प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर किसान संगठनों ने उठाए सवाल

किसानों को फसल बर्बादी की समस्या से बचाने के लिए करीब डेढ़ साल पहले देश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू हुई थी। यह योजना लागू होने से पहले अलगअलग राज्यों में फसल बीमा योजना लागू थी, लेकिन लगातार ये आरोप लगते रहे कि इसमें किसानों को मुआवजे के नाम पर धोखाधड़ी की जाती है इन शिकायतों के बाद पूरे देश में जनवरी, 2016 में एक ही योजनाप्रधानमंत्री फसल बीमा योजनालागू की गई। लेकिन अब यह योजना भी सवालों के घेरे में है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को तो कम फायदा हो रहा है, लेकिन बीमा कंपनियां मालामाल हो रही हैं। प्रस्‍तुत है the2is.com के लिए धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट :



प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर सरकार के दावे तो बहुत हैं लेकिन कई किसान संगठनों का आरोप है कि 2016 के खरीफ सीजन से लागू इस योजना में किसानों को तो कम, निजी बीमा कंपनियों को ज्‍यादा फायदा हो रहा है। किसान से प्रीमियम ले कर बीमा कम्पनियाँ मालामाल हो रही हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि योजना लागू हुए अभी एक साल ही हुए हैं और वह इस दौरान आई समस्‍याओं के बारे में जानकारियां जुटा रही है।

केंद्रीय कृषि राज्‍यमंत्री पुरुषोत्‍तम रुपाला ने 28 मार्च, 2017 को लोकसभा में एक प्रश्‍न के उत्‍तर में बताया था कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा कंपनियों ने 2016 में खरीफ सीजन के लिए 9,000 करोड़ रुपये से अधिक प्रीमियम जमा किया था। इसमें किसानों द्वारा जमा की गई धनराशि सिर्फ 1,643 करोड़ थी। बाकी की रकम केंद्र और राज्‍य सरकारों द्वारा सीधे बीमा कंपनियों को उपलब्‍ध कराई गई थी।

अब आते हैं असली मुद्दे पर। पहले साल खरीफ सीजन के लिए किसानों ने फसल क्षतिपूर्ति के लिए जो क्‍लेम किया, उसकी धनराशि 2,725 करोड़ रुपये है। अब अगर हम मान लें कि बीमा कंपनियां किसानों का सारा क्‍लेम उन्‍हें दे देती हैं, उसके बाद भी कंपनियों को होने वाला मुनाफा 6,357 करोड़ होगा। यह आंकड़ा महज खरीफ के एक सीजन का है।

बताया जा रहा कि मार्च, 2017 तक बीमा कंपनियों ने किसानों द्वारा किए गए 2,725 करोड़ रुपये के क्लेम के बदले सिर्फ 639 करोड़ रुपये का भुगतान ही किया है। खरीफ सीजन के लिए कुल 2.5 करोड़ किसानों ने बीमा कराया था, लेकिन 32.7 लाख किसानों को ही बीमा का लाभ मिला।

फसल बीमा योजना : आंकड़ों में 2016 का खरीफ सीजन 

दिलचस्प तथ्‍य यह है कि इस महत्‍वाकांक्षी योजना के पहले चरण में जुड़ी बीमा कंपनियों में सरकारी बीमा कंपनी की उपस्थिति नाममात्र की है। सरकारी क्षेत्र की एग्रीकल्चर इन्श्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड (एआईसी) को ही इस योजना से जोड़ा गया है। वहीं इस योजना से जुड़ी आईसीआईसीआई लोम्‍बार्ड, एचडीएफसी अर्गो, इफ्को टोकियो, चोलामंडलम एमएस, बजाज अलियांज, फ्यूचर जेनराली, रिलायंस जनरल इंश्योरेंस, टाटा एआईजी आदि निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियां हैं। देश में बीमा क्षेत्र में अहम योगदान दे रहीं चार प्रमुख सरकारी कंपनियों – नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को फसल बीमा योजना से नहीं जोड़ा गया। सरकारी बीमा कंपनियों ने इस योजना में शामिल होने के लिए काफी जोर लगाया लेकिन उनको सफलता नहीं मिली।



सरकारी बीमा कंपनी एआईसीआईएल द्वारा विभिन्‍न राज्‍यों में एकत्र प्रीमियम और लाभान्वित किसान

(स्रोत : स्‍टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2017)

खामियां ही खामियां

इस योजना में और भी कई कमियां सामने आई हैं। किसान संगठनों का आरोप है कि कई जगह किसानों के बैंक खातों से जबरन प्रीमियम राशि काट ली गई। किसानों का यह आरोप भी था कि फसल बीमा योजना में धोखाधड़ी हो रही है। उनकी खाली पड़ी जमीन का भी बीमा कर प्रीमियम का पैसा काट लिया गया  जबकि कई जगहों पर उनके खेत में ज्वार की फसल को धान की फसल दिखा कर प्रीमियम ले लिया गया। हरियाणा के झज्जर ज़िले में कुछ किसानों ने क्लेम का पैसा नहीं मिलने पर इस बार बैंक को बीमा के लिए मना किया, लेकिन इसके बावजूद बैंक ने जनवरी में फिर प्रीमियम का पैसा काट लिया। यही नहीं, एक किसान ने फसल तो बाजरे की लगाई लेकिन बैंक ने बीमा धान का कर दिया।

जोर जबरदस्ती भी

कई जगह यह भी देखने में आ रहा है कि बैंक किसान क्रेडिट कार्ड पर लोन तभी दे रहे हैं, जब किसान बीमा कराए। यह तो किसानों के साथ एक तरह की जबरदस्‍ती है। सवाल यह है कि किसान की सहमति के बिना उसका बीमा कैसे किया जा सकता है। दूसरे, किसानों को बीमे का पैसा लेने के लिए भी बहुत पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। उन्‍हें कई-कई बार बैंकों के चक्‍कर लगाने पड़ते हैं, इसके बाद भी पैसा नहीं मिलता। आखिर किसानों की भलाई के लिए शुरू की गई इस योजना में उन्‍हें ही इसका फायदा न मिले तो इस फसल बीमा योजना का मतलब क्या हुआ?