• जिन्दगी के भागमभाग में छूटती जा रही परम्पराओं से नवजात बच्चों की मां को लांग टर्म नुकसान

परम्‍पराएं ! कुछ तो हमें जीना सिखाती हैं तो कुछ अन्धविश्वास। ऐसी ही कुछ परम्पराएं मां और नवजात बच्चे से जुड़ी हैं। हर धर्म के लोगों में डिलीवरी के बाद कई मान्यताएं और परम्पराएँ हैं, लेकिन बदलते समाज और जीविका की लड़ाई में आज की जननी खुद को कहाँ पाती है इस पर खोजबीन की the2is.com की रिपोर्टर दीपाली अग्रहरि ने। क्या अल्फ़ा और ओमेगा नाम से पहचानी जाने वाली आज की लड़कियां खुद को परम्पराओं से जोड़ कर रख पा रही हैं या उन्हें छोड़ बैठी हैं? क्या सभी परम्‍पराएं सही थीं? या गलत?  

वैसे तो हर धर्म में माना जाता है कि प्रसव के बाद मां को ज्‍यादा से ज्‍यादा आराम करना चाहिए और कामकाज कम करना चाहिए। विशेषज्ञों का भी मानना है कि कुछ परम्पराएं तो बहुत सही हैं। मसलन, प्रसव के बाद मां को कितने दिन घर में ही रहना चाहिए, इस बारे में देश में अलग-अलग मान्‍यताएं हैं। उत्‍तर, पश्चिमी और दक्षिण भारत के ज्‍यादातर हिस्‍सों में 40 दिन तो दक्षिण भारत में तो यह प्रतिबन्ध 60 दिन तक रहता है। वहां तो अगर कोई भी बाहर से आता है तो मां व नवजात शिशु के पास जाने से पहले घुटने तक पैर और कोहनी तक हाथ धोने होते हैं। यह सब बच्चे और माँ को संक्रमण से बचाने के लिए ही हैं।

हालांकि आज कुछ मदर्स को नौकरी पर जाना होता है तो कुछ न्यूक्लियर फैमिली चला रही हैं। कई पुराने जमाने की बात कहकर इन परम्‍पराओं को नहीं मानतीं।

आंख मूंदकर कुछ भी करना सही नहीं : फराह खान
शो ‘लिप सिंग – बैटल’ के प्रोमोशन के लिए लखनऊ आईं फिल्म निर्देशक फराह खान कहती हैं – ‘आज महिलाएं बहुत अच्छी जगह पर हैं जहाँ वो मॉडर्न भी हैं और ट्रेडिशनल भी। उनमें इन दोनों का मिक्स ऑफ काफी अच्छा है, लेकिन वेस्टर्न में वो सिर्फ मॉडर्न बनकर रह गई हैं और ट्रेडिशन भूल गई है। ये बात अच्छी लगती है कि लोग परम्‍पराओं को रिस्पेक्ट देते हैं, लेकिन मैंने अपनी डिलीवरी के बाद कोई रीचुअल्स फॉलो नहीं किए थे। मेरी मम्मी ने भी कभी मुझे नहीं बताया क्योंकि वो खुद भी इतनी ट्रेडिशनल नहीं हैं। बस इतना कहना चाहूंगी कि अगर उनमें कोई साइंटिफिक रीजन है तो उसे मानें वरना आंख मूंदकर कुछ भी करना सही नहीं है।’

लखनऊ ह्यूमन एम्पावर फाउंडेशन की प्रेसिडेंट नेहा तिवारी एक सोशल वर्कर होने के साथ–साथ दो बच्चों की मां भी हैं। उनका कहना है कि जो बातें मेरे और मेरे बच्चे के स्वास्‍थ्‍य से जुड़ी थीं, सिर्फ उन्हें ही माना।

लखनऊ की दीप्ति सिंह बताती हैं कि उनकी लड़की बिना एसी के नहीं सो पाती और एसी में सोने से उसे बार–बार सर्दी हो जाती है। दीप्ति का कहना है कि सीढ़ी न चढ़ना, भारी सामान न उठाना यही फॉलो किया, जो डॉक्टर ने कहा था। आजकल के पेरेंट्स अपनी सुविधा के अनुसार ही परम्‍पराओं को मानते हैं। मैंने खुद इतने नियम नहीं माने क्योंकि उनका कोई मतलब नहीं है।

