• भारत में तेजी से मधुमेह की चपेट में आ रहे गरीब
  • आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय के अध्‍ययन में खुलासा
  • आईडीएफ का अनुमान : 2030 तक दुनिया में 55 करोड़ मधुमेह रोगी होंगे

मधुमेह पहले अमीरों की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन आज इसने हर उम्र और आय वर्ग को अपनी चपेट में ले लिया है। एकडेढ़ दशक पहले भारत में मधुमेह होने की औसत उम्र 40 साल थी, जो अब 25-30 साल हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज फेडरेशन (IDF) की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2016 में दुनिया में मधुमेह रोगियों की संख्या 37.1 करोड़ हो गई है और 2030 तक यह संख्या 55 करोड़ पार कर जाएगी। भारत में 2015 में लगभग 7 करोड़ लोग इससे पीडि़त थे। अब गरीब तबके के लोग भी तेजी से इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। the2is.com  के लिए धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की एक रिपोर्ट :

  • डब्ल्यूएचओ के अनुसार, भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या पिछले 15 सालों में दोगुनी से अधिक हो गई है।
  • डब्ल्यूएचओ की 2016 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वर्ष 2000 में 2 करोड़ मधुमेह के रोगी थे जो 2013 में 6.3 करोड़ और 2015 में 7 करोड़ तक हो गए।
  • मधुमेह के चलते 75 करोड़ लोग किडनी की बीमारी से जूझ रहे हैं।
  • भारत में अगले 15 वर्षों में 11 करोड़ से ज्यादा मधुमेह रोगी होंगे।
  • 2015 में मधुमेह जनित जटिलताओं से 28 लाख वयस्कों की मौत हुई।
  • हृदय रोगियों की बढ़ती संख्या का मुख्य कारण भी मधुमेह है।
  • मधुमेह ग्रस्त आबादी के मामले में चीन, भारत और अमेरिका दुनिया में शीर्ष स्थान पर हैं।
  • जंक फ़ूड, हाई कार्बोहाइड्रेट भोजन, शारीरिक श्रम की कमी, लगातार तनाव ये सब कारण हैं मधुमेह के, जो भारत में समाज के हर वर्ग को शिकंजे में कसे हुए हैं।

भारत में मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या के बीच एक और चिंताजनक बात सामने आई है। यह कि गरीब तबके के लोग तेजी से इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं। विकसित राज्यों के शहरी इलाकों में रहने वाले गरीब तबके के लोगों की मधुमेह से पीड़ित होने की आशंका उन लोगों के मुकाबले अधिक है जो सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत हैं। ‘लांसेट डायबिटीज एंड एंडोक्राइनोलॉजी’ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि ये नतीजे भारत के लिए चिंताजनक हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और स्वास्थ्य मंत्रालय के अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न माने जाने वाले राज्यों के शहरी इलाकों में सामाजिक-आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति वाले तबके के मुकाबले कमजोर तबके के लोगों में मधुमेह के रोगियों की संख्या अधिक है। उदाहरण के लिए, चंडीगढ़ के शहरी इलाकों में सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के बीच मधुमेह की दर 26.9 फीसदी पाई गई, वहीं अच्छी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच यह दर महज 12.9 प्रतिशत है।



क्‍या हैं कारण

मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन की उपाध्‍यक्ष और इस शोध की प्रमुख लेखिका आरएम अंजना का कहना है कि गरीब लोग अनाज के लिए ज्‍यादातर राशन की दुकानों पर निर्भर करते हैं। इन दुकानों में उच्‍च कार्बोहाइड्रेट वाले चावल और गेहूं मिलता है। शरीर में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होने पर ग्‍लूकोज भी अधिक बनता है जो शरीर की कोशिकाओं तक न पहुंचे तो मधुमेह का कारक बनता है। अंजना कहती हैं, ‘अस्‍वास्‍थ्‍यकर आहार और शारीरिक निष्क्रियता ही मधुमेह की बीमारी में 50 फीसदी का योगदान दे रहे हैं।’ इसके अलावा पश्चिमी खानपान भी मधुमेह की समस्‍या बढ़ा रहे हैं। जंक फूड की आसानी से उपलब्‍धता और उनका किफायती होना भारत की सबसे बड़ी समस्‍या है।

लखनऊ के आलमबाग निवासी वरिष्‍ठ फिजीशियन और नेफ्रोलॉजिस्‍ट डॉ. देबाशीष साहा कहते हैं कि मधुमेह का एक कारण तो कुपोषण है। गरीब तबके के लोगों के खानपान में सामान्‍यत: पोषण का अभाव होता है। साथ ही, शहरों में तनावपूर्ण माहौल में रहना, खाने-पीने की आदतें, वजन बढ़ना एवं व्यायाम ना करने से मधुमेह का खतरा बढ़ रहा है। खासकर एशियाई मूल के लोगों में शरीर में इंसुलिन बनने की प्रक्रिया अन्‍य देशों की तुलना में कम है, जो मधुमेह का प्रमुख कारक है। यह भी एक कारण है कि चीन व भारत जैसे देशों में मधुमेह रोगियों की संख्‍या सबसे ज्‍यादा है।

