उत्तर प्रदेश में राजधानी लखनऊ स्थित गुरु गोबिन्द सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज में खेल और खिलाड़ियों को सँवारने और सुधारने की बजाय उसे बिगाड़ने का ही काम चल रहा है। कॉलेज में खिलाड़ियों को न तो ढंग से खाने को मिलता है, न प्रैक्टिस के लिए सही इंतजाम हैं और न कोच हैं। यही नहीं, इस कॉलेज में पैसा लेकर एडमिशन करने और बजट का पैसा खा जाने के भी आरोप हैं। प्रस्‍तुत है the2is.com के लिए शिवम अग्निहोत्री की पड़ताल :  

खिलाड़ियों की प्रतिभा को आगे बढ़ाना, उनको बढ़िया ट्रेनिंग देना और स्पर्धाओं में भागीदारी के अवसर दिलाना, यही उद्देश्य है गुरु गोबिन्‍द सिंह स्‍पोर्ट्स कॉलेज का, लेकिन इसकी परफॉरमेंस को फेल ही कहा जा सकता है। कॉलेज में न तो सही कोच हैं, न खिलाडियों के रहने के लिए ढंग का इंतजाम है, न ही उनके लिए ढंग का खाना-पीना है। आलम यह है कि कर्मचारियों की कमी के कारण कॉलेज के मैदाओं की घास खिलाड़ियों से कटवाई जाती है। गंदे-संदे और अँधेरे में डूबे हॉस्टल कॉलेज की दुर्दशा की अलग दास्ताँ हैं।



लगातार चार साल सीट से अधिक एडमिशन

आरटीआई से मिली सूचना के अनुसार, लगातार चार सत्र में कॉलेज में छात्रों की निर्धारित संख्‍या से अधिक एडमिशन किए गए। वर्ष 2012-13 में निर्धारित  345 सीटों के स्‍थान पर 376 स्टूडेंट्स को प्रवेश दिया गया।

  • वर्ष2013-14 में 345 सीटों पर 417 स्टूडेंट्स
  • 2014-15 में345 सीटों पर 515 स्टूडेंट्स
  • 2015-16 में345 सीटों पर 406 स्टूडेंट्स

यही नहीं, जो ज्यादा छात्र भर्ती किए गए, उनसे कोई फीस भी नहीं ली गई। जैसे कि वर्ष 2012-13 की सूची के अनुसार 376 में से 361 ने ही फीस जमा की।

  • 2013-14 में436 में से 417 ने फीस जमा की
  • 2014-15 में 515 में481 ने ही फीस जमा की।
  • 2015-16 में 406 में से391 ने ही फीस जमा की

डाइट के पैसे में भी धांधली

छात्रों को पौष्टिक खाना मिले, इसके लिए सरकार कॉलेज को पैसा देती है।  सरकार प्रति खिलाड़ी 225 रुपये देती है लेकिन छात्रों का कहना है कि उन्हें न तो सही खाना मिलता है और न कोई ड्रिंक मिलती है। सुबह के नाश्‍ते में सिर्फ अण्डा व ब्रेड दिया जाता है, जबकि डाइट में ड्रिकं शामिल है। दिन व रात का खाना इतना ऑयली होता है कि वह शरीर को नुकसान पहुंचाता है। जो खाना मिलता भी है, वह पूरा नहीं होता, कुछ न कुछ कमियां रहती हैं।

हॉस्टल में सुविधाओं का अभाव

खिलाड़ियों का कहना है कि हॉस्टल जर्जर होते जा रहे हैं, पानी और लाइट की सुविधा पर्याप्त नहीं है। कमरों की छतों से बरसात में पानी टपकता है और शिकायत करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती है। शिकायत करने पर हॉस्टल से निकालने की धमकी दी जाती है। खिलाडि़यों का आरोप है कि जिम का हाल यह है कि बरसात में उसमें पानी भर जाता है। जिम में मौजूद सामान भी काफी पुराने और जर्जर हालत में हैं।

