सस्ता केरोसिन मिलने के कारण सौर ऊर्जा को नहीं अपना रहे ग्रामीण

हर घर को बिजली पहुँचाना भारत सरकार का महत्वपूर्ण लक्ष्य है और इस लक्ष्य को पाने की दिशा में सोलर माइक्रो ग्रिड एक बड़ा कदम हैसौर ऊर्जा से लोगों को बिजली मिले, इसके लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए गए लेकिन एक शोध अध्ययन में पता चला है कि सब्सिडी वाला केरोसिन सौर ऊर्जा की राह में बड़ी बाधा है. प्रस्‍तुत है the2is.com के लिए ईशी आर्या की रिपोर्ट :

वैकल्पिक ऊर्जा ख़ासकर सौर ऊर्जा (सोलर एनर्जी) को बढ़ावा देने के लिए सरकार तमाम तरह के कदम उठा रही है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा के प्रति लोगों में उत्साह नहीं जग पा रहा है। एक शोध अध्ययन के अनुसार, इसका कारण सरकारी रेट वाले सस्ते केरोसिन की उपलब्धता है, यानी जब लोगों को सस्ते में केरोसिन मिल रही तो वे सौर ऊर्जा का महंगा उपकरण खरीदने में कोई रुचि नहीं रखते।



Science Development नामक एक पत्रिका में हाल में जोहानेस उर्पेलेनिन का एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है। इसमें माइक्रो ग्रिड के उपयोग और उसके क्रियान्‍वयन में आने वाली समस्याओं के बारे में बताया गया है।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में किए गए इस अध्ययन से पता चला कि 1281 ग्रामीण परिवारों ने जब माइक्रो ग्रिड से मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल किया तो उन परिवारों का केरोसिन पर होने वाला खर्च कम हुआ।

इस अध्‍ययन से पता चला कि ग्रामीण इलाकों में विद्युतीकरण की दर 29% से बढ़कर 36% हो गई है, जिससे गांवों में बिजली मिलने की अवधि में 0.99 घंटे से लेकर 1.42 घंटे तक की बढ़ोतरी हुई है। माइक्रो ग्रिड के जरिए गाँवों में लगभग 20-25% तक बिजली कनेक्शन दिए जाते हैं। अध्‍ययन में यह भी सामने आया कि गाँव के 95% परिवार अब भी केरोसिन पर ही निर्भर हैं, जो उन्‍हें राशन की दुकानों या कालाबाजारी के तहत खरीदना पड़ता है। जब माइक्रो ग्रिड के जरिए गाँव के लोगों को बिजली देने की शुरुआत की गई तो केरोसिन पर उनके होने वाले खर्च में प्रति माह 47-49 रुपये तक की कमी आई।

केरोसिन कुकिंग स्टोव

क्या है वास्तविक स्थिति

यह कहा जा सकता है कि अगर गाँव के लोगों को केरोसिन पर सब्सिडी की जगह सौर ऊर्जा पर सब्सिडी दी जाए तो देश की अर्थव्यवस्था पर इसका व्‍यापक असर पड़ेगा। एक तरफ जहाँ केरोसिन पर सब्सिडी के रूप में केंद्र सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है, वहीं अगर सोलर माइक्रो ग्रिड को बढ़ावा दिया जाए तो यह सरकार और ग्रामीण दोनों के लिए पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित विकल्प है। अगर केरोसिन पर दी जाने वाली सब्सिडी हटा दी जाए तो जाहिर है, सोलर माइक्रो ग्रिड का इस्तेमाल ज़्यादा लोग करेंगे जिससे सभी को फ़ायदा होगा। इस अध्ययन से मिलने वाले परिणामों को हम अन्य देशों के साथ भी जोड़ कर देख सकते हैं। सोलर माइक्रो ग्रिड से मिलने वाली बिजली से लोगों का जीवन स्तर भी सुधरेगा लेकिन ये तभी संभव है जब सरकार भी अपनी तरफ से इसके लिए आगे आए।

