• दुनिया में 45 करोड़ लोग मानसिक बीमारी से ग्रस्त, इनमें भारतीयों की संख्‍या  करीब 9 करोड़ : डब्‍लूएचओ

एक अनुमान के अनुसार हर चौथा इंसान कभी कभी मानसिक रोग का शिकार जरूर होता है। दुनिया भर में इस रोग की सबसे बड़ी वजह है तनाव और निराशा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, मानसिक रोगों के शिकार बहुत से लोग इलाज करवाने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे लोग उनके बारे में गलत सोचने लगेंगे। इस कारण यह रोग बढ़ता है और आजीवन बना रहता है। एक समय ऐसा भी आता है कि इसका इलाज असंभव हो जाता है। प्रस्‍तुत है रजनीश राज की रिपोर्ट –

गंभीर नहीं हैं लोग

पूरी दुनिया में डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। इसके बावजूद भारत जैसे विकासशील देशों में मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा बात नहीं होती है और सरकारें भी इस तरफ कोई खास ध्यान नहीं देती हैं। भारतीय परिवारों में लोग प्राय: अपनी मानसिक परेशानियों को दूसरों के साथ नहीं बांटते हैं। छोटी-छोटी बातों पर डिप्रेशन में चले जाना स्वभाव बनता जा रहा है। छोटी उम्र से ही तनाव हम पर हावी होने लगता है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह मानसिक तनाव कई दूसरी बीमारियों की वजह भी बन जाता है। बावजूद इसके लोग मानसिक बीमारियों को गंभीरता से नहीं लेते और आगे चलकर ये गंभीर रूप ले लेती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों की मानें तो दुनिया में करीब 45 करोड़ लोग मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं। भारत में करीब 9 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो किसी ना किसी तरह की मानसिक परेशानी का सामना कर रहे हैं। वर्ष 2005 से लेकर वर्ष 2015 के बीच पूरी दुनिया में डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या 18.4 प्रतिशत बढ़ी है। डब्‍लूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2015 में भारत में 5 करोड़ लोग डिप्रेशन के मरीज थे। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशियाई देशों में सबसे ज्यादा डिप्रेशन के मरीज भारत में ही हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान के मुताबिक, भारत में हर 20 में से एक व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है।

आत्महत्या का प्रयास भी

अगर मनोरोग हद से ज्यादा बढ़ जाए तो मानसिक बीमारी का शिकार व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेता है। पूरी दुनिया में होने वाली कुल मौतों में मानसिक रोगियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत है। आंकड़ों के मुताबिक, 78 प्रतिशत आत्महत्याएं कम और मध्यम आय वाले देशों में ही होती हैं। वर्ष 2012 में पूरी दुनिया के मुकाबले भारत में आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आए थे।

डिप्रेशन की दवा की बढ़ी मांग

एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016 में भारतीयों ने वर्ष 2015 के मुकाबले डिप्रेशन की ज्यादा दवाएं खाईं थी। वर्ष 2015 के मुकाबले 2016 में डॉक्टरों ने एंटी डिप्रेशन दवाओं के लिए 14 प्रतिशत ज्यादा पर्चे लिखे। वर्ष 2016 में एंटी डिप्रेशन दवाओं के 3 करोड़ 46 लाख पर्चे लिखे गए, जबकि वर्ष 2015 में यह संख्या 3 करोड़ 35 लाख थी।

महिलाएं ज्यादा शिकार

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को ये परेशानी ज्यादा और जल्दी घर करती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार, 10 पुरुषों में एक जबकि 10 महिलाओं में हर 5 को डिप्रेशन की आशंका रहती है। ऐसा माना जाता है कि पुरुष अपना डिप्रेशन स्वीकार करने में संकोच करते हैं जबकि महिलाएं दबाव और शोषण के चलते जल्दी डिप्रेशन में आ जाती हैं।

10 प्रतिशत से अधिक भारतीय बुजुर्ग चपेट में

भारत में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्ध विषादग्रस्त हैं और इस आयु वर्ग के 40-50 प्रतिशत लोगों को अपने जीवन के संध्‍या काल में कभी न कभी किसी मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक की जरूरत पड़ती है। दूसरे देशों में भी बुजुर्ग मानसिक रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं। अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में वृद्धावस्था में होने वाली विमूढ़ता (डिमेंशिया) से करीब 2 करोड़ 90 लाख लोग प्रभावित हैं। एक आकलन के अनुसार, 2020 तक इनकी संख्या 5 करोड़ 50 लाख से भी अधिक हो सकती है।

क्‍या कहते हैं विशेषज्ञ

मानसिक रोगी अच्छी तरह अपना इलाज कराएं तो वे ठीक होकर खुशहाल ज़िंदगी जी सकते हैं। वृद्धावस्था में एकाकीपन मानसिक रोग का मुख्य कारण है। इसका इलाज कुछ लंबा चलता है। अगर स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत एक से तीन माह के सर्टिफिकेट कोर्स शुरू कराए जाएं तो युवाओं को टेंड कर उनके माध्यम से मानसिक रूप से अस्वस्‍थ लोगों को घर में ही बेहतर देखभाल उपलब्ध करवाई जा सकती है। इससे रोजगार भी सृजित होगा।

डॉ. एस.सी. तिवारी, विभागाध्यक्ष, वृद्धावस्था एवं मानसिक रोग विभाग, केजीएमयू, लखनऊ

भौतिकतावाद ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है। कंपटीशन को हमने अपना जीवन बना लिया है। एक ओर गला काट प्रतियोगिता में हम शामिल हो चुके हैं तो दूसरी ओर मानवीय व्यवहार पीछे छोड़ रहे हैं। परिवार में परवरिश ऐसी हो रही है कि बच्चे शुरू से ही एक-दूसरे से प्रतियोगिता करना सीख जाते हैं। किसी से प्रतियोगिता का कोई लाभ नहीं है। हां, स्वत: आकलन करना जरूरी। सच कहें तो शहर के मुकाबले गांव के लोग कम मनोरोगी हैं, क्योंकि वे आज भी सीधी और सरल जिन्दगी जी रहे हैं।

डॉ. नेहा श्रीवास्तव, असिस्टेंट प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, नेशनल पीजी कॉलेज, लखनऊ

मनोरोग में प्यार के दो बोल सबसे बड़ा उपचार हैं। अंधी दौड़ में आज हम मानवीय संबंधी को भूलते जा रहे हैं। परिणाम सामने है। अब भी समय है, हमें सचेत हो जाना चाहिए। सभी के लिए जीवन जीने लायक माहौल सृजित किया जाना चाहिए। इस रोग से पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति का भाव रखना चाहिए। उनके अंदर आत्मविश्वास और चेतना विकसित करनी चाहिए।

रीता सिंह, समाजशास्त्री, संस्थापक, सरल केयर फाउंडेशन