•  नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्‍मति से सुनाया फैसला
  • कहा – निजता के अधिकार पर कुछ तर्कपूर्ण रोक लग सकती है

नई दिल्ली। राइट टु प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और यह संविधान के आर्टिकल 21 (जीने के अधिकार) के तहत आता है। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया। इस फैसले का प्रभाव देश के 134 करोड़ लोगों के जीवन पर पड़ेगा। फैसले को 3 अगस्त को सुरक्षित रख लिया गया था।

इस फैसले के द्वारा कोर्ट ने 1954 में 8 जजों की संवैधानिक बेंच की एमपी शर्मा केस और 1961 में 6 जजों की बेंच के खड्ग सिंह केस में दिए फैसले को पलट दिया गया है। इन दोनों ही फैसलों में इसे मूलभूत अधिकार नहीं माना गया था। हालांकि, ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि निजता का अधिकार कुछ तर्कपूर्ण रोक के साथ ही मौलिक अधिकार है। कोर्ट के मुताबिक, हर मौलिक अधिकार में तर्कपूर्ण रोक होते ही हैं। नौ जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे।

फैसला कितना अहम 

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच को यह तय करना था कि क्या भारतीय संविधान में राइट टु प्राइवेसी यानी निजता का अधिकार मौलिक अधिकार के तहत आता है? याचिकाकर्ता की मांग थी कि संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार को भी दर्जा मिले। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बताया कि राइट टू प्राइवेसी एक मौलिक अधिकार है जो संविधान के अनुच्छेद 21 (ए) के तहत आता है। आधार कार्ड का मामला इस केस से अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा हुआ था। इस फैसले से ‘आधार’ की किस्मत नहीं तय होगी और ‘आधार’ पर अलग से सुनवाई होगी। बेंच को सिर्फ संविधान के तहत राइट टु प्राइवेसी की प्रकृति और दर्जा तय करना था।

क्या कहना है सरकार का…

अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राइट टू प्राइवेसी पर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। यह बहुत कन्फ्यूजिंग है। आधार कार्ड के मामले की वजह से ही सही, इस पर क़ानूनी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। अटॉर्नी जनरल का तर्क था कि आठ जजों और फिर छह सदस्यों वाली खंडपीठ ने कहा था कि राइट टू प्राइवेसी (निजता का अधिकार) मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए इस मामले को नौ सदस्यों वाली खंडपीठ के पास भेजा जाना चाहिए ताकि इस पर क़ानून स्पष्ट हो।

Read More : http://navbharattimes.indiatimes.com/india/supreme-court-gave-verdict-on-right-to-privacy-is-fundamental-right-or-not/articleshow/60202571.cms