• सौरभ श्रीवास्‍तव ने बताईं स्‍ट्रीट फोटोग्राफी की बारीकियां

    सौरभ श्रीवास्‍तव

    सौरभ श्रीवास्‍तव

एक बढि़या स्ट्रीट फोटोग्राफर वही बन सकता है, जो घुमंतू स्वभाव का हो और जो हरदम चौकन्ना रहता हो। उसे किसी भी गली-चौराहे या सुनसान जगह पर आकर्षक दृश्य या खास मोमेंट फोटोग्राफी के लिए मिल सकते हैं। कभी-कभी राह चलते कुछ ऐसे अद्भुत नजारे दिख जाते हैं जिन्हें कैमरे में कैद करना किसी अचीवमेंट से कम नहीं होता। स्ट्रीट फोटोग्राफी को लेकर लोगों में अब भी बहुत से मिसकांसेप्‍शंस हैं। इन्‍हीं भ्रांतियों को दूर करने के लिए शहर के पत्रकार और फोटोग्राफर सौरभ श्रीवास्तव ने गोमतीनगर के ‘बेवजह कैफे’ में हुए एक कार्यक्रम में बताया कि आप बेहतरीन स्ट्रीट फोटोग्राफी कैसे कर सकते हैं।

राह चलते खींची हर फोटो स्ट्रीट फोटोग्राफी नहीं है

सौरभ बताते हैं कि जब हम सड़क पर अपना कैमरा लेकर निकलते हैं तो स्ट्रीट पर जो भी हमें दिखता है, उसकी फोटो खींच कर उसे स्ट्रीट फोटोग्राफी का नाम दे देते हैं। लेकिन वास्‍तव में ऐसा नहीं है। स्ट्रीट फोटोग्राफी, डॉक्युमेंटेशन फोटोग्राफी और फोटो जर्नलिज्म – ये तीनों ही अलग हैं। स्ट्रीट फोटोग्राफी की बात करें तो यह एक आर्ट है। फोटो खींचते समय स्ट्रीट पर दिखे सब्जेक्ट को जब आप आर्ट से जोड़कर फोटो खीचते हैं, तब वो बनती है स्ट्रीट फोटोग्राफी। डॉक्युमेंटेशन में इसकी जरूरत नहीं और फोटो जर्नलिज्म में यह हो नहीं सकता।

मैं फोटो को जिस तरह से सोचता हूं, कई बार खींचने से पहले और कई बार खींचने के बाद, वो मै यहाँ बताना चाहूंगा।

 

इस फोटो को मैंने उदयपुर में खींचा था। उस दौरान मोदी जी की सरकार आ चुकी थी। सहनशीलता पर लोगों के बीच बहस चल रही थी, लोग पाले बदल रहे थे इधर से उधर। इस फोटो का मकसद यही था कि इस दौर में गुब्‍बारा हो जाना ही आसान है क्योंकि गुब्बारे ने इस लड़की का चेहरा छुपा दिया है। गुब्‍बारा सिंबल इसलिए चुना क्योंकि एक गुब्बारे में हवा भरने के बाद वह किसी भी दिशा में जा सकता है। जो राजनीतिक दौर चल रहा है, उसमें लोग गुब्बारे की तरह ही बदल रहें हैं। जिस तरफ लहर जा रही है, लोग उसी के साथ हो ले रहे हैं।

जब आप ह्यूमन लाइफ को क्लिक कर रहे होते हैं तो आप हिस्ट्री में कुछ लिख रहे होते हैं जिसे आगे भविष्य में लोग पढ़ेंगे कि उस समय का हमारा समाज कैसा दिखता था।

समाज का साहित्य भी बताती है स्ट्रीट फोटोग्राफी

अगर मैं इस समय के लखनऊ के हजरतगंज की फोटो खींचता हूं तो भविष्य के लिए मैं बता सकूंगा कि जब लखनऊ में मेट्रो का काम चल रहा था तो उस दौरान लखनऊ और उसका हज़रतगंज कैसा दिखता था। पैदल चलना कितना मुश्किल रहा। जब लोग गंज की सड़कों पर चलते थे तो उनके कंधे आपस में लड़ते थे, जाम रहता था। तो उस फोटो को मैं इतिहास के एक पन्ने में धकेल पाने में सफल रहूंगा। आज से 10 साल बाद जब मेट्रो चल रही होगी और सारी चीजें स्मूथ होंगी, तब जब कोई बच्चा उस समय के समाज को देखना चाहेगा तो उसे पता चलेगा कि मेट्रो बनने के दौरान लोगों को कितनी तकलीफें हुईं और कितना केओस था। इतिहास सिर्फ आपको तारीखें बता सकता है जो ड्राई होगा, लेकिन उस समय का समाज कैसा दिखता था, सोशियो इकोनॉमिक इक्वेशन्स कैसी थी, यह एक स्ट्रीट फोटोग्राफी से ही पता चलता है।

फोटो में जगह की महक होती है

यह फोटो (ऊपर बाएं) नक्खास की है जो बिरयानी के लिए फेमस है। इस फोटो को देखकर बता सकते हैं कि यह ऐसी ही जगह की फोटो है। दूसरी (ऊपर दाएं) फोटो में दो मुस्लिम लोग खड़े हैं जिनके अगल-बगल हिन्दू का फ्लैग है, गंगा नदी का किनारा है, नाव भी है। यह फोटो  काशी के मिक्स कल्चर को रिप्रेजेंट करती है। तो कई बार फोटो खींचने से पहले सब्जेक्ट इम्‍पॉर्टेंट नहीं होता, खींचने के बाद वो सब्जेक्ट का रूप ले लेती है।

इस मौके पर सौरभ श्रीवास्तव ने स्ट्रीट फोटोग्राफी के लिए संदेश भी दिया – फोटो और इमेज में अंतर समझें। फोटो इमोशनलेस हो सकती है, पर इमेज वह इमेज तब बनती है जब उसके साथ इमेजिनेशन जुड़ता है। वही चीज़ें कैप्चर होंगी जो सब्जेक्ट हम लोगों को दिखाना चाहते हैं। स्ट्रीट फोटोग्राफी के लिए फोकस क्लियर रखना बहुत जरूरी है।