इंटरनेशनल व नेशनल लेवल के खिलाड़ियों को फंड न मिलना

इंटरनेशनल व नेशनल लेवल पर खेल चुके और पदक विजेता खिलाड़ियों को स्पर्धा में भाग लेने का कोई भी पैसा (पार्टिसिपेशन मनी) उत्‍तर प्रदेश सरकार ने बीते कई वर्षों से नहीं दिया है। खिलाड़ियों का यह भी आरोप है कि उन्हें पुरस्कार स्वरूप कोई राशि भी नहीं मिली है।

मिसाल के तौर पर एशियाई चैम्पियनशिप में भाग लेने वाले यूपी के अजय कुमार सरोज, सुधा सिंह व अन्य को न तो कोई पार्टीसिपेशन मनी दी गई और न पदक विजेता को पुरस्कार।

साइकोलॉजिस्ट व मेडिकल सहायता भी नहीं

कोच कमल कुमार सिंह का कहना है कि अन्य प्रदेशों में जिस तरह खिलाडि़यों के लिए साइकोलॉजिस्ट व स्पोर्ट्स मेडिसिन की सुविधाएं हैं, वैसी सुविधाएं उत्‍तर प्रदेश में न होने की वजह से खिलाड़ियों पर काफी असर पड़ रहा है। यूपी के अधिकतर स्पोर्ट्स कॉलेजों में साइकोलॉजिस्ट नहीं हैं, जिसकी वजह से खिलाड़ियों का खेल के प्रति मानसिक विकास नहीं हो पा रहा है। कुछ ऐसा ही हाल मेडिकल सहायता का भी है, क्‍योंकि जब कोई भी खिलाड़ी चोटिल हो जाता है तो उसे इलाज खुद ही कराना पड़ता है। संस्थान की तरफ से या सरकारी इलाज की सुविधा नहीं है, जबकि सरकार मेडिकल का पैसा कॉलेज को देती है।



प्रतियोगिताओं के लिए कोई सुविधा नहीं

  • इंटरनेशनल एथलीट मोनिका चौधरी कहती हैं – सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिलती है, जबकि केन्द्र सरकार पैसा भेजती है। अन्य राज्‍यों के खिलाड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्‍सा लेने के लिए हवाई जहाज से सफर करते हैं, जबकि हम ट्रेन से कई दिनों का सफर तय करके पहुंचते हैं जिससे कई बार हमारी ट्रेनिंग भी छूट जाती है।
  • कोच कमल कुमार सिंह कहते हैं – उप्र में आज भी खिलाड़ियों के लिए अच्छी सुविधाएं नहीं हैं। गुरु गोबिन्द सिंह स्पोर्ट्स कॉलेजमें जितने भी सिन्थेटिक ट्रैक और कोर्ट हैं, वे किसी भी प्रतियोगिता के लिए तैयार नहीं हैं। इनमें अनेक कमियां हैं। ट्रैक कम्पलीट होने के बाद भी उसमें बॉर्डर व अन्य कमियां है जिसकी वजह से यहां सिर्फ प्रैक्टिस ही की जा सकती है। संस्थान को खिलाड़ियों की लिविंग स्टाइल पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे उनके खेल का सही से विकास हो सके।

नए प्रिंसिपल का दावा – सुधार लाएंगे

आरटीआई के तहत प्राप्त सूचना से खुलासा हुआ था कि पैसे लेकर कॉलेज में निर्धारित कोटे से अधिक प्रवेश लिये गए। ऐसा लगातार कई सालों तक होता रहा। शिकायत मिलने के बाद तत्‍कालीन प्रिंसिपल अनिल कुमार बनौधा को हटा दिया गया और उनकी जगह अजय कुमार गुप्ता को नया प्रिंसिपल नियुक्‍त किया गया। अजय गुप्‍ता बताते हैं कि कोच की नियुक्ति कर सरकार कॉलेज की स्थिति सुधारने का प्रयास कर रही है।