दिल्ली के ऊर्जा और संसाधन संस्थान के सहायक निदेशक देबाजीत पाटिल का कहना है कि इसे सामान्‍यीकृत नहीं किया जाना चाहिए, सिर्फ बिजली आपूर्ति से ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक और आर्थिक विकास में वृद्धि नहीं हो सकती। छोटे स्तर पर सोलर परियोजनाओं के जरिए ग्रामीणों का सामाजिक जीवन स्‍तर तो बेहतर हो सकता है, लेकिन इसके आर्थिक लाभ तभी सामने आएंगे जब ये परियोजनाएं विशेष रूप से उन्‍हीं लोगों को ध्‍यान में रखकर डिज़ाइन की जाएं। माइक्रो इंटरप्राइजेज के प्रमोशन और बिजली के इस्तेमाल के लिए संस्थागत समर्थन, समय पर वित्‍तीय सहयोग, मार्केट से लिंक और कच्चे माल की उपलब्‍धता भी जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि बिजली एक प्रमुख घटक अवश्‍य है लेकिन यह बड़े सामाजिक-आर्थिक लाभ पैदा करने के लिए पर्याप्त शर्त नहीं है (देबाजीत पाटिल ने इस अध्ययन मे भाग नहीं लिया था)।

क्‍या है माइक्रो ग्रिड

माइक्रो ग्रिड विद्युत स्रोतों और भार का एक ऐसा समूह है जो पारंपरिक केंद्रीकृत विद्युत ग्रिड (मैक्रो ग्रिड) से जुड़ा होता है। यदि ग्रामीण क्षेत्र की भौतिक और आर्थिक परिस्थितियां इसके अनुकूल हों तो यह स्वतंत्र रूप से भी कार्य कर सकता है। यह विशेष रूप से अक्षय ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रमुख विकल्‍प हो सकता है। आपातकालीन परिस्थितियों में बिजली आपूर्ति की समस्‍या का समाधान भी माइक्रो ग्रिड के जरिए हो सकता है। गांव के लोग अपनी जरूरतों के हिसाब से माइक्रो ग्रिड का निर्माण कर सकते हैं यानी हर घर में बिजली की खपत के लिहाज से भी माइक्रो ग्रिड की क्षमता निर्धारित की जा सकती है। इसके आधार पर कितने सोलर पैनल लगाने पड़ेंगे, इसकी गणना आसानी से की जा सकती है।

मेरा गाँव पावर (एमजीपी) के सह-संस्‍थापक निखिल जयसिंघानिया का कहना है कि माइक्रो ग्रिड से गाँव के गरीब लोगों को विशेष रूप से लाभ हुआ था। हालांकि उनका कहना है कि बिजली ही एकमात्र कारण नहीं था, जिसने उद्यम निर्माण के लिए प्रेरित किया बल्कि वे मुख्य रूप से सड़कों के बुनियादी ढांचे और ग्राहकों पर निर्भर थे। ये बात सच है कि बिजली के कारण बच्‍चों और स्‍कूलों में पढ़ाई के स्‍तर में काफी सुधार आया लेकिन इससे केवल उन छात्रों को ही फायदा हुआ जो पढ़ाई में दिलचस्पी रखते थे, जबकि अन्य बच्‍चे इसके कारण पढ़ाई के लिए प्रेरित नहीं हुए। जयसिंघानिया कहते हैं कि माइक्रो ग्रिड के जरिये 7 से 8 घंटे बिजली देने का लक्ष्‍य निर्धारित किया गया था, लेकिन असलियत मे तो सिर्फ 1 से 2 घंटे ही बिजली मिलती है।

Source: http://advances.sciencemag.org/content/3/5/e1602153.full

https://climatepolitics.wordpress.com/2017/06/08/a-comment-on-does-basic-energy-access-generate-socioeconomic-benefits-by-mgp-co-founder-nikhil-jaisinghani/

http://www.scidev.net/asia-pacific/energy/news/solar-microgrids-insufficient-improve-rural-income-alternative-power-energy.html