क्‍या है मधुमेह

मधुमेह (Diabetes mellitus) एक गंभीर मेटाबॉलिक डिजीज है, जो अग्‍नाशय द्वारा इंसुलिन कम उत्‍पन्‍न करने या इंसुलिन न उत्पन्न कर पाने की स्थिति में होती है। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन को पचाने के लिए आवश्यक है। इंसुलिन का काम ग्‍लूकोज को शरीर की कोशिकाओं में पहुंचाना है। पर्याप्त इंसुलिन के बिना ग्‍लूकोज शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश नहीं कर पाता है, जिससे रक्‍त में ग्‍लूकोज का स्‍तर बढ़ जाता है, इसे ही डायबिटीज या मधुमेह कहते हैं। पेट पर जमा अतिरिक्‍त चर्बी और इंसुलिन न बनने के बीच सीधा संबंध होता है।

टाइप।। मधुमेह
लगभग 90% मधुमेह रोगी टाइप-।। डायबिटीज के ही हैं। इस रोग में अग्नाशय इंसुलिन बनाता तो है परंतु कम मात्रा में या फिर अग्नाशय से ठीक समय पर स्रावित नहीं हो पाती जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। ऐसे में रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं। इस प्रकार के मधुमेह में आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। कई परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है।

diabetes survey data

एमआरडीएम (कुपोषण से होने वाला मधुमेह)
भारत जैसे विकासशील देश में 15-30 आयु वर्ग के किशोर-किशोरियां कुपोषण से ग्रस्त हैं। कुपोषण की वजह से भी मधुमेह होता है जिसे MRDM (मालन्यूट्रिशन रिलेटेड डायबिटीज मेलाइट्स) कहते हैं। इस दशा में अग्नाशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। अधिकतर लोग समझते हैं कि जिन्‍हें पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, सिर्फ वे कुपोषण के शिकार होते हैं किंतु ऐसा नहीं है।  कुपोषण उन लोगों को भी हो सकता है जिनको पौष्टिक भोजन तो मिलता है लेकिन उनका खानपान सही नहीं है। उदाहरण के लिए, टॉफी, चॉकलेट्स, आइसक्रीम, सॉफ्ट ड्रिंक्‍स, जंक फूड जैसे खाद्य पदार्थ स्वादिष्‍ट तो होते हैं लेकिन उनमें पोषण की मात्रा शून्‍य या बहुत कम होती है। लगातार ऐसे पदार्थों को खाने वाला धीरे-धीरे कुपोषण का शिकार हो जाता है ।

मधुमेह का शरीर पर प्रभाव

मधुमेह होने पर जब रक्त में ग्‍लूकोज का स्तर बढ़ जाता है, तब शरीर अतिरिक्त ग्‍लूकोज को पेशाब के माध्यम से शरीर से बाहर कर इससे निपटने का प्रयास करता है। इसीलिए इसके प्रमुख लक्षणों में बार-बार पेशाब आना भी है। रक्त में अतिरिक्त ग्‍लूकोज से धमनियां संकरी हो जाती हैं। जब यह बड़ी रक्त नलिकाओं को प्रभावित करता है तो हृदय से जुड़ी बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं और जब यह छोटी रक्त वाहिनियों, जैसे आंखों की कोशिकाओं को प्रभावित करता है तो रेटिना के क्षतिग्रस्त होने से दृष्टि कमज़ोर हो जाती है। इससे अंधापन भी हो सकता है। साथ ही ग्‍लूकोज की अधिकता से मस्तिष्‍क की कोशिकाओं में सूजन भी आ जाती है, जिससे सुन्‍नता का अनुभव होता है।

जानलेवा मधुमेह की चपेट में शहरी औरतें भी

  • भारत में मध्यवर्ग की शहरी महिलाओं में भी मधुमेह के मामले बढ़ रहे हैं।
  • शहरी महिलाओं में से जहां 7 फीसदी इस बीमारी की चपेट में हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 10 फीसदी है।
  • ग्रामीण इलाकों में 5 फीसदी महिलाएं मोटापे की शिकार हैं, लेकिन शहरी गरीब महिलाओं में यह आंकड़ा 45.6 और मध्यवर्ग की महिलाओं के मामले में 57.4 फीसदी है।

मधुमेह रोगियों में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु की आंशका अधिक
मधुमेह से पीडि़त लोगों को दिल का दौरा पड़ने के बाद उनकी मृत्यु की आशंका ज्यादा होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स में स्कूल ऑफ मेडिसिन में करीब 7 लाख ऐसे लोगों का अध्‍ययन किया गया, जो दिल का दौरा पड़ने के बाद अस्‍पताल में भर्ती थे। इनमें से एक लाख 21 हजार मरीज मधुमेह से भी पीड़ित थे। अध्ययन में पाया गया कि जिन व्यक्तियों को मधुमेह की समस्या नहीं थी, उनमें दिल का दौरा पड़ने से मृत्‍यु की आशंका मधुमेह पीड़ित लोगों के मुकाबले 56 प्रतिशत कम थी।