स्‍त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सुनीता चंद्रा बताती हैं कि जो रीचुअल्स आपकी हेल्थ से जुड़े हैं, उन्हें फॉलो करना जरूरी है। जैसे, बेड रेस्ट करना, भारी सामान न उठाना, सीढियां न चढ़ना इत्‍यादि। वहीं डॉ. रेनू मक्कड़ का कहना है कि कुछ नियम साइंटिफिक हैं, जिन्‍हें फॉलो करना जरूरी है। डॉ स्मिता सिंह (न्यूट्रिशनिस्ट) बताती हैं कि शरीर को जितना ज्यादा हो सके आराम दें और खाने में पौष्टिक आहार लें।

क्‍या कहते हैं डॉक्टर- (डॉ. रेनू मक्कड़, डॉ. सुनीता चंद्रा और डॉ. स्मिता)

क्या हैं परम्पराएं? क्या कहते हैं विशेषज्ञ 
45 दिन तक बाहर जाने की मनाही डिलीवरी नार्मल हो या सीजेरियन, बॉडी को पूरा रेस्ट चाहिए। आप बाहर जा सकते हैं लेकिन खुद को खूब आराम दें और हाइजेनिक रहें।
45 दिन तक किचन में नहीं जा सकती इसका कोई साइंटिफिक रीजन नहीं है।
हरीरा, सोंठ के लड्डू, पंजीरी खाना चाहिए बहुत सही परंपरा है। इनमें बहुत पोषण होता है। इससे मां के स्‍तनों में दूध उतरने में भी मदद मिलती है।
नए कपड़े न पहनना कपड़े कोई भी हों, बस साफ़ होने चाहिए। नए कपड़ों को भी अच्छे से धो कर पहनना चाहिए।
भारी सामान न उठाना, सीढ़ी न चढ़ना ये बिलकुल सही है। डिलीवरी नार्मल हो या सीजेरियन, अगर मां ऐसा करती है तो बच्चेदानी और नीचे खिसक जाती है और टांके टूट सकते हैं।
कमरे में लोबान और कंडे का धुआं करना बहुत गलत है। सिर्फ कमरा साफ़ होना चाहिए। धुएं से मां को खांसी हो सकती है, जिसका असर टांके पर पड़ सकता है, या ऑक्सीजन की कमी से बच्चे की मौत भी हो सकती है।
सिर पर हमेशा तेल रखे रहना तेल की तासीर गर्म होती है जो ठण्ड से बचाता है व बाल गिरने से रोकता है।
शरीर की तेल से मालिश प्रसव के बाद तेल मालिश बहुत फायदेमंद है। इससे शरीर को पुरानी अवस्‍था में लाने में मदद मिलती है। रक्त संचार ठीक होता है और आगे चलकर सिरदर्द और शरीर की अन्य समस्यओं में भी आराम मिलता है।
नवजात को काजल और माथे पर काला टीका लगाना ताकि बच्‍चे को नजर ना लगे काजल प्योर कार्बन होता है और इससे आँखों में इन्फेक्शन और रौशनी भी जा सकती है। बहुत इच्छा करे तो पलकों के बाहरी हिस्‍से में या माथे पर काला  टीका लगा सकते हैं।
सिर न धुलना और हमेशा सिर ढक कर रखना इसका कोई साइंटिफिक रीजन नहीं है। हफ्ते में एक बार बाल जरूर धुलें।
कमरा बंद रखे रखने की परम्परा ये परंपरा गलत है, प्रॉपर एयर वेंटीलेशन बहुत जरूरी है।
फुल कपड़े पहनना, मोज़े और सॉफ्ट चप्पल पहनना ये सही है, जितना बॉडी कम एक्सपोज होगी, उतना इन्फेक्शन से बचेंगे। हार्ड चप्पलें पैरों को सूजन देती हैं।
मोबाइल फ़ोन और टीवी न देखना रेडिएशन से दिमाग पर बुरा असर पड़ता है।
रोना नहीं रोने से आँखों और नर्वस सिस्टम पर असर पड़ता है।
कटहल, फूलगोभी और पत्तागोभी न खाएं ये सभी पेट में गैस बनाते हैं, जिससे बच्चा जब माँ का दूध पिएगा उसे कब्ज हो सकती है।
एसी में न रहना एसी में ‘ज्यादा’ नहीं रहना चाहिए।