खाने-पीने की चीजें हो या फिर कोई और आइटम, आजकल ज्यादातर चीजें प्लास्टिक पैक में आती हैं। लंच बॉक्स, बर्तन से लेकर घरेलू इस्तेमाल में आने वाली तमाम चीजें आज प्लास्टिक की बन रही हैं। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में हर जगह प्लास्टिक की घुसपैठ है। सिर्फ किचन की बात करें तो नमक, घी, तेल, आटा, चीनी, ब्रेड, बटर, जैम और सॉस सब कुछ प्लास्टिक पैक होता है। घर की तमाम चीजें भी प्लास्टिक के कंटेनर्स में ही रखी जाती हैं। सस्ते, हलके और लाने- ले जाने में आसान होने की वजह से लोग प्लास्टिक कंटेनर्स को पसंद करते हैं। सस्‍ते होने की वजह से ज्‍यादातर लोग फुटपाथ पर बिकने वाली प्लास्टिक से बनी वस्तुएं खरीदते हैं, जिनमे खाने-पीने का सामान ऱखा जाता है। लेकिन वे यह नहीं जानते कि घटिया प्लास्टिक डिब्‍बों में रखा जाने वाला सामान हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। प्रस्‍तुत है  the2is.com के शिवम अग्निहोत्री की रिपोर्ट :

क्‍या आपको पता है कि सुबह-सुबह अपने बच्‍चों को जिस प्‍लास्टिक के बॉक्‍स में लंच देकर स्‍कूल भेजती हैं, वह उनके लिए कितना सुरक्षित है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सस्‍ते के चक्‍कर में आपने घटिया प्‍लास्टिक से बना लंच बॉक्‍स या अन्‍य चीजें खरीद ली हैं ? छोटी दुकानों, फुटपाथ या विभिन्‍न शहरों में साप्‍ताहिक बाजारों में बिकने वाले प्‍लास्टिक के ज्‍यादातर सामान घटिया प्‍लास्टिक से बने होते हैं, जिन्‍हें नॉन फूड ग्रेड प्‍लास्टिक कहा जाता है। अगर ज्‍यादा समय तक ऐसे सामानों का इस्‍तेमाल किया जाए तो यह इंसान की सेहत के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है।

प्लास्टिक कितना जहरीला

लखनऊ के इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (IITR) के एक साइंटिस्ट के अनुसार, पानी में न घुल पाने और बायोकेमिकली ऐक्टिव न होने की वजह से प्योर प्लास्टिक कम जहरीला होता है, लेकिन जब इसमें दूसरी तरह के प्लास्टिक, केमिकल और कलर आदि मिला दिए जाते हैं तो यह बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। ये केमिकल खिलौने या दूसरे प्रोडक्टस में से गर्मी के कारण पिघलकर बाहर आ सकते हैं। इस खतरे को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने बच्चों के खिलौनों और चाइल्ड केयर प्रोडक्टस में इस तरह की प्लास्टिक के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया है। यूरोप ने साल 2005 में ही इस पर बैन लगा दिया था तो जापान समेत 9 दूसरे देशों ने भी बाद में इस पर पाबंदी लगा दी।

  • साप्ताहिक बाजारों में मिलते हैं ज्यादातर घटिया प्लास्टिक से बने सामान
    साप्ताहिक बाजारों में मिलते हैं ज्यादातर घटिया प्लास्टिक से बने सामान

प्‍लास्टिक में मिले ये रसायन हैं हानिकारक

प्लास्टिक में कड़ापन लाने के लिए जिस विस्फेनॉल रसायन का उपयोग किया जाता है, वह बेबी बॉटल, सीडी कवर, खाद्य और पेय पदार्थों आदि में इस्तेमाल होता है, जो सेहत के लिए बहुत हानिकारक होता है। इसके अलावा पॉलीकार्बोनेट (PC) प्‍लास्टिक से बने सामान भी नुकसानदायक हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें हॉर्मोंस पर असर डालने वाले BPA (बायस्फेनॉल) की मौजूदगी होती है, जो सेहत के लिए हानिकारक है। साथ ही, पॉलीविनाइलीडीन क्लोराइड (PVDC) के इस्‍तेमाल से बना प्‍लास्टिक भी सेहत के लिए अच्‍छा नहीं माना जाता है। ज्‍यादातर नॉन फूड ग्रेड प्‍लास्टिक में इनका धड़ल्‍ले से इस्‍तेमाल होता है। यही नहीं, प्‍लास्टिक के रंग-बिरंगे सामानों में घटिया क्‍वालिटी के रंगों का प्रयोग होता है जो उसमें रखे खाने-पीने के सामान के साथ हमारे शरीर में पहुंचते हैं और सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं।

