• कहीं ज्यादा ताकतवर ना बन जाए इसलिए प्रोग्राम किया बंद, फिर भी कई और कंपनियां कर रहीं काम
  • अब सताने लगा है डर, कहीं आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस के गुलाम न बन जाएं हम  

आप में से कितने ऐसे होंगे, जिन्होंने कंप्यूटर के साथ शतरंज खेला होगा? यकीनन कई लोगों ने …। लेकिन कंप्यूटर से जीतने वालों की संख्या कम होगी। दरअसल, शतरंज आपकी हर चाल का जवाब पलक झपकते ही दे डालता है। क्या आप जानते हैं, यह सब कैसे संभव है? आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धि (एआई) के कारण। एआई आज इतना फास्ट हो चुका है कि कई बार यह हमारे लिए चुनौती भी बनता जा रहा है। हालाँकि हाल में एक ऐसा वाकया हुआ जिसने सबके कान खड़े कर दिए। इसे सुनने और समझने के बाद लगने लगा कि हमारी मदद करने वाले कंप्यूटर हमीं पर राज न करने लगें। इस मसले पर रिपोर्ट पेश कर रहे हैं  the2is.com के रजनीश राज :

वैसे तो आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस कोई नया विषय नहीं है, लेकिन इधर फेसबुक पर विकसित कृत्रिम बुद्धि प्रणाली ने अपनी स्वयं की भाषा विकसित कर सबको चौंका दिया है। फेसबुक की आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस इतनी स्मार्ट हो गई है कि उसने अपने संचार को अधिक कुशल बनाने के लिए कोड शब्दों की एक अलग प्रणाली ही विकसित कर डाली। फेसबुक के शोधकर्ताओं ने देखा है कि इसकी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस ने अंग्रेजी छोड़कर अन्य भाषा विकसित कर ली थी। सिर्फ इतना ही नहीं, इसका उन्नत सिस्टम अन्य एआई एजेंटों के साथ बातचीत करने में सक्षम भी हो गया था। यह हैरान करने वाली घटना थी। इसका पटाक्षेप करते हुए इस पर शोध करने वाले विशेषज्ञों को सिस्टम ही बंद करना पड़ा, क्योंकि इसके आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस पर नियंत्रण रखने की संभावनाएं बहुत कम हो चुकी थीं। फेसबुक ने तो ये प्रोग्राम बंद कर दिया लेकिन दुनिया में ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जो आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस पर काम कर रही हैं। तो क्या भविष्य में आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धि) हमारा बॉस तो नहीं बन जाएगा?



क्या है कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ?

आगे बढ़ने से पहले आइए समझते हैं आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता वास्तव में है क्या? जब एक मशीन के पास कृत्रिम बुद्धि होती है तो यह एक मानव मस्तिष्क की तरह सोच-विचार कर कार्य कर सकता है। यह कंप्यूटर विज्ञान का एक हिस्सा है। ऐसी मशीनों को सीखने के लिए सक्षम होना चाहिए। अपने दम पर निर्णय लेने के लिए सक्षम होना चाहिए। संक्षेप में कहा जाए तो एआई कुल मिलाकर एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो तय की गई बुद्धिमत्ता का उपयोग कर कार्य कर सकता है।

artificial intelligenceआर्टीफिशियल इंटेलिजेंस के कुछ कारनामे सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने पूरे एक साल की कोडिंग के बाद कृत्रिम बुद्धि वाली सहायक प्रणाली जारविस (Jarvis) को घर का हिस्सा बना लिया था। लेकिन इससे उनको सुविधा की जगह दुश्‍वारियों का ही सामना करना पड़ा। मार्क जुकरबर्ग की पत्नी डॉ. प्रिसिला चैन को इस बात का मलाल रहा कि जारविस सिर्फ उन आदेशों का पालन करता था, जो मार्क जुकरबर्ग की आवाज़ में दिए गए हों। दूसरी आवाज में दिए गए निर्देश का वह पालन नहीं करता था।

दूसरे मामले में गूगल की अनुवाद सेवा को लिया जा सकता है। गूगल ने अपनी अनुवाद सेवा में सुधार किया है। उसके बाद से यह प्रणाली अब अधिक कुशलता से अनुवाद करने में सक्षम है। लेकिन गूगल की टीम को उस समय आश्चर्य हुआ जब उसने पाया कि एआई ने चुपचाप अपनी स्वयं की भाषा विकसित कर ली है, जो विशेष रूप से वाक्यों के अनुवाद के कार्य के अनुरूप है।

