• लोक आस्‍था का महापर्व है छठ, चारों दिन का है खास महत्‍व 

हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को पर्वों की माला कहा जाता है। पांच दिन तक चलने वाला यह पर्व सिर्फ भैयादूज तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व छठ तक चलता है। खासकर बिहार, झारखंड और साथ ही उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला यह पर्व बेहद अहम है जो नेपाल और मॉरीशस में भी धूमधाम से मनाया जाता है। छठ का यह पर्व कुल चार दिन तक चलता है। कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली मनाने के 6 दिन बाद कार्तिक शुक्ल षष्‍ठी को मनाए जाने के कारण इसे छठ कहा जाता है।

कैसे हुई छठ पूजा की शुरुआत

कथा के अनुसार, प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा और उनकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गईं। नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ। संतान शोक में उन्‍होंने आत्महत्या का मन बना लिया, लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की, उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।

देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्‍ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्‍ठी तिथि के दिन देवी षष्‍ठी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा।

वहीं, पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूय यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। सीता ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव की पूजा की थी।एक मान्यता के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। कथा के मुताबिक, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था।

कौन हैं छठी माता

षष्ठी मां यानी छठ माता बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्ट‍ि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है। इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। वो बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। इनकी प्रार्थना से बच्चे को स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।

मान्यता है कि छठ देवी सूर्यदेव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर (तालाब) के किनारे यह पूजा की जाती है।

36 घंटे निर्जला रहती हैं स्त्रियां

चार दिनों का यह व्रत दुनिया के सबसे कठिन व्रतों में से एक है। यह व्रत बड़े नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। व्रती अपने हाथ से ही सारा काम करती हैं। नहाय-खाय से लेकर सुबह के अर्घ्य तक व्रती पूरे निष्ठा का पालन करती हैं। भगवान सूर्य के लिए 36 घंटों का निर्जला व्रत स्त्रियां इसलिए रखती हैं ताकि उनके सुहाग और बेटे की रक्षा हो सके। वहीं, भगवान सूर्य धन, धान्य, समृद्धि आदि प्रदान करते हैं।

व्रत का पहला दिन नहाय खाय

पहला दिन ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। घर की सफाई के बाद छठ व्रती स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन व्रती कद्दू, लौकी, दूधी की सब्जी, चने की दाल, और अरवा चावल का भात खाती हैं।

व्रत का दूसरा दिन खरना

खरना, छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। खरना का मतलब है पूरे दिन का उपवास। व्रती व्‍यक्ति इस दिन जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करता। शाम होने पर गन्ने का जूस या गुड़ के चावल या गुड़ की खीर का प्रसाद बना कर बांटा जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

व्रत का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य

इस दिन शाम को सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्य षष्ठी को छठ पूजा का तीसरा दिन होता है। पूरे दिन के उपवास के बाद शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। तीसरे दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ और चावल के लड्डू बनाते हैं। शाम को बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है। सभी छठव्रती तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है।

व्रत का चौथा दिन उषा अर्घ्य

चौथे दिन की सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर लोक आस्था के महापर्व छठ का समापन करते हैं।

इन गीतों को गाने से प्रसन्न होती हैं छठ माता

कहते हैं कि छठ माता के गीत गाने और सुनने से छठी माता सारे कष्ट दूर करती हैं और सुखी जीवन का आशीर्वाद देती हैं। देखें वीडियो


ऋग्वेद में भी है उल्‍लेख

ऋग्वेद में देवता के रूप में सूर्यवंदना का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में कहा गया है – ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ अर्थात सूर्य जगत की आत्मा, शक्ति व चेतना है।’ महाभारत में सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सूर्यदेव की पूजा का उल्लेख मिलता है। द्रौपदी भी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य उपासना करती थीं, जिसका प्रमाण धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

डेढ़ लाख वर्ष पुराना सूर्य मंदिर बिहार में

बिहार के औरंगाबाद जिले के देव में स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर अनोखा है। औरंगाबाद से 18 किलोमिटर दूर देव स्थित सूर्य मंदिर करीब सौ फीट ऊंचा है। किंवदंती है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में किया था। देश का यह एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है, जिसका दरवाजा पश्चिम की ओर खुलता है। यह मंदिर काले और भूरे पत्थरों की नायाब शिल्पकारी से बना ओड़िशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से मिलता-जुलता है। मंदिर के निर्माणकाल के संबंध में मंदिर के बाहर लगे एक शिलालेख पर ब्राह्मी लिपि में लिखित और संस्कृत में अनूदित एक श्लोक के मुताबिक मंदिर का निर्माण 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेता युग के बीत जाने के बाद इला-पुत्र पुरुरवा ऐल ने आरंभ करवाया। शिलालेख से पता चलता है कि सन् 2017 ईस्वी में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल को 1 लाख 50 हजार 17 वर्ष पूरे हो गए हैं।

सूर्य देव को जल चढ़ाते वक़्त न करें ये गलती. पढ़ें ये लिंक : http://the2ishindi.com/?p=9295