• हाल ही में दिल्ली गोल्फ क्लब में मेघालय की ल्‍यंगदोह का हुआ अपमान
  • ज्‍यादातर क्‍लबों में अनिवार्य है फार्मल ड्रेस, तभी मिलता है प्रवेश

भारत में अंग्रेज़ी शासन 70 साल पहले ही ख़त्‍म हो गया था लेकिन आज भी कई संस्थानों में उस ज़माने के नियम कायदे ही लागू हैं। इन्‍हीं नियमों में से एक है ड्रेस कोड कुछ क्लब आज भी वही ड्रेस कोड चला रहे हैं जो आज़ादी से पहले तय किए गए थे। इसकी वजह से क्लब मालिकों की तरफ से लोगों को अपमान का सामना करना पड़ता है। क्लबों के इस व्‍यवहार के कारण भेदभाव के कई मामले सामने आए हैं। the2is.com के लिए प्रस्‍तुत है दीपाली अग्रहरि और ईशी आर्या की रिपोर्ट :

25 जून, 2017 को दिल्‍ली गोल्फ क्लब ने मेघालय की तेलिन ल्‍यंगदोह को उनकी पारम्‍परिक वेशभूषा की वजह से अपमानित करके क्‍लब से बाहर निकाल दिया। तेलिन ल्‍यंगदोह अपनी नियोक्ता निवेदिता बरठाकुर के साथ प्रतिष्ठित दिल्ली गोल्फ क्लब में लंच मीटिंग के लिए गई थीं। खाना आने से पहले ही क्लब के प्रबंधकों ने उनसे बाहर जाने को बोल दिया क्‍योंकि उनकी ड्रेस क्लब के नियमों के अनुरूप नहीं थी। वहां के कर्मचारियों ने उनको अभद्र और जातिसूचक शब्द बोले, उनकी पोशाक को नौकरानियों का पहनावा कहा। और तो और, उन्‍हें ‘डस्टबिन’ तक कहा। अधिकारियों ने उन्हें दूसरी तरफ बैठने को कहा, जो घरेलू लोगों के लिए आरक्षित था।



यह कोई पहली घटना नहीं है। लखनऊ से लेकर दिल्ली–मुंबई के क्लबों तक में ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करवाया जाता है। इस ड्रेस कोड में ख़ास रंग के पैंट–शर्ट, टाई, फॉर्मल जूते आदि शामिल हैं। कोई शख्स अगर पारंपरिक भारतीय वेशभूषा में इन क्लबों में जाए तो उसे दरवाजे से ही लौटा दिया जाता है। यहाँ तक कि धोती-कुरता या कुरता-पैजामा तक मंजूर नहीं है। वैसे ड्रेस कोड दुनिया के लगभग हर देश में बड़े क्लबों-रेस्टोरेंट्स आदि में माने जाते हैं। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि ड्रेस कोड से औपचारिक माहौल बनता है। लोगों का मानना है कि भारत में ही भारतीय परिधानों को नीची निगाह से देखना स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।

कुछ घटनाएं

  • साल 2015 में अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक को लखनऊ के एमबी क्लब ने अन्दर नहीं आने दिया था क्‍योंकि वो कुरते-पैजामे में थे और क्लब के ड्रेस कोड का उल्‍लंघन कर रहे थे।
  • 2014 में मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस डी. हरिपरंथामन को तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन क्लब ने अंदर आने की अनुमति नहीं दी क्‍योंकि वो धोती पहन कर आए थे, जबकि वो कार्यक्रम के गेस्ट ऑफ़ ऑनर थे।
  • क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी को 1987 में चेन्नई के एक क्लब ने प्रवेश नहीं दिया था क्योंकि वह फॉर्मल ड्रेस में नहीं थे। यहीं के एक क्लब से प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह भी लौटा दिए गए थे।