वहीं, एक गूगल कंप्यूटर के आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस ने गो नामक एक जटिल चीनी खेल के चैंपियन व्यक्ति को हरा दिया। इस खेल में शतरंज की तुलना में कई गुना अधिक जटिलताएं होती हैं और ऐसा माना जा रहा था कि एक मशीन द्वारा विश्वचैंपियन को हरा पाना बहुत दूर की बात होगी।artificial intelligence

बिना ड्राइवर के चलने वाली स्वचालित कारें एआई के बल पर ही अपने आसपास की चीजों की पहचान कर लेती हैं और सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती हैं। ये कारें अपने पीछे आ रहे वाहन का अनुमान लगा कर अपना रास्ता भी बदल सकती हैं। हालांकि भारत में ऐसी कारों को अभी स्वीकृति नहीं मिली है।

भविष्य की बात

उत्तर प्रदेश के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के इनोवेशन अधिकारी संदीप द्विवेदी कहते हैं कि इसमें दो राय नहीं है कि आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस कई समस्याओं के समाधान बहुत तीव्रता से कर सकता है। यह मनुष्य की क्षमता से परे रहेगा। भविष्य में होने वाला यह परिवर्तन इतना जोरदार होगा कि इसकी कल्पना करना भी अभी संभव नहीं है। इस बुद्धिमत्ता की रचना के बाद हमारे भविष्य का स्वरूप कैसा होगा, इसे कहना आज के समय में जरा कठिन है। लेकिन हमें सजग रहना होगा कि पानी कहीं सिर से ऊपर न आ जाए।

आरडीएसओ के पूर्व निदेशक, वैज्ञानिक और बाल साहित्यकार संजीव जायसवाल कहते हैं कि मशीन में भावनाएं नहीं होती हैं। मशीन को बुद्धि देने का अर्थ है, स्वयं को थाली में रखकर परोसना। आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस से अगर उसके अंदर शासक की भावना आ गई तो यह कितना भयावह होगा, इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती है।

न्यूक्लियर पॉवर कारपोरेशन के वरिष्ठ अधिकारी अमृतेश श्रीवास्तव कहते हैं कि  1980 के दशक में बताया गया था रोबोट का राज स्थापित हो रहा है। लग रहा था कि यह लोगों की नौकरियां छीन लेगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं । एआई के मामले में भी ऐसा ही होगा। कृत्रिम बुद्धि चाहे कितनी भी बढ़ जाए, इसके रचयिता तो हम ही होंगे। जबतक हमारा उस पर कमांड रहेगा, सबकुछ ठीक रहेगा। अब इस बात को तो कोई नकार ही नहीं सकता है कि विज्ञान के साथ ही हमें भविष्य में रहना होगा।

सामाजिक विषयों के चिन्तक शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि सूचना तकनीक का विस्तार साल-दर-साल तेज ही होता जा रहा है। तकनीक में तेजी से बदलाव आ रहा है और भविष्य की कल्पना करना आसान नहीं दिख रहा है। सबकुछ ठीक रहेगा अगर विज्ञान को मनुष्य का बॉस न बनने दिया जाए और रिमोट खुद के हाथों में ही रखा जाए।

कृत्रिम बुद्धि पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन  

फिलहाल कृत्रिम बुद्धि पर दुनिया भर में मंथन का दौर जारी है। उससे संबंधित  विचारों और अनुभवों को साझा करने के लिए हर दो साल में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इस सम्मेलन का लक्ष्य भारत सहित पूरी दुनिया में एआई तथा उससे संबंधित क्षेत्रों में विकासात्मक गतिविधियों और अनुसंधान को बढ़ावा देना है। इस सम्मेलन के माध्यम से शोधकर्ताओं, डेवलपर्स, इंजीनियरों, छात्रों और भारत तथा विदेशों में काम कर रहे चिकित्सकों के बीच वैज्ञानिक जानकारी के आदान-प्रदान को बढ़ावा भी दिया गया है।

कई फिल्में बन चुकीं हैं इस विषय पर

i robot में Viki ने इंसानों को कैद करने की योजना बनाई थी, तो टर्मिनेटर सीरीज में पूरी दुनिया से इंसान ख़त्म करने की योजना का प्लाट था। भारत में बनीं रजनीकांत की ‘रोबोट’ और शाहरूख खान की ‘रा-वन’ भी इसी विषय पर थीं।