• अमेरिकी वैज्ञानिक ने बताया फार्मूला
  • 99.4 प्रतिशत गांवों तक बिजली के तार खिंचे पर 4 करोड़ से अधिक घर आज भी अँधेरे में
Johannes Urpelainen

डॉ. जोहानेस

जब तक बिजली वितरण कंपनियां कम बिजली दरों और बड़े पैमाने पर बिजली चोरी के कारण अपनी लागतें पूरी करने में असमर्थ हैं,  ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली सेवा की गुणवत्ता में सुधार की गुंजाइश बहुत कम है। ज्यादातर राज्यों के ग्रामीण इलाकों में हर नए घरेलू कनेक्शन और हर किलोवाट घंटे की आपूर्ति से कंपनियों का कर्ज बढ़ता जा रहा है| भारत जैसे देश में पॉवर ग्रिड के लिए भौगोलिक परिस्थितियों की बजाय शासन स्तर पर काम करने की ज्यादा जरूरत है। इसलिए,  सबसे बेहतर तरीका है कि बिजली क्षेत्र में सुधार और स्थानीय स्तर पर ऊर्जा तकनीक पहुंचाने का काम एक ही एकीकृत ढांचे के तहत किया जाए।

सरकार गांव-गांव बिजली पहुंचाने का दावा कर रही है। वैसे राजस्‍व गांव स्‍तर की बात करें तो सरकार का दावा कुछ हद तक सही भी है। सरकारी दावे की मानें तो लगभग 99.4 प्रतिशत गांवों तक बिजली के तार खिंच चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद हर घर बिजली का सपना अब भी काफी दूर है। गांव के हर टोले में बिजली के तार तो क्‍या, खम्‍भे भी नहीं पहुंचे हैं। इस मसले को सुलझाने का एक जरिया है, निजी कंपनियों की भागीदारी और स्थानीय स्तर पर बिजली उत्पादन।

ये दावा करने वाले जोंस हॉपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज (SAIS)  में ऊर्जा, संसाधन और पर्यावरण के प्रोफेसर और स्थायी ऊर्जा नीति (ISEP) के संस्थापक निदेशक जोहानेस उर्पेलेनन ने घर-घर बिजली पहुंचाने का सीधा सा फार्मूला भी बताया है –

सेक्टर सुधार + प्रौद्योगिकी का स्थानीय स्तर पर वितरण = सातों दिन और 24 घंटे बिजली।

डॉ. जोहानेस का कहना है कि पिछले एक दशक में भारत में विद्युतीकरण और स्‍थानीय स्‍तर तक ऊर्जा तकनीक को मिले बढ़ावे को देखा जाए तो यह साफ है कि ग्रिड का विस्‍तार तभी हो सकता है, जब उसे स्‍थानीय स्‍तर तक पहुंचाया जाए। वैसे तो कम आबादी वाले देशों में स्थानीय स्तर पर परंपरागत बिजली बनाना, घर-घर बिजली पहुंचाने के लिए पॉवर ग्रिड विस्तार का विकल्प हो सकता है क्योंकि  वहां सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है।  हालाँकि  भारत जैसे देश में पॉवर ग्रिड के लिए भौगोलिक परिस्थितियों की बजाय शासन स्तर पर काम करने की ज्यादा जरूरत है। इसलिए,  सबसे बेहतर तरीका है कि बिजली क्षेत्र में सुधार और स्थानीय स्तर पर ऊर्जा तकनीक पहुंचाने का काम एक ही एकीकृत ढांचे के तहत किया जाए।

भारत सरकार के ग्रामीण विद्युतीकरण पोर्टल के मुताबिक,  4 करोड़ से अधिक घरों में (करीब 20-30 करोड़ लोगों के बीच) आज भी बिजली कनेक्शन नहीं पहुंच पाए हैं। यही नहीं, ग्रामीण इलाकों में बिजली सप्‍लाई की गुणवत्ता बहुत खराब है। 2014 के एक सर्वेक्षण “access” में पता चला है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में एक सामान्य दिन में 10 घंटे से भी कम बिजली की आपूर्ति थी।