लखनऊ के एमबी क्लब में ड्रेस कोड

  • सर्दियों में सदस्यों को कालर वाली गोल गले की शर्ट पहननी होती है।
  • सेंडल, फ्लोटस, खेलने वाले जूते, फीते वाले जूते नहीं पहन सकते, केवल फॉर्मल जूते ही पहन सकते हैं।
  • जबसे क्लब बना है, तभी से ड्रेस कोड यहां लागू है और इन्‍हीं ड्रेस की वजह से इसके सदस्यों को पहचाना भी जाया जा सकता है।
  • सिर्फ सदस्यों को ही ड्रेस कोड मानना होता है, घूमने आने वाले लोगों को नहीं।
  • केवल पुरुषों के लिए ही ड्रेस कोड है, महिलाओं के लिए नहीं।

तेलिन ल्‍यंगदोह

मेघालय की तेलिन ल्‍यंगदोह खासी जनजाति से संबंधित हैं। खासी महिलाओं की परंपरागत पोशाक ‘जैन्सेम’ है जिसमें ब्लाउज के साथ नीचे एक लहराती हुई ड्रेस होती है जो गर्दन के पीछे बांधी जाती है। ल्‍यंगदोह अपनी नियोक्ता के साथ कई देशों का भ्रमण कर चुकी हैं। खासी महिलाएं बच्चे पालने की कला के लिए जानी जाती हैं और वो काफ़ी सालों से निवेदिता बरठाकुर के लिए काम कर रही हैं। वो हर देश में अपनी परंपरागत पोशाक ‘जैन्सेम’ ही पहन के गई हैं और कहीं भी किसी ने आपति नहीं जताई।

पारंपरिक पोशाक या जैन्सेम

खासी महिलाओं की पारंपरिक पोशाक को ‘जैन्सेम’ कहते हैं। उसमें ऊपर एक ब्लाउज होता है और फिर एक सूती कपड़ा होता है जो पैरों तक रहता है। इसे गर्दन के पीछे बाँधा जाता है। खास मौकों पर ‘जिम्‍पेन’ पहना जाता है जो असम के खास रेशम ‘का जैन्सेम धारा’ से बना होता है और जैन्‍सेम की तरह ही पैरों तक रहता है। ’तप्मोह्खिएह’ सिर पर पहनने वाली शाल है जो सिर के पीछे बाँधी जाती है।

बदलता परिदृश्‍य

पिछले दिनों आईआईटी कानपुर ने कन्‍वोकेशन के समय अपना बरसों पुराना पहनावा, औपचारिक और यूरोपियन कपड़े पहनने का रिवाज़ तोड़ दिया। 15 और 16 जून को हुए कन्वोकेशन समारोह में छात्रों ने लाल दुपट्टे के साथ सफ़ेद कुरता-पजामा पहना था। उन्‍होंने पारंपरिक गाउन और हेडगियर भी नहीं पहना।

मध्य प्रदेश सरकार ने भी तय किया है कि सारे कन्वोकेशन समारोह में ‘भारतीय परिधान’ ही पहने जाएंगे। इस नई ड्रेस में पारंपरिक गाउन को हटाकर भारतीय पारंपरिक पोशाक लाई जाएगी। कुलपति की कमेटी के अध्यक्ष संगीत शुक्ला ने कहा है, ‘हमें अंगरेजों की विरासत को अपने कन्वोकेशन समारोहों से हटा देना चाहिए।‘

हालांकि दिल्ली गोल्फ क्लब की इस बात के लिए बड़ी सराहना हो रही है कि उसने बड़ी जल्दी इस घटना पर कार्रवाई की। लेकिन सवाल यह है कि इसकी ज़रूरत ही क्यों पड़ी? हम एक बदले हुए समाज की तरफ जा रहे हैं लेकिन इसकी प्रक्रिया बहुत धीमी है। लोगों को अपने दिमाग से यह निकाल देना चाहिए कि अंग्रेजों का तरीका सबसे अच्छा है। हम हिंदुस्तान में रहते हैं जो इतना महान देश हैं, तो हमें अपने रीति-रिवाजों को बढ़ावा देना चाहिए। इस दिशा में कुछ कार्य किए जा रहे हैं और इनकी सराहना होनी चाहिए।

लिंक देखिएं

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