जो भी प्यार से मिला, हम उसी के हो लिए यह बात  86 साल के वरिष्ठ समाजसेवी राजेन्द्र नाथ श्रीवास्तव उर्फ भइयाजी पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है। उन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों के दुख-दर्द को दूर करने और समाजसेवा में लगा दिया, जो आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके प्रति समाज के लगाव को इससे भी समझा जा सकता है कि चाहे छोटा हो या बड़ा, हर कोई उनको प्यार से भइयाजी के नाम से ही पुकारता है। वे जगत भइया हैं। उनसे परिचित करवा रहे हैं रजनीश राज

30 साल तक रहे सभासद

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की हृदयस्थली हजरतगंज के पास स्थित नरही में भइयाजी 1935 से रह रहे हैं। 1995 से पहले 30 साल से अधिक समय तक वे नरही से पार्षद भी रहे हैं। इस स्थान से उनको इतना प्यार है कि गंभीर बीमारी की हालत में भी वे इस स्थान को छोड़ना नहीं चाहते हैं। अपने सभासदी के दौरान इस क्षेत्र का चहुंमुखी विकास उन्होंने कराया। सत्ता-प्रशासन में उनकी हमेशा ही धमक रही है, लेकिन बाजवूद इसके कभी किसी पद की लालसा उन्हें नहीं रही। अपनी उज्जवल छवि को कभी उन्होंने दागदार नहीं होने दिया है।

मनकामेश्वर मठ मंदिर की महंत देव्या गिरि ने पहली सितम्‍बर को भइयाजी से मिलकर उनका हालचाल जाना

बीमारियों ने घेर रखा है

हाल फिलहाल भइयाजी को कई बीमारियों ने घेर रखा है। हार्ट और न्यूरो की बीमारियों के चलते वे बहुत कमजोर हो गए हैं। वह अस्पताल में इलाज नहीं करवाना चाहते, इसलिए अप्रैल माह से घर पर ही उनका इलाज हो रहा है। उनके भतीजे अजय कुमार उनकी समग्र देखभाल कर रहे हैं।

मिल रही है आर्थिक मदद और अपनापन

जीवन पर्यंन्त किए गए परोपकार का ही परिणाम है कि इस हाल में भइयाजी को लोगों से न सिर्फ अपनापन मिल रहा है बल्कि आर्थिक मदद की पेशकश भी आ रही है। पिछले दिनों मनकामेश्वर मठ मंदिर की श्रीमहंत देव्या गिरि ने भइयाजी का हालचाल जानने के साथ ही उनको 10 हजार रुपए की आर्थिक मदद भी दी। श्रीमहंत ने भइयाजी के जल्द स्वास्थ्य लाभ की कामना भी की। उन्होंने समाज के लोगों का आह्वान करते हुए कहा कि ऐसे वास्तविक संतों का दायित्व वह स्वेच्छा से उठाएं।

60 एकड़ जमीन दे दी दान

समाज को भइयाजी द्वारा दिए गए योगदान की एक लंबी फेहरिस्त है। उन्होंने अपनी 60 एकड़ जमीन मिशनरीज ऑफ चैरिटी को इस कारण से दान में दी, जिससे बेसहारा लोगों का कुछ भला हो सके। सिविल अस्पताल को विकसित करने में भी उन्होंने खासा योगदान दिया है। उनके प्रयास से ही चिडि़याघर का नाम प्रिंस ऑफ वेल्स जूलॉजिकल पार्क से बदल कर लखनऊ प्राणी उद्यान हुआ, जिसे वर्तमान में नवाब वाजिद अली शाह जूलोजिकल गार्डेन नाम से जाना जाता है। सप्रू मार्ग पर ब्रिटिश ग्रेवयार्ड की ज़मीन पर भइयाजी प्रयासों से ही कुष्ठ रोग उपचार केन्द्र ‘मदर टेरेसा होम’ के नाम से शुरू किया। 16 नवम्बर, 1930 को जन्मे भइयाजी ने अपना शरीर और आंखें भी मेडिकल कॉलेज को दान में देने की घोषणा कर रखी है। निश्चित रूप से उनसे नई पीढ़ी को सीख लेनी चाहिए।