• चीन से बढ़ते तनाव के बीच संभव है चीनी प्रोडक्‍ट्स का बहिष्‍कार ?

पाकिस्तान से चीन की बढ़ती नजदीकियां और सिक्किम बॉर्डर पर भारतचीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर चीनी सामानों का बहिष्कार करने की मुहिम चल रही है। ट्विटर, फेसबुक पर लोग #BoycottChineseProducts लिखकर चीनी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल नहीं करने की अपील कर रहे हैं। लेकिन सच्‍चाई ये है कि आज हमारे आपके रसोई घर व बेडरूम और रोजमर्रा के जीवन में चीनी सामानों की घुसपैठ हो चुकी है। चीनी सामान का पूर्ण बहिष्कार तो असंभव है क्योंकि कोई विकल्प ही मौजूद नहीं है। प्रस्‍तुत है the2is.com के लिए  शिवम अग्निहोत्री और धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की पड़ताल :

भारत आज चीनी वस्‍तुओं का बड़ा केंद्र बन गया है। करीब एक दशक पहले भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ आई थी। 1987-88 में चीन से आयात मात्र 0.015 अरब डालर ही था, जो 2015-16 में बढ़कर 61.7 अरब डालर तक पहुंच गया। चीन में बने कंज्यूमर गुड्स भारत की अपेक्षा सस्ते और बेहतर क्वालिटी के होते हैं। इस कारण रोजमर्रा का जीवन सिर्फ मेड इन इंडिया पर चल पाना बेहद मुश्किल हो गया है। इसके अलावा हेवी मशीनरी, टेलिकॉम उपकरण, केमिकल्स समेत तमाम क्षेत्रों और इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में चीनी सामानों पर हमारी निर्भरता बहुत ज्यादा हो गई है।



रोजमर्रा के जीवन का हिस्‍सा बने चीनी सामान

चीन में बने सामान अब इलेक्ट्रॉनिक वस्‍तुओं तक ही सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि बेडरूम से लेकर बाथरूम व किचेन तक हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्‍सा बन गए हैं। दीवाली, होली, रक्षाबंधन जैसे प्रमुख त्योहारों पर चाइना मेड सामान से हमारे बाजार पट जाते हैं। होली पर चीनी रंगों, पिचकारी और स्प्रिंकल्स की भारत में भरमार हो जाती है। भारतीय रंग की तुलना में चीनी रंग और पिचकारी 60% तक सस्ते होते हैं। भारत के रंगों से जुड़े 75% फीसद कारोबार पर चीन का कब्जा है। भारत में जिस तरह चीन में बने खिलौनों और भारतीय देवी-देवताओं की मूर्तियों की बाढ़ आई है, वह अपने देश में बढ़ती चीन की उपस्थिति का प्रत्‍यक्ष प्रमाण है। डेढ़ दशक पहले तक बाजार में चाइनीज सामान की हिस्सेदारी 30 फीसदी थी, जो आज 60-70 फीसदी हो गई है।

कहां तक गिनाएं – चीन में बने जूते, टीशर्ट, साइकिल, टेलीविजन, कैलकुलेटर, घड़ियां, पंखे, ताले, बैटरियां, साइकिल,फर्नीचर और ऑटो पार्ट्स तक भारत में किफायती दामों में उपलब्ध हैं। जो वस्‍तुएं चीन से सबसे ज्यादा आयात की जाती हैं, उनमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनें, इंजन, पम्प, केमिकल, उर्वरक, लोहा, स्टील, प्लास्टिक, गहने और सिक्कों के धातु, चिकित्सा के उपकरण और कपड़े आदि शामिल हैं।

गैजेट्स पर चीन का एकछत्र राज

जिस स्मार्टफोन या लैपटॉप से लोग चीनी सामान का बहिष्कार करने की बात कर रहे हैं, उन सबमें चीन जुड़ा हुआ है। माइक्रोमैक्स, लावा, कार्बन, इंटेक्स, LYF, ओनिडा, रिंगिंग बेल्स, स्पाइस, वीडियोकॉन, YU टेलिवेंचर्स – इन सभी कंपनियों के स्मार्टफोन चीन में बनते हैं। और जो मेड इन इंडिया का दावा करते हैं, उनमें भी कोई न कोई पुर्जा चीन का लगा होता है। स्मार्टफोन में इस्‍तेमाल होने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम और ज्‍यादातर ऐप भी चीन निर्मित ही हैं। शाओमी, सैमसंग, मोटोरोला, लेनोवो और अमेरिकी व साउथ कोरियन कंपनियां अपने जितने गैजेट्स भारत भेजती हैं, वो चीन के ही बने होते हैं। यही नहीं, दिग्गज एप्पल जैसी कंपनी के आईफोन भी चीन में असेंबल होते हैं। क्वालिटी के साथ सस्ते होने की वजह से इसे खरीदना लोगों की जरूरत बन चुका है। चीनी हैंडसेटों के विभिन्‍न ब्रांड अब भारत में सेलफोन के 50 प्रतिशत बाजार पर कब्‍जा कर चुके हैं।