कैसे पहचानें फूड ग्रेड व नॉन फूड ग्रेड प्लास्टिक

हम सभी लोग पानी के लिए बॉटल या खाना रखने के लिए प्लास्टिक लंचबॉक्स यूज करते हैं, लेकिन क्‍या कभी हमने उन्हें पलटकर देखा है कि उनके पीछे ‘ISI’ लिखा है या फिर एक सिंबल बना है? दरअसल, अच्छी क्वॉलिटी के प्‍लास्टिक प्रॉडक्ट पर ये सिंबल होना जरूरी है। यह मार्क ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) जारी करता है और इससे पता लगता है कि प्रॉडक्ट की क्वॉलिटी अच्छी है या नहीं। इन सिंबल्स (क्लॉकवाइज ऐरो के ट्राइएंगल्स) को रेजिन आइडेंटिफिकेशन कोड सिस्टम (RIC) कहते हैं। इन ट्राइएंगल्स के बीच में नंबर भी होते हैं। इन नंबरों से ही पता चलता है कि आपके हाथ में जो प्रॉडक्ट है, वह किस तरह के प्लास्टिक से बना है। यही हॉलमार्क तय करते हैं कि प्लास्टिक फूड ग्रेड है या नहीं। नीचे फूड ग्रेड प्‍लास्टिक के कुछ सिंबल बताए गए हैं –

 प्रॉडक्ट के ऊपर बने सिंबल का मतलब

ग्रेड 1 : यह प्रॉडक्ट पॉलिथिलीन-टेरेफथालेट (PET) या गुड प्लास्टिक है। PET अपनी पैकेजिंग में रखे सामान को सुरक्षित रखता है।

ग्रेड 2 : इसका मतलब है कि यह प्रॉडक्ट हाई-डेंसिटी पॉलिथिलीन (HDPE) से बना है। दूध, पानी, जूस आदि के बॉटल्स, योगर्ट की पैकेजिंग, रिटेल बैग्स आदि बनाने में इसका इस्तेमाल किया जाता है। HDPE प्लास्टिक्स के खाने-पीने की चीजों में मिक्स होने से कैंसर या हॉर्मोंस को नुकसान होने की आशंका न के बराबर रहती है।

ग्रेड 3 : यह प्रॉडक्ट पॉलीविनाइलीडीन क्लोराइड (PVDC) से बना है। PVDC का इस्तेमाल कन्फेक्शनरी प्रॉडक्टस्, डेयरी प्रॉडक्ट्स, सॉस, मीट, हर्बल प्रॉडक्ट्स, मसाले, चाय और कॉफी आदि की पैकेजिंग में होता है।

ग्रेड 4 : यह प्रॉडक्ट लो-डेंसिटी-पॉलिथिलीन (LDPE) से बना है। इससे आउटडोर फर्नीचर, साइडिंग, फ्लोर टाइल्स, शॉवर कर्टेन आदि बनते हैं। यह नॉन-टॉक्सिक मटीरियल है, इससे सेहत को कोई नुकसान नहीं होता है।

ग्रेड 5 : यह प्रॉडक्ट पॉलीप्रोपायलीन (PP) से बना है। PP से बोतल कैप, ड्रिंकिंग स्ट्रॉ, योगर्ट कंटेनर, प्लास्टिक प्रेशर पाइप सिस्टम आदि बनते हैं। केमिकल रेजिस्टेंस इसकी खूबी है। एसिड इसके साथ रिएक्ट नहीं करते, इसलिए इसको क्लीनिंग एजेंट्स, फर्स्ट ऐड प्रॉडक्ट्स आदि की पैकेजिंग के लिए भी यूज किया जाता है।

