• जल संस्‍थान सिर्फ क्लोरीन नापकर पानी को कर रहा पास-फेल : स्‍वास्‍थ्‍य विभाग
  • पानी की आपूर्ति से पहले उसकी जांच की जिम्मेदारी जल संस्‍थान की

हाल ही में अखबारों में खबर छपी कि कई शहरों और मोहल्लों का पानी पीने लायक नहीं है। उत्तर प्रदेश के स्‍वास्थ्य विभाग की इस डरावनी रिपोर्ट के बाद आरओ का बिजनेस बढ़ना तय है। हालाँकि पानी की जांच स्वास्थ्य विभाग ने कैसे और किन मानकों पर की यह भी देखना जरूरी है। जल संस्‍थान कह रहा कि स्‍वास्‍थ्‍य विभाग केवल क्‍लोरीन की जांच कर रहा है, जबकि स्‍वास्‍थ्‍य विभाग कह रहा है कि उसकी जांच ठीक ढंग से हो रही है। उसने जल संस्‍थान को चुनौती दी है कि वह हमारे साथ चले और देखे कि पानी की जांच कैसे की जा रही है। इस पर जल संस्‍थान ने चुनौती स्‍वीकार करते हुए कहा कि वह स्‍वास्‍थ्‍य विभाग की टीम के साथ चलने को तैयार है। प्रस्‍तुत है the2is.com के लिए दीपाली अग्रहरि की रिपोर्ट :

हम कैसा पानी पी रहे हैं, ये कोई नहीं जानता। जो पानी हम पी रहे हैं, वह प्रदूषित भी हो सकता है। पीने के पानी (potable water) का सीधा संबंध हमारे स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ा है। पानी की आपूर्ति करने से पहले लैब में उसकी जांच होनी चाहिए, नियम तो यही है, लेकिन इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं। हालत यह है कि पीने के पानी की जांच (water testing) हेल्थ डिपार्टमेंट द्वारा बहुत चलताऊ तरीके से की जाती है। सिर्फ क्लोरीन (chlorine) का स्तर देख कर पानी को अच्छा या बुरा करार दे दिया जाता है। यह पड़ताल करने की कोशिश ही नहीं की जाती कि पानी की जांच की प्रक्रिया क्या है।

एडिशनल सीएमओ डॉ. सुनील रावत का कहना है कि नगर निगम और स्‍वास्‍थ्‍य विभाग मिलकर पानी के सैम्पल की डेली रिपोर्ट बनाते हैं। इसके बाद जो भी निगेटिव चीज़ें पानी में मिलती हैं, उसकी एक वीकली रिपोर्ट तैयार करते हैं। जल संस्थान को हमारा चैलेंज है कि वो हमारे साथ 10 दिन तक चलकर देखे कि कहाँ कमी है। जब कभी पानी की पाइप लाइन टूट जाती है, तो उसमें दूषित पानी भरने लगता है, जिसको पीने से बीमारियाँ (water borne diseases) होने लगती हैं। इस समय बारिश की वजह से पानी बहुत प्रदूषित हो रहा है। पानी पीने लायक है या नहीं इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा लखनऊ में पानी के सैम्पलों की लगातार जांच हो रही है और पानी में क्लोरीन है या नहीं, ये चेक किया जा रहा है। जल संस्‍थान की यह जिम्मेदारी है कि पानी की आपूर्ति से पहले वह उसकी पूरी तरह जांच करे।

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लखनऊ ऐशबाग जल संस्‍थान के सेक्रेटरी नीरज गौड़ का कहना है कि जल संस्‍थान द्वारा वाटर सप्लाई से पहले लैब में पानी से संबंधित सभी जरूरी टेस्ट किए जाते हैं। जैसे पानी में फ्लोराइड और नाइट्रेट कितना है और कितना होना चाहिए, आयरन है या नहीं, केमिकल कौन-कौन से हैं इत्‍यादि। सिर्फ क्लोरीन की उपस्थिति और अनुपस्थिति से पानी की गुणवत्ता को नहीं आंका जा सकता। पानी में क्लोरीन इसलिए मिलाया जाता है जिससे पानी में से बैक्टीरिया (इकोलाई) नष्ट हो जाएँ। स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के चैलेंज पर नीरज गौड़ कहते हैं कि यदि स्वास्थ्य विभाग चाहता है कि जल संस्थान का कोई मेम्बर रोजाना हो रहे पानी के सैम्पल की जाँच में उनकी टीम के साथ जाए, तो जल संस्थान भी उनकी टीम में शामिल होने के लिए तैयार है।

लखनऊ आईआईटीआर के वैज्ञानिक डॉ. मूर्ति बताते हैं कि बारिश से पानी में इकोलाई बैक्टीरिया बढ़ जाता है जिसे दूर करने के लिए पानी पंप करते समय उसमें क्लोरीन मिलाई जाती है। दूषित पानी पीने से कालरा, लूज मोशन और डायरिया जैसी बीमारियाँ हो जाती हैं। पानी में क्लोरीन होने से इसके चांसेज बहुत कम हो जाते हैं। ब्यूरो स्टैण्डर्ड मानक के अनुसार, पानी में क्लोरीन की मात्रा 0.2 मिलीग्राम/लीटर होना जरूरी है। वायरस की संभावना में ये मानक 0.2 मिलीग्राम/लीटर से 0.5 मिलीग्राम/लीटर तक हो सकता है।

                                                              पानी के पैरामीटर और ब्यूरो इंडियन स्टैंडर्ड गाइडलाइन्स

(जल संस्थान के इंजीनियर दावा कर रहे हैं कि पानी सीधे पीने लायक है। देखें लिंक – http://the2ishindi.com/?p=2665)