अखबारनवीस राजीव मित्‍तल और मार्केटिंग प्रोफेशनल सुश्री अनुपम वर्मा ने संयुक्‍त रूप से एक किताब लिखी है – ‘हमनवा ’। इस किताब की खासियत है कि इसमें कुछ भी काल्‍पनिक नहीं है। यह फेसबुक पर शुरू हुए आभासी रिश्‍ते के हकीकत की दहलीज पर पहुंचने की अनोखी कहानी है। साहित्‍य जगत में एक अनूठा प्रयोग है ‘हमनवा ’। इसी नायाब प्रयोग पर राजधानी लखनऊ के प्रबुद्धजनों से चर्चा करने के लिए शुक्रवार शाम (27 अक्‍टूबर, 2017) निरालानगर स्थित अनुराग लाइब्रेरी में दोनों रचनाकार रू-ब-रू हुए। राजीव मित्‍तल ने इस मौके पर पुस्‍तक के कुछ अंश भी पढ़े। प्रस्‍तुत है दीपाली अग्रहरि की रिपोर्ट –    

यूँ तो जुकरबर्ग ने फेसबुक का ईजाद दुनिया के अलग-अलग देशों के लोगों,  विभिन्‍न रूप-रंग के इंसानों को एक मंच पर इकट्ठा करने के मकसद से किया था और ऐसा विरले ही देखने में आता है कि सोशल मीडिया पर जन्म लेने वाला इंसानों का आभासी रिश्ता बहुत अधिक फलता-फूलता हो और अपने बरगद तुल्य घनत्व से दो वास्तविक ज़िन्‍दगियों और उनके आसपास के पूरे माहौल को अपने प्रभाव में ले लेता हो। लेकिन राजीव मित्तल और अनुपम वर्मा की किताब ‘हमनवा’ इस फेसबुकिया आभासी जिंदगी से वास्तविक सचाई तक का दुर्लभ और अद्वितीय सफ़रनामा है।

निरालानगर स्थित अनुराग लाइब्रेरी में शुक्रवार को अपनी किताब ‘हमनवा’ पर चर्चा करते राजीव मित्तल और सुश्री अनुपम वर्मा

‘हमनवा’ अनोखा बहीखाता है फेसबुक अकाउंट पर अपनी ही तरह का खेल खेलने वाले दो फेसबुकियों का, जिनका एक-दूसरे से कभी कोई वास्ता नहीं था। दोनों भौतिक रूप से कभी आमने-सामने मिले भी नहीं थे। उनका परिवेश, शिक्षा, दिलचस्पी और महत्‍वाकांक्षा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं। उम्र भी मेल नहीं खाती थी। राजीव मित्तल 60 बरस के हैं और अनुपम वर्मा महज़ 30 बरस की, और दोनों की फेसबुकिया अकड़ दर्शनीय थी।

लेकिन इत्तिफाक से इन दोनों के बीच सआदत हसन मंटो की रूह ऐसी पैठ गई कि उसने इनसे दोस्ती के करार पर हस्ताक्षर करा लिये। मंटो ऐसी इकलौती दिलचस्पी थी जिसने फक्कड़ राजीव मित्तल को सलाहकार की भूमिका दी और तुनकमिजाज अनुपम वर्मा अपनी इस इंस्टेंट बेइज्जती को तब तक के लिए पी गईं, जबतक राजीव ने उनके साथ मंटो से जुड़ी तमाम मालूमात और तजुर्बे बाँट नही लिये थे। पर जैसे-जैसे एक के बाद एक पायदान वो चढ़ते गए, वैसे-वैसे दोनों के बीच मंटोधर्मी बंधुता ने अपनी जगह बना ली।

घर से बाहर की दुनिया का भरा-पूरा अनुभव राजीव मित्तल के पास था। राजीव एक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं पर उनके भीतर अलग तरह की सनक सांस लेती है। वहीं अपने पीछे एक भरा-पूरा मार्केटिंग का प्रोफाइल लिये हुए अनुपम के सामने राजीव के किसी भी मत की ख्वारी के आसार अमूमन हुआ करते थे। वजह दोनों का निजी अहं और विजयप्राप्ति की चेष्टा थी।

किताब की शुरुआत फेसबुक पोस्ट से ही होती है, जो दोनों एक-दूसरे के लिए लिखते हैं। दोनों ही अलग-अलग वक्त में, अलग-अलग परिस्थिति से गुजरे थे और एक-दूसरे को समझने के लिए वे आँखें चुंधिया देने वाले अपने-अपने सच पोस्ट के जरिये रखते हैं। बेहद ईमानदारी और हिम्मत के साथ दोनों अपने जीवन में आए दबे-ढके गुनाह सरीखे किरदारों और घटनाओं का जिक्र करते हैं। एक तरह से यह किताब उनके जीवन की महरूमियों और ख्वाहिशों का कच्चा चिट्ठा कही जा सकती है, जो प्राइवेट और पर्सनल होने के बावजूद यूनिवर्सल है।

भाषाई तौर से या विषय वस्तु की नज़र से यह किताब बेजोड़ नमूना है। इसमें वर्णित किरदारों को उनकी सहमति के साथ असल नामों से ही प्रस्तुत किया गया है। एक तरह से हिन्दी की दुनिया की तमाम कसौटियों और तर्कों के परे जाकर ‘हमनवा’ साहित्य समाज की सर्जरी का काम करती है। शायद ‘हमनवा’ लगभग हर किरदार और घटना के जरिए पाठक को खुद के स्याह पहलू का आकलन करने का मौका देती है।

पर अंततः हमनवा एक प्रेम कथा है। एक ऐसी प्रेम कहानी, जो आभासी तौर से शुरू होकर वास्तविक और रूहानी क्लाईमैक्स पर पहुंचती है। किताब में दोनों लेखकों ने खुलकर एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम को स्वीकार किया है और उसकी व्यापक दशा को हमेशा-हमेशा के लिए दस्तावेज बनाकर उस साहित्य को साकार कर दिया है, जो कहीं से परोक्ष, धुँधला या अस्पष्ट नहीं है।