के प्रतिष्ठित कवि केदारनाथ सिंह का 84 वर्ष की आयु में सोमवार (19 मार्च) को दिल्ली में निधन हो गया। हिन्दी की समकालीन कविता और आलोचना के सशक्त हस्ताक्षर और अज्ञेय के तीसरा तार सप्तक के प्रमुख कवि डॉ. केदारनाथ सिंह को पेट में संक्रमण की शिकायत के बाद एम्स में भर्ती कराया गया था। उन्होंने अस्‍पताल में ही रात करीब 8.45 बजे अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्‍कार मंगलवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट में किया जाएगा।

डेढ़ महीने से थे बीमार

उनके पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि डॉ. केदारनाथ सिंह को करीब डेढ़ माह पहले कोलकाता में निमोनिया हो गया था। इसके बाद से ही वह बीमार चल रहे थे। डॉ. केदारनाथ सिंह के परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां हैं। उनकी पत्‍नी का निधन कई साल पहले हो गया था। डॉ. केदारनाथ सिंह के निधन से साहित्‍य जगत में शोक की लहर फैल गई।

बलिया जिले के चकिया में हुआ जन्‍म

केदारनाथ सिंह का जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में हुआ था। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि हासिल की। गोरखपुर में उन्होंने कुछ दिन हिंदी पढ़ाई और जवाहर लाल विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा विभाग के अध्यक्ष पद से रिटायर हुए।

लंबी कविता ‘बाघ’ है मील का पत्‍थर

उन्होंने कई कविता संग्रह लिखे। उनके प्रमुख कविता संग्रहों में – ‘अभी बिल्कुल अभी’, ‘जमीन पक रही है’, ‘टॉलस्टॉय और साइकिल’, ‘अकाल में सारस’, ‘यहां से देखो’, ‘बाघ’, ‘उत्तर कबीर और अन्य कविताएं’, ‘सृष्टि पर पहरा’ शामिल हैं। जटिल विषयों पर बेहद सरल और आम भाषा में लेखन उनकी रचनाओं की विशेषता रही। उनकी सबसे प्रमुख लंबी कविता ‘बाघ’ है। इसे मील का पत्थर कहा जाता है।

कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया

केदारनाथ सिंह के प्रमुख लेखों में ‘मेरे समय के शब्द’, ‘कल्पना और छायावाद’, ‘हिंदी कविता बिंब विधान’ और ‘कब्रिस्तान में पंचायत’ शामिल हैं। इसके अलावा उन्‍होंने ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएं, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका) और शब्द (अनियतकालिक पत्रिका) का उन्होंने संपादन भी किया।

ज्ञानपीठ समेत कई प्रतिष्ठि‍त सम्‍मान मिले

केदारनाथ सिंह को उन्हें मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले थे। उन्हें हिंदी के सबसे बड़े सम्मान ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

उनकी कविताओं में बार-बार आते हैं गांव और शहर

यह कहना काफ़ी नहीं होगा कि केदारनाथ सिंह की काव्‍य-संवेदना का दायरा गांव से शहर तक है, या यूं कहें कि कि वे एक साथ गांव के भी कवि हैं तथा शहर के भी। दरअसल, केदारनाथ पहले गांव से शहर आते हैं फिर शहर से गांव, और इस यात्रा के क्रम में गांव के चिह्न शहर में और शहर के चिह्न गांव में ले जाते हैं। इस आवाजाही के चिह्नों को पहचानना कठिन नहीं है। बहुत कुछ नागार्जुन की ही तरह केदारनाथ के कविता की भूमि भी गांव की है। हालांकि दोआब के गांव-जवार, नदी-ताल, पगडंडी-मेड़ से बतियाते हुए केदारनाथ न तो अज्ञेय की तरह बौद्धिक होते हैं और न प्रगतिवादियों की तरह भावुक। केदारनाथ सिंह बीच का या बाद का बना रास्‍ता तय करते हैं। कवि यह विवेक शहर से लेता है, परंतु अपने अनुभव की शर्त पर नहीं, बिल्‍कुल चौकस होकर। केदारनाथ सिंह की कविताओं में जीवन की स्‍वीकृति है, परंतु तमाम तरलताओं के साथ यह आस्तिक कविता नहीं है।