दवाइयों के कच्‍चे माल के लिए चीन पर निर्भरता

भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी के बाद सबसे ज्यादा अगर किसी चीज का आयात चीन से होता है तो वो है दवाइयों के लिए कच्‍चा माल। दवाइयों की बड़ी कंपनियां कच्चे माल के लिए चीनी कंपनियों पर निर्भर हैं। केंद्र सरकार के दवाओं की कीमतों पर सख्ती और जेनेरिक दवाएं लिखने पर जोर देने के बाद दवा कंपनियों ने भारतीय एपीआई की जगह चीनी एपीआई का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। एपीआई यानी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स। ये इंटरमीडिएट्स, टेबलेट्स, कैप्सूल्स और सिरप बनाने में इस्‍तेमाल होने वाला कच्‍चा माल हैं। चीनी एपीआई, भारतीय एपीआई से चार गुना तक सस्ती होती है।

चीन से एपीआई इम्‍पोर्ट

एपीआई के लिए चीन पर निर्भरता ऊपर दिए गए आंकड़ों से समझी जा सकती है। इन तीन सालों में भारत ने कुल 60,041.25 करोड़ के इम्पोर्ट में 38,672.69 करोड़ का यानी लगभग 65% रॉ मैटीरियल केवल चीन से इम्पोर्ट किया। चीन पर बढ़ती निर्भरता से भारत का एपीआई उद्योग काफी हद तक नष्ट हो गया। इसी का लाभ उठाते हुए पिछले दिनों चीन ने फॉलिक एसिड (विटामिन बी कांप्लेक्स के लिए रसायन) की कीमत करीब 10 गुणा बढ़ा दी है।

ऊर्जा जैसे क्षेत्र पूरी तरह चीन पर निर्भर

भारतीय सौर ऊर्जा परियोजना के लिए करीब 80 फीसदी पावर प्लांट उपकरण चीन से मंगाए जा रहे हैं। अगर इस चीनी आपूर्ति पर रोक लगा दी जाए तो भारत की सौर ऊर्जा परियोजना 8 से 10 प्रतिशत महंगी हो जाएगी। इसके अलावा एक अन्‍य उपकरण है – बायलर टर्बाइन जेनरेटर (बीटीजी)। बहुत से बिजली उत्‍पादकों ने चीनी बीटीजी लगाए हैं। केवल 12वीं योजना के दौरान ही करीब 30% बिजली उत्‍पादकों चीनी बीटीजी का इस्‍तेमाल किया।

चीन से व्‍यापार घाटे में बढ़ोतरी

लगातार बढ़ते आयात की वजह से भारत का व्यापार घाटा 2015-16 तक बढ़कर 52.7 अरब डालर तक पहुंच गया। 2016-17 में हालांकि चीन से आयात में 1.5 अरब डालर की कमी आई है, लेकिन अब भी यह व्यापार घाटा बहुत ज्‍यादा है। आज दोनों देशों के बीच 71.5 अरब डालर का सालाना द्विपक्षीय व्यापार है। इसमें भारत चीन से 61.3 अरब डालर का सामान आयात करता है, जबकि निर्यात महज 10.2 अरब डालर का होता है।

व्यापारी चीनी उत्पादों की बिक्री के खिलाफ नहीं

अमीनाबाद के खिलौना व्यापारी शोभित अग्रवाल का कहना है कि बाजार में बिकने वाले खिलौनों में तो अधिकतर चाइना मेड हैं, हम चीनी खिलौनों का बहिष्कार करें फिर बेचेंगे क्या?

हजरतगंज के मोबाइल विक्रेता अनिरुद्ध मल्‍होत्रा ने बताया कि मोबाइल तो ज्यादातर चाइनीज ही हैं। चीन का बहिष्कार करने लगे तो मोबाइल बेचना बंद करना पड़ेगा. चीन मुक्त माल है कहाँ?

सच्‍चाई यही है कि चीन दुनिया का मैन्युफेक्चरिंग हब बन चुका है। नामी-गिरामी कम्पनियों के ज्यादातर उपकरण चीन में ही बने होते हैं। भारत के बहुत सारे उत्पादक आज केवल ट्रेडर्स बनकर रह गए हैं। आवश्‍यकता चीनी सामानों के बहिष्‍कार की नहीं, बल्कि अपने यहां मैन्‍यूफैक्‍चरिंग यूनिट को बढ़ावा देने की है। तभी हम इस चुनौती से पार पा सकेंगे।