ग्रेड 6 : यह प्रॉडक्ट पॉलिस्टरीन (PS) से बना है। यह फोम पैकेजिंग, फूड कंटेनर्स, प्लास्टिक टेबलवेयर, डिस्पोजेबल कप-प्लेट्स, कटलरी, सीडी, कैसेट बॉक्सेज आदि में इसे इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसको री-साइकल करना मुश्किल है और गर्म करने पर इसमें से कुछ गैसें निकलती हैं। ऐसे में इसके ज्यादा इस्तेमाल से बचें।

ग्रेड 7 : यह प्रॉडक्ट Others (O) से बना है। यह कई तरह के प्लास्टिक का मिक्सचर होता है। इसमें खासतौर पर पॉलीकार्बोनेट (PC) होता है। इससे सीडी, सिपर, सनग्लास, केचप कंटेनर्स आदि बनते हैं। हालांकि कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं, कि इसमें कई बार हॉर्मोंस पर असर डालने वाले BPA (बायस्फेनॉल) की मौजूदगी होती है, इसलिए इसका इस्तेमाल नहीं करें।

खाने की चीजें रखने के लिए ऊपर बताई गई 1, 2, 4 और 5 कैटेगरी का प्लास्टिक बढि़या माना जाता है। ये बेहतर फूड ग्रेड कैटेगरी में आते हैं। 3 और 7 कैटेगरी के कंटेनर खाने में केमिकल छोड़ते हैं, खासकर गर्म करने के बाद। 6 नंबर का भी इस्तेमाल कम करें, इनमें खाने की चीजें न रखें। यदि ये हॉलमार्क या निशान किसी भी प्रॉडक्ट नहीं है तो वह नॉन फूड ग्रेड प्लास्टिक है।

घातक बीमारियों का कारण बन सकती है प्लास्टिक

कैंसर : घटिया प्‍लास्टिक से बनी बोतल, ग्‍लास, लंच बॉक्‍स, कंटेनर्स आदि का प्रयोग करने से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी हो सकती है। शोध के अनुसार, ऐसी प्लास्टिक की बोतल जब ज्यादा तापमान की वजह से गर्म होती है तो इसमें से डाइऑक्सिन केमिकल का रिसाव शुरू हो जाता है। इसकी वजह से महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

दिमाग पर असर : प्‍लास्टिक की बोतल में प्रयोग की जाने वाली बाइसफेनोल ए के कारण दिमाग के कार्यकलाप प्रभावित होते हैं। इसके कारण इंसान की समझने और याद रखने की शक्ति कम होने लगती है। इससे अल्जाइमर्स जैसी बीमारी भी हो सकती है। बाइसफोनेल ए के कारण पाचन क्रिया प्रभावित होती है और कब्ज व गैस की समस्या हो जाती है।

गर्भपात का खतरा : वे महिलाएं जिन्हे प्रेगनेंट होने में परेशानी होती है या जिनका पहले गर्भपात हो चुका है, उन्हें न तो प्लास्टिक की बोतल में पानी पीना चाहिए न ही प्लास्टिक के सामान में कुछ खाना चाहिए। घटिया प्लास्टिक से पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्‍या भी कम हो जाती है।

इसे रोकने के लिए कौन है जिम्मेदार

घटिया प्लास्टिक के डिब्‍बों व बोतलों पर न तो किसी प्रकार की कोई रोक है और न ही सरकार ने कोई ऐसा नियम बनाया है। पॉलीथीन पर तो सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन नॉन फूड ग्रेड प्लास्टिक के बारे में कोई नियम नहीं पारित किया गया है, जबकि ऐसे प्लास्टिक के सामान सेहत के लिए बहुत खतरनाक हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रीजनल ऑफिसर डॉ. राम करन ने बताया कि वैसे तो इस पर रोक लगाने की जिम्‍मेदारी बोर्ड की ही है, लेकिन घटिया प्लास्टिक के डिब्बों पर रोक के लिए किसी प्रकार का कोई भी आदेश नहीं जारी किया गया है।

कितने जागरूक हैं लोग

इन घटिया प्लास्टिक की पहचान कर पाना मुश्किल नहीं है लेकिन लोगों में जागरूकता न होने के कारण बड़े पैमाने पर ऐसे नॉन फूड ग्रेड प्लास्टिक का प्रयोग किया जा रहा है। यदि सरकार इस तरह के घटिया प्लास्टिक के प्रति कोई जागरूकता अभियान चलाने की पहल करे तो अवश्य ही देश में प्लास्टिक की वजह से होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है।