• लखनऊ के सरकारी अस्‍पतालों की ओपीडी का हाल

सरकार चिकित्सा व्यवस्था में सुधार के कितने ही दावे करे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। आज सरकारी अस्‍पतालों में इलाज के लिए मरीजों को घण्टों इन्तजार करना पड़ता है और जब उनका नंबर आता है तो डॉक्‍टर उन्‍हें दो मिनट से ज्‍यादा समय नहीं देते। मरीजों की इस दशा के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि सरकार ही है, क्‍योंकि बड़ी संख्या में सरकारी अस्‍पताल और मेडिकल कॉलेज होते हुए भी मरीजों को न तो ढंग का इलाज मिल रहा है और न ही पर्याप्‍त सुविधाएं। हालांकि प्राइवेट क्लीनिक में समय व श्रम दोनों की बचत होती है, लेकिन लोगों का मानना है कि आज भी बेहतर इलाज सरकारी अस्पतालों में ही मिलता है। प्रस्तुत है the2is.com के लिए शिवम् अग्निहोत्री की रिपोर्ट :   

सरकारी अस्‍पतालों की ओपीडी व प्राइवेट क्लीनिकों में मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही है। हालांकि मरीजों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में प्राइवेट क्‍लीनिक की तुलना में आज भी बेहतर इलाज मिलता है, क्‍योंकि वहां डॉक्टर ट्रेंड और ज्‍यादा अनुभवी होते हैं और साथ ही इलाज भी सस्ता होता है। सरकारी अस्‍पतालों में इलाज को अधिकारी भी बेहतर मानते हैं क्‍योंकि जब राज्य के प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल एक हादसे में घायल हुए थे तो उन्हें भी लखनऊ के केजीएमसी के ट्रॉमा सेंटर में ही भर्ती कराया गया था। यही कारण है कि  सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ ज्यादा होती है, लेकिन डॉक्‍टरों की कमी के कारण वे ओपीडी में मरीजों को बहुत कम समय दे पाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि ज्‍यादातर मरीज इलाज से संतुष्‍ट नहीं दिखाई देते।

लखनऊ के एक सरकारी अस्‍पताल में पर्चा बनवाने के लिए लगी लाइन

केजीएमसी में रोजाना आते हैं 4000 मरीज

लखनऊ के केजीएमसी की ओपीडी में रोजाना 3000 से 4000 मरीज पहुंचते हैं। कहने को तो यहां 30 डॉक्टर रहते हैं मरीजों की संख्‍या के हिसाब से देखा जाए तो 4 घण्टे की ओपीडी में एक डॉक्टर के हिस्से में 130 से 135 मरीज आते हैं। इस लिहाज डॉक्‍टर हर मरीज को मुश्किल से दो मिनट ही समय दे पाता है। घण्टों इंतजार करने के बाद जब डॉक्टर मरीज को डेढ़-दो मिनट में ही देखकर निपटा देते हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह कितना संतुष्‍ट होता होगा। यही हाल लखनऊ के अन्‍य सरकारी अस्‍पतालों का भी है। बलरामपुर अस्पताल की ओपीडी में रोज 1000 से 1200 मरीज, सिविल अस्पताल की ओपीडी में 700 से 750 मरीज और लोहिया अस्पताल की ओपीडी में 1000 से 1500 मरीज रोजाना आते हैं।

टाइम व इलाज का समन्वय

ओपीडी में पहुंचने वाले 60 फीसदी मरीज सामान्य़ बीमारी (खांसी, जुकाम, बुखार) से ग्रसित होते हैं। इनके लिए केजीएमसी में सिर्फ 4-5 फिजीशियन ही हैं, यानी 2400 मरीजों पर सिर्फ 4 से 5 डॉक्टर। घंटों इंतजार के कारण मरीज परेशान होते हैं और उनका समय भी बरबाद होता है। हालांकि मरीजों को कम समय देने के सवाल पर डॉक्‍टरों का कहना है कि उनका प्रयास होता है कि वे कम समय में ज्यादा से ज्यादा मरीजों को देख सकें। लेकिन जब 4-5 घंटे इंतजार करने के बाद डॉक्टर मरीज को सिर्फ 1-2 मिनट में ही देखकर निपटा देता है तो इससे मरीज को संतुष्टि नहीं मिलती है।

डॉक्टर बोले – मरीजों को ठीक से न देखने की बात गलत

केजीएमसी के फिजीशियन डॉ. दीपक का कहना है कि ओपीडी में मरीज को ठीक से नहीं देखा जाता, यह कहना सही नहीं है। यह जरूर है कि डॉक्टर एक मरीज को ज्‍यादा समय नहीं दे पाता, लेकिन इससे उसके इलाज पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता है। केजीएमसी के ही एक अन्‍य फिजीशियन डॉ. विवेक भी कहते हैं कि ओपीडी में ज्यादा भीड़ होने की वजह से एक मरीज को सिर्फ 1-2 मिनट ही दे पाते हैं लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है कि मरीज सही इलाज न होता हो। अगर किसी मरीज को गंभीर बीमारी है तो उसे ज्‍यादा समय भी देते हैं और उसकी पूरी तरह जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर मरीज को तुरंत भर्ती होने की सलाह दी जाती है।