भारत के गांवों में हर घर तक बिजली पहुंचे, पर्याप्त बिजली की सप्लाई मिले और वितरण कंपनियां (DISCOMs)  दिवालिया भी ना  हों;  इसके  लिए  ज़रूरी है कि पावर सेक्टर में सुधार और स्थानीय स्तर पर अधिक बिजली बनाने का काम एक साथ किया जाए।

पावर सेक्टर में इस तरह के सुधार बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि जब DISCOMs की तरफ से मिलने  वाली  सेवाओं  की लागत ही नहीं वसूली जा सकती है तो उनकी सेवाओं की गुणवत्ता कैसे बेहतर होगी?  जब तक बिजली वितरण कंपनियां कम बिजली दरों और बड़े पैमाने पर बिजली चोरी के कारण अपनी लागतें पूरी करने में असमर्थ हैं,  ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली सेवा की गुणवत्ता में सुधार की गुंजाइश बहुत कम है। ज्यादातर राज्यों के ग्रामीण इलाकों में हर नए घरेलू कनेक्शन और हर किलोवाट घंटे की आपूर्ति से कंपनियों का कर्ज बढ़ता जा रहा है|

भारत की नई राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के मसौदे में भी यह स्वीकार किया गया है कि बेहतर सेवा के लिए बिजली की कीमतों में समय-समय पर सुधार किया जाए। हालाँकि गरीब परिवारों की मदद भी जरूरी है और ये काम नकद सब्सिडी हस्तांतरण, बेहद कम बिजली खपत वाले घरों में बेहद कम बिल (लाइफलाइन टैरिफ) और चुनिंदा घरों के लिए (टार्गेटेड) सब्सिडी की मदद से हो सकते हैं| इसके लिए राज्य सरकारें सामाजिक नीति के तहत पैसा उपलब्‍ध करा सकती हैं, जिससे बिजली वितरण कंपनियों के हाथ भी नहीं बंधेंगे और बेहद गरीब परिवारों और बेहद कम खपत वाले घरों को भी परेशानी नहीं होगी|

स्‍थानीय स्‍तर पर बिजली वितरण भी एक तरीका हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है क्योंकि घरों तक बिजली पहुंचाने के लिए ग्रिड का विस्‍तार करना बहुत मुश्किल या बहुत बड़ा काम है। वास्तव में भारत के सभी गांवों में पहले से ही बिजली पहुंची है, अर्थात् उनके पास बिजली के बुनियादी ढांचे हैं। इसके बावजूद ऐसे घरों की संख्‍या बहुत अधिक है, जहां बिजली कनेक्‍शन नहीं पहुंचे हैं। ऐसे में निजी उद्यमियों को भी यह सुविधा मिलनी चाहिए कि वे सरकारी परियोजनाओं की तरह उनसे कंधे से कंधा मिलते हुए बिजली कनेक्‍शन से वंचित घरों तक बिजली पहुंचा सकें।

गरीब परिवारों को भी सरकार से सब्सिडी तभी मिले जब वे स्‍थानीय स्तर पर पारम्परिक ग्रिड से (सोलर, पवन या पानी से बनने वाली) बिजली लेना पसंद करते हैं। इस बात को देखते हुए कि सरकारी ग्रिड लगभग हर जगह हैं,  पारम्परिक ग्रिड को भी सरकारी ग्रिड को बिजली बेचने की अनुमति दी जानी चाहिए। हम कह सकते हैं कि बिजली क्षेत्र में सुधार और स्‍थानीय स्‍तर पर ऊर्जा तकनीक का वितरण कर विद्युतीकरण में आने वाली शासनिक स्तर की समस्‍याओं को दूर किया जा सकता है। पावर सेक्टर में सुधार कर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता में भी सुधार लाया जा सकता है। ऐसा करके हम गरीबों को बुनियादी ऊर्जा सेवाओं का लाभ पहुंचा सकते हैं।

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