बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों के चलते उत्तर प्रदेश अवैध खनन की बड़ी मंडी बन चुका है। उच्च न्यायालय के निर्देश पर उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 में खनन पर लगी रोक लगा दी गई थी। दिलचस्‍प बात यह है कि इस रोक के कारण भी अवैध खनन को और बढ़ावा मिला। फरवरी, 2017 में सभी पट्टे खत्म कर दिए गए, जिसके बाद बालू और मौरंग की कीमतें पांच गुना तक बढ़ गईं। पहले 100 घन फुट क्षमता वाली एक ट्रॉली बालू 1200 रुपये में मिल जाती थी। अब इसकी कीमत 5500 रुपये तक पहुंच चुकी है। इसी तरह एक ट्रॉली मौरंग के लिए 3500 के बजाय 13,500 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। यही वजह है कि प्रदेश में निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यूपी में यह स्थिति पैदा क्यों हुई, इसकी जानकारी दे रहे हैं रजनीश राज –

कम आपूर्ति से बढ़ीं कीमतें

फरवरी से बेकाबू हुई बालू और मौरंग की कीमतों की गूंज दूर तक सुनाई दी। इससे निर्माण की गतिविधियां प्रभावित हुईं, जिससे मजदूरों को काम मिलना बंद हो गया। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। बिल्डरों का कहना है कि पहले राजधानी लखनऊ में रोजाना दो लाख घन फुट मौरंग की सप्लाई होती थी, जो अब घटकर 20 से 25 हजार घन फुट ही रह गई है। बालू की भी तकरीबन इतनी ही आपूर्ति होती थी, जो अब 20 हजार घन फुट से कम रह गई है। सप्लाई घटने से इनकी कीमतें भी बेतहाशा बढ़ी हैं, जिससे निजी निर्माण कार्यों के अलावा कई बड़े प्रोजेक्ट भी बंद हो गए हैं। अब जाहिर सी बात है कि अगर प्रदेश में चल रहे निर्माण प्रोजेक्‍ट को चालू रखना है तो बालू-मौरंग की जरूरत तो पड़ेगी ही। ऐसे में सवाल उठता है कि जब मांग और आपूर्ति में इतना अधिक अंतर है तो इसे कैसे पूरा किया जाएगा?

निर्माण कार्य रुकने से सीमेंट की सप्लाई भी घटी है और सीमेंट और सरिया की कीमतें घट गई हैं। उत्तर प्रदेश सीमेंट व्यापार मंडल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दीपक सिंघल बताते हैं कि बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के बालू और मौरंग आने के बाद भी सप्लाई पूरी नहीं हो पा रही है। इस कारण निर्माण संबंधी कार्य ठप पड़े हैं। इन परिस्थितियों में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दखल देकर प्रमुख सचिव खनन से कहा है कि वह आम आदमी को बालू-मौरंग उपलब्ध कराए जाने के विषय में नीति स्पष्ट करें।

इलाहाबाद में अवैध खनन का नजारा

एनजीटी की सख्ती का भी दिखा असर

बिना पॉल्यूशन क्लियरेंस के बालू खनन करने वालों को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल कोई राहत देने को तैयार नहीं है, जिसके कारण से अवैध खनन पर कुछ हद तक अंकुश लगा है। दरअसल, रियो में हुई ग्लोबल यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एन्वॉयरनमेंट एण्ड डेवलपमेन्ट में अंतरराष्ट्रीय सहमति बनने के बाद से ही देश में 2 जून, 2010 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल कानून अस्तित्व में आया। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक संवैधानिक संस्था है। देश में लागू पर्यावरण, जल, जंगल, वायु और जैव विविधता के सभी नियम-कानून लागू कराना इसकी जिम्‍मेदारी है।

जल्द बदलेंगी परिस्थितियां

सपा सरकार में खनन पट्टों के आवंटन में हुए करोड़ों के घोटाले से सरकार की छवि खराब हुई थी। इससे बचने के लिए यूपी की योगी आदित्‍यनाथ सरकार ने केंद्र सरकार की तर्ज पर खनन पट्टों का आवंटन ऑनलाइन नीलामी से करने का निर्णय लिया है। अब सभी मुख्य और उप खनिजों के पट्टे ई-ऑक्शन से नीलाम किए जाएंगे। प्रदेश सरकार की नई व्यवस्था के बाद उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही बालू और मौरंग की कीमतें नियंत्रण में होंगी। सहारनपुर में खनन पर एनजीटी की रोक को छोड़कर अन्य सभी 74 जिलों में बालू, मिट्टी, बजरी और मौरंग के खनन पट्टों की नीलामी के लिए तैयारियां की जा रही हैं। खनन विभाग ने खनन क्षेत्रों का चिह्नांकन कर लिया है। जिन क्षेत्रों में वन विभाग की एनओसी नहीं मिली है, उन्हें छोड़कर अन्य क्षेत्रों में पट्टों की नीलामी होगी।

