कभी नवाबों और बाग-बगीचों के रूप में चर्चित लखनऊ की पहचान अब चाहे जिस चीज़ से हो, कम से कम सफाई के लिए तो नहीं ही है। सफाई के लिए 343 शहरों में 2016 में किए गए सरकारी सर्वे के अनुसार, लखनऊ 269 नंबर पर है। शहर में हर सड़क, गली-मोहल्ले और खाली पड़ी जमीनों में कूड़ा और गंदगी देखने पर स्पष्ट है कि सफाई रैंकिंग में लखनऊ को उचित स्थान ही मिला है। पेश है रजनीश राज की रिपोर्ट —

नगर निगम पूरी तरह फेल

अगर आपको लखनऊ में कूड़ा और गंदगी नजर आती है तो जान लीजिए कि इसके लिए सिर्फ नगर निगम जिम्मेदार है। कागजों में राजधानी में सफाई व्यवस्था एवन है लेकिन हकीकत सबके सामने है। लखनऊ नगर निगम के कंट्रोल रूम को आईएसओ सर्टिफिकेट मिला हुआ है, लेकिन शहर की सफाई व्यवस्था पर इसका कंट्रोल नहीं रहता। ‘ग्रीन लखनऊ, क्लीन लखनऊ’ जैसे स्लोगन हवा-हवाई हो चुके हैं। सफाई तो दूर, उल्टे राजधानी और गंदी नजर आने लगी है। शहर को साफ रखने के जिम्मेदारी में नगर निगम पूरी तरह फेल साबित हुआ है। इसके लिए निम्न कारण महत्वपूर्ण हैं –



  • लखनऊ में कूड़ा ठिकाने लगाने की कोई योजना नहीं है
  • कूड़ा उठाने और निपटाने का काम ठेके पर है और ठेकेदारों पर कोई कंट्रोल नहीं है
  • कूड़े से बिजली बनाने का प्रोजेक्ट 20 साल में भी शुरू नहीं हो सका है
  • मोहान रोड के शिवरी में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के तहत 100 करोड़ रुपए से प्लांट लगाया गया था, जो खुद ही कूड़ा हो चुका है

  • पुरनिया के पास, अलीगंज
    पुरनिया के पास, अलीगंज
  • लखनऊ का चौक इलाका
    लखनऊ का चौक इलाका
  • मेट्रो सिटी, आलमबाग
    मेट्रो सिटी, आलमबाग
  • नगर स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र, आलमबाग
    नगर स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र, आलमबाग
  • पूर्व माध्यमिक स्कूल, उजारियाँ गाँव, गोमतीनगर
    पूर्व माध्यमिक स्कूल, उजारियाँ गाँव, गोमतीनगर

घैला में कूड़े का पहाड़

लखनऊ में ही हरदोई-सीतापुर बाईपास सड़क के किनारे घैला गांव में शहर भर का कूड़ा डंप किया जाता है। अब तो कूड़े के पहाड़ दूर से दिखने लगते हैं। कूड़े के पहाड़ हर वक्त सुलगा करते हैं जबकि एनजीटी ने कूड़ा जलाने पर सख्त रोक लगा रखी है। कूड़े से आसपास का वातावरण इतना दूषित हो चुका है कि इलाके में कोई रहना नहीं चाहता। गोमती नदी भी पास में है। हजारों टन कूड़े से जमीन के पानी क्या असर पड़ा होगा, किसी को परवाह नहीं है।

नगर निगम के हवा-हवाई दावे

  • 75 प्रतिशत चिह्नित कॉमर्शियल एरिया में दिन में दो बार सफाई नहीं
  • 50 प्रतिशत वार्ड में कूड़ा उठाने वाले तैनात नहीं
  • 75 प्रतिशत वार्ड में कूड़े का सेग्रीगेशन नहीं हो रहा

हकीकत तो यह है

  • कूड़े का निस्तारण करने के लिए प्लांट नहीं चला।
  • डोर टू डोर कलेक्शन 100 प्रतिशत नहीं हुआ।
  • शहर खुले में शौच मुक्त नहीं बन पाया।
  • डस्टबिन, पब्लिक टॉयलेट की हालत अब भी खराब बनी हुई।
  • घरों में और पब्लिक टॉयलेट नहीं बनाए जा सके।

कर्मचारियों की फौज

  • 3581 सफाई कर्मचारी नगर निगम में
  • 2397 नियमित सफाई कर्मचारी
  • 1184 संविदा सफाई कर्मचारी
  • 48 करोड़ रुपए सालाना ठेका सफाई का खर्च
  • 84 करोड़ रुपए सालाना सफाई कर्मचारियों का वेतन
  • 24 करोड़ रुपए सालाना निजी कंपनी को टिपिंग फीस
  • 400 के करीब पड़ावघर हैं, जहां रोजाना मोहल्लों का कूड़ा डंप किया जाता है।
  • 1600 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है रोज

ये हैं जिम्मेदार :

  • लखनऊ के मेयर और आपके इलाके का पार्षद
  • नगर निगम के नगर आयुक्त और नगर स्वास्थ्य अधिकारी

इंदौर का मॉडल

सफाई के मामले में हमें इंदौर का मॉडल फॉलो करना होगा। कुछ समय पूर्व साफ शहरों की सूची में दोनों एक-सी रैंकिंग पर थे। इंदौर नगर निगम ने पिछले साल ही फेल हुए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को सुधारने के लिए खुद ही कमान संभाली, किसी कंपनी को ठेका नहीं दिया। यानी घर से उठाने से लेकर प्रॉसेसिंग का पूरा जिम्मा नगर निगम के पास ही है। सारा कचरा प्रॉसेस कर उसका उपयोग किया जाता है। प्लास्टिक का इस्तेमाल सड़कें बनाने में और योडिग्रेडेबल कचरा कंपोस्टिंग के काम में आता है। आइए जानते हैं इंदौर का सफाई मॉडल –

  • इंदौर में बाजारों में सुबह और रात दो समय सफाई का काम होता है।
  • नगर निगमकर्मी हर घर—दुकान से कूड़ा लेकर जाते हैं।
  • 300 से 750 मीटर की दूरी पर एक कर्मचारी की तैनाती जरूर मिलेगी।
  • सड़क किनारे के सभी कूड़ादानों को हटाया गया है।
  • घरों में ब्लू और ग्रीन डस्टबिन बांटे – इनमें सूखा और गीला कचरा फेंका जाता है।
  • गाना बजाती एक गाड़ी जागरूकता फैलाती हुई आती है। लोग खुद ही गाड़ी में कूड़ा डालते हैं।
  • इंदौर में शिकायत पर कार्रवाई के लिए टाइम फ्रेम तय है।

विभागों से नहीं है तालमेल

इंदौर में 74वां संविधान संशोधन लागू होने से नगर निगम के पास शक्तियां और बजट भी मौजूद है। आवास और दूसरे प्रमुख विभाग नगर निगम के ही अधीन हैं। इस नाते भी सभी कार्यों को असानी से किया जा सका। लखनऊ में नगर निगम सीमा के भीतर ही एलडीए तथा आवास एवं विकास परिषद की कॉलोनियां भी हैं। ये कॉलोनियां हैंडओवर नहीं हैं, इसलिए सफाई और दूसरे जरूरी काम नगर निगम नहीं करवाता है। 74वां संशोधन न लागू होने से नगर निगम आर्थिक रूप से अक्षमता का शिकार है। विभागों के बीच सामंजस्य बैठाना चुनौती रहती है।