स्वास्थ्य सुविधाओं और सेवाओं के मामले में भारत अन्य कई देशों से काफी पीछे है। मेडिकल जर्नल ‘द लैनसेट’ में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी’ के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी 195 देशों की सूची में भारत को 154वां स्थान मिला है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का हाल यह है कि भारत बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है। बात अगर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की जाए तो यहां स्थिति और भी बदतर है। लगभग 20 करोड़ की आबादी, 75 जिलों में 814 ब्लॉक और 97607 गांवों के साथ उत्तर प्रदेश में सभी को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना एक गंभीर चुनौती है। इस चुनौती को पूरा करने में यह राज्य पिछड़ रहा है। पेश है रजनीश राज की एक रिपोर्ट –  

निराश करते हैं आंकड़े

विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2016 के अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 19.9 फीसदी चिकित्सकों की कमी है, जबकि भारतीय औसत 38 फीसदी है। नर्सों की संख्या के हिसाब से रैंकिग देखें तो देश में नीचे से 30 जिलों में से ज्यादातर जिले उत्तर प्रदेश के हैं। कुछ जिले बिहार और झारखंड में भी स्थित हैं। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में 50 फीसदी तक नर्सिंग स्टॉफ की कमी है।

अस्‍पतालों में इस तरह लगती हे लाइन

उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों पर जारी ताजा आंकड़े निराश ही करते हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी-2016 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है। यदि पीएचसी और सीएचसी, दोनों को एक साथ लिया जाए तो मात्र 50 फीसदी स्‍टाफ ही है।

भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर, प्रति 1000 जीवित जन्मों पर होने वाली मौत) के मामले उत्तर प्रदेश नीचे से तीसरे स्थान पर है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर में मातृ मृत्यु दर में उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। पिछले एक दशक के दौरान, यूपी में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रहा है।

डॉक्टरों, नर्स, तकनीशियन और कर्मचरियों की कमी के साथ ही प्रदेश के सरकारी अस्‍पताल बेड, स्ट्रेचर, दवाओं व अन्य सामानों की कमी का भी सामना कर रहे हैं। कई अस्पताल और चिकित्सा केंद्र (प्राथमिक और सामुदायिक) बंद पड़े हैं, क्योंकि वहां काम करने वाले लोग और सामान नहीं है।

जापानी इंसेफेलाइटिस है बदनामी का मुख्य कारण

देश भर में दर्ज हुए जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) मामलों में से 75 फीसदी से अधिक मामले उत्तर प्रदेश में पाए गए हैं। वर्ष 2016 में, देश भर में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से 1,277 मौतों की सूचना मिली थी, जिसमें से 615 मामले उत्तर प्रदेश से थे। इसी तरह देश भर में दर्ज हुई 275 जेई मौतों में से 73 मामले उत्तर प्रदेश से थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में, जहां हर साल जेई / एईएस से कई लोगों की जान जाती है, सरकार का कोई एक्शन प्‍लान नहीं है।

स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 13 अगस्त तक प्रदेश में 695 लोग स्वाइन फ्लू से पीड़ित थे, जिनमें से अब तक 21 लोगों की मौत हो चुकी है।

प्राइवेट इलाज का ही सहारा

एक सर्वे के अनुसार, उत्तर प्रदेश के लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की अपेक्षा प्राइवेट इलाज को अधिक महत्व देते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के 71वें दौर के आंकड़ों के आधार पर ‘ब्रूकिंग्स इंडिया’ द्वारा हाल के एक शोध के अनुसार, उत्तर प्रदेश प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य पर हर साल 488 रुपये खर्च करता है। ये आंकड़े केवल बिहार और झारखंड से ज्यादा हैं। हिमाचल प्रदेश द्वारा 1,830 रुपए खर्च किए जाते हैं, जिसकी तुलना में उत्तर प्रदेश का खर्च केवल 26 फीसदी है।

उत्तर प्रदेश के 20 करोड़ लोगों का स्वास्थ्य बीमा 4 फीसदी तक पहुंचा है। इस मामले में अखिल भारतीय औसत 15 फीसदी है। दूसरे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का स्तर भी बहुत खराब है। ऐसे में बिहार और हरियाणा को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य की तुलना में यहां के ज्यादातर लोग स्वास्थ्य सेवा के लिए निजी सुविधाओं पर निर्भर करते हैं। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवा पर बदहाली के कारण 80 फीसदी स्वास्थ्य खर्च परिवारों द्वारा निजी क्षेत्र में इलाज कराने पर किया जाता है।

अनुबंध पर डॉक्टर

उत्तर प्रदेश की बीमार स्वास्थ्य सेवा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यहां डॉक्टरों की बेहद कमी है। हाल यह है कि राज्य सरकार ने बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के मकसद से एक साल के अनुबंध पर एक हजार डॉक्टरों की भर्ती का फैसला लिया है। इनमें 500 स्पेशलिस्ट डॉक्टर होंगे। प्रदर्शन के आधार पर इन डॉक्टरों की अनुबंध बढ़ाने पर सरकार विचार कर सकती है।

उत्‍तर प्रदेश में कितने अस्‍पताल

क्या हो रहा है प्रयास

  • प्रदेश में झांसी, अलीगढ़, लखनऊ सहित पांच जगह कैंसर सेंटर खोले जाएंगे, जिनमें कैंसर पीड़ितों का इलाज होगा।
  • 150 करोड़ रुपये की लागत से झांसी मेडिकल कॉलेज में सुपर स्पेशियलिटी सेंटर भवन का निर्माण किया जाएगा।
  • 70 स्वास्थ्य केंद्रों का किया जाएगा अपग्रेडशन।
  • पांच जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बनाया जाएगा।
  • ग्रेटर नोएडा में बन रहे मेडिकल कॉलेज को एम्स की तर्ज पर विकसित किया जाएगा।