बालूमौरंग के एक हजार पट्टे

प्रदेश में बालू-मौरंग के करीब एक हजार खनन पट्टे ई-ऑक्शन से नीलाम किए जाएंगे। पट्टे के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा। आवेदन के बाद नीलामी के लिए निर्धारित तिथि को आवेदकों को ऑनलाइन ही बोली लगानी होगी। सर्वाधिक बोली लगाने वाले आवेदक को खनन पट्टा पांच वर्ष के लिए आवंटित किया जाएगा।

क्या हैं बालू खनन के मानक

  • खनन क्षेत्र का सीमांकन किया जाता है।
  • खनन कार्य गांव के मजदूरों द्वारा कराया जाता है, जिससे उनको रोजगार मिल सके।
  • बहती हुई नदी की जलधारा नहीं मोड़ी जाती है।
  • खनन कार्य जलधारा के अंदर नहीं किया जाता है।
  • खनन केवल तीन मीटर की गहराई में ही किया जाएगा।
  • नदी की जलधारा रोककर खनन नहीं किया जाता।
  • खनन पट्टाधारक को वन विभाग, खनिज विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना आवश्यक होता है।

जानलेवा है अवैध खनन

मौत के सौदागर अवैध खनन के खेल में नदी में पोकलैंड और लिफ्टर जैसी मशीनों का खुलेआम प्रयोग करते हैं। लिफ्टर के प्रयोग से नदी की जलधारा के बीच से 50 फिट अंदर से बालू की निकासी की जाती है, जिससे नदी में जगह-जगह सैकड़ों फिट के गड्ढे हो जाते हैं। इनके कारण नदी में डूबने की घटनाएं बढ़ने की आशंका होती है। दरअसल, तय लीज से कई गुना अधिक क्षेत्र में खनन करवाया जाता है। नदी की जलधारा को मोड़कर अवैध रूप से पूरी नदी में पुल बनाकर भी खनन किया जाता है। पर्यावरण के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए दिन-रात धड़ल्ले से खनन किया जाता है। इसके साथ ही नदियों में बने पुल के ठीक नीचे पोकलैंड मशीनों से खनन किया जाता है, जिससे पुल की सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाता है। विडम्बना तो यह है कि जिला प्रशासन और खनिज विभाग सब कुछ जान-समझकर भी मूक दर्शक बना रहता है।

हाईटेक तरीके से रुकेगा अवैध खनन

उत्तर प्रदेश में अवैध खनन के खिलाफ नई नीति तैयार की गई है। अब प्रदेश के कुल राजस्व में खनन की हिस्सेदारी 1.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत कर दी गई है। सरकार खनिजों की निकासी पर अब 1% अतिरिक्त सेस भी वसूलेगी। सरकार अवैध खनन पर जीपीआरएस के जरिए भी निगाह रखेगी। साथ ही खनन के लिए पट्टे ई-टेंडरिंग, ई-बिडिंग और ई-ऑक्शन के जरिए ही दिए जाएंगे। अवैध खनन को रोकने के लिए सरकार सैटलाइट मैपिंग, जीपीएस और सर्विलांस सिस्टम का इस्तेमाल करेगी। खनन में लगे वाहनों की निगरानी जीपीएस के साथ सीसीटीवी से भी होगी। भ्रष्टाचार रोकने के लिए रॉयल्टी जमा करने की प्रक्रिया भी ऑनलाइन की जाएगी। साथ ही खानों, खनन पट्टों और खनिज ढोने वाले वाहनों का डेटाबेस तैयार किया जाएगा। अवैध खनन और उसका ट्रांसपोर्ट रोकने के लिए विभागीय पुलिस बल और सचल दल बनाया जाएगा। नई नीति में दोषी पट्टेदारों के विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई करने की व्यवस्था की गई है। साथ ही अवैध खनन मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन भी किया जाएगा।

सख्त हुई अवैध खनन की सजा

यूपी में अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए नई खनन नीति में कई महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। योगी कैबिनेट ने उप्र खनिज (परिहार) (42वां संशोधन) नियमावली, 2017 को मंजूरी दे दी है। अब अवैध खनन करने वालों को पहले की तुलना में 20 गुना ज्यादा जुर्माना देना होगा। नई व्यवस्था के तहत प्रति हेक्टेयर अवैध खनन पर जुर्माने की धनराशि 25 हजार से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दी गई है। सजा की अवधि भी छह माह से बढ़ाकर 5 साल कर दी गई है।