हमारे देश में सरकारें नवजात शिशुओं को स्वास्थ्य सुरक्षा दे पाने में नाकामयाब साबित हो रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर साल लगभग 59 लाख बच्चों की मौत 5 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, स्वास्थ्य मंत्रालय, यूनीसेफ दूसरी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत में बाल मृत्यु दर में कमी नहीं रही है। पेश है रजनीश राज की रिपोर्ट –

पांच वर्ष तक के बच्‍चों पर ज्‍यादा खतरा

स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से बताया गया है कि पांच वर्ष से कम उम्रके बच्‍चों में सबसे अधिक मृत्यु नवजात शिशु संबंधी रोग (53 फीसदी) से होती है। इसके अलावा निमोनिया (15 फीसदी), डायरिया (12 फीसदी), खसरा (3 फीसदी) और चोट या दुर्घटनाओं (3 फीसदी) से बच्‍चों की मौत होती है। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट के अनुसार, दो तिहाई से अधिक नवजात शिशुओं की मृत्यु पहले महीने में ही हो गई। इनमें से 90 फीसदी मृत्यु निमोनिया और डायरिया जैसे बीमारियों से हुई जिनका इलाज आसानी से हो सकता था। वर्तमान में नवजात बच्‍चों की मृत्‍यु दर 48 (प्रति 1,000) है, जबकि वर्ष 2015 में यह 43 थी।

निमोनिया और डायरिया मौत के मुख्य कारण

यूनिसेफ ने वर्ष 2016 की अपनी ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन रिपोर्ट’ में कहा है, 2015-16 में दुनिया भर में लगभग 59 लाख बच्चों की निमोनिया, डायरिया, मलेरिया, दिमागी बुखार, टिटनेस, खसरा जैसी बीमारियों से हुई। अमेरिका के जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय ने दुनिया के 15 देशों में स्वास्थ्य संबंधी एक अध्ययन किया। उस अध्ययन के अनुसार, भारत में 5 वर्ष से कम आयु वर्ग के 296,279 बच्चों की मौतें डायरिया और निमोनिया से हुई हैं। यह संख्‍या विश्व में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की कुल मौतों का 5 फीसदी है। इस अध्ययन से पता चलता है कि भारत में बच्चों के स्वास्थ्य की क्या स्थिति है और इसे बेहतर बनाने की कितनी जरूरत है।

प्रॉग्रेस रिपोर्ट ऑन निमोनिया और डायरिया के अनुसार, नौ फीसदी बच्चों की मौत दस्त के कारण होती है और 16 फीसदी मौत का कारण निमोनिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और नाइजीरिया जैसे देश वैश्विक मंच पर आर्थिक वृद्धि के लिहाज से अग्रणी होने के बावजूद, बाल मृत्यु दर को कम करने में पिछड़े हैं। पड़ोसी देशों के बीच भारत ने केवल अफगानिस्तान (91), पाकिस्तान (81) से बेहतर प्रदर्शन किया। मालदीव में बच्‍चों की मृत्‍यु दर मात्र 9 है जो सबसे कम है। इसके बाद श्रीलंका (10), भूटान (33), नेपाल (36) और बांग्लादेश (38) हैं।

भारत में सबसे ज्यादा समय पूर्व जन्म

अपरिपक्व बच्चा वह होता है जो गर्भावस्था के 37 सप्ताह के पूरा होने से पहले पैदा होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया भर में हर वर्ष अनुमानित तौर पर 15 मिलियन अपरिपक्व बच्‍चे पैदा होते हैं। अफ्रीका और दक्षिण एशिया में 60 फीसदी से अधिक अपरिपक्व जन्म के मामले पाए जाते हैं। 3.5 मिलियन के आंकड़ों के साथ भारत अपरिपक्व बच्चों के जन्म की सूची में सबसे ऊपर है। 1.17 मिलियन के साथ चीन और 0.77 मिलियन के साथ नाइजीरिया दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।

कम उम्र में हो रही गंभीर बीमारी

देश के बच्चों में धीमे-धीमे ऐसी बीमारियां होती जा रही हैं, जो पहले बढ़ती उम्र के साथ हुआ करती थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 70 करोड़ लोग कोयला या केरोसिन स्टोव व अन्य घरेलू स्रोतों से निकलने वाले धुएं में सांस लेते हैं। यह धुआं कार्बन कणों, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड, फॉर्मलडिहाइड और कैंसर कारक पदार्थ जैसे बेंजीन से भरपूर होता है। अध्ययन के अनुसार, यह धुआं देश में अस्थमा का एक प्रमुख कारण है और यह बच्चों को तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रहा है। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि भारत में 1.5 से दो करोड़ लोग दमा से पीड़ित हैं और यह संख्या कम होने के कोई संकेत नहीं नजर आ रहा है। अध्ययनों से पता चलता है कि बच्चों में अस्थमा का प्रसार अधिक तेजी से होता है, क्योंकि उनकी सांस की नली पतली होती है, जो प्रदूषण की वजह से संकुचित होती जाती है।

ब्रेस्टफीडिंग बचाती है बीमारी से

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, स्तनपान नहीं कराने के कारण हजारों बच्चों की मौत हो जाती है और साथ ही महिलाएं भी खतरनाक बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ग्लोबल ब्रेस्टफीडिंग कलेक्टिव के साथ मिलकर एक ग्लोबल ब्रेस्टफीडिंग स्कोर कार्ड जारी किया है। इसमें कहा गया है कि स्तनपान से न केवल बच्चों की मौत के दो बड़े कारणों – डायरिया और निमोनिया से बचने में मदद मिलती है, बल्कि महिलाओं की मौत के दो बड़े कारण ओवरी और स्तन कैंसर की संभावना भी कम हो जाती है। चीन, भारत, नाइजीरिया, मैक्सिको और इंडोनेशिया में अपर्याप्त स्तनपान के कारण हर साल लगभग 2.36 लाख बच्चों की मौत हो जाती है।