• ‘वर्ल्ड विजन इंडिया’ के सर्वे में हुआ खुलासा
  • 98 फीसदी मामलों में आरोपी परिचित या संबंधी
  • भारत में 18 साल से कम उम्र वाले बच्चों में 53 फीसदी सेक्स एब्यूज यानी यौन शोषण का शिकार होते हैं। साल 2007 में महिला और बाल विकास मंत्रालय के एक अध्ययन में यह भयावह स्थिति सामने आई है। यह सर्वे बताता है कि यौन शोषण करने वालों में ज्यादातरभरोसे के लोगयानी अभिभावक, रिश्तेदार और स्कूल टीचर आदि होते हैं। देश में 12 से 18 वर्ष के बच्चों में किया गया एक अन्य सर्वे बताता है कि इस एज ग्रुप का हर दूसरा बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार होता है। क्या किया जा रहा इस दिशा में, बता रहे हैं the2is.com के लिए धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी :

    मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था वर्ल्ड विजन इंडिया ने भारत में 45,844 के बीच एक सर्वेक्षण किया जिसमें खुलासा हुआ कि हर दूसरा बच्‍चा यौन उत्‍पीड़न का शिकार हुआ है। हर पांच में से एक बच्चा यौन उत्पीड़न के खौफ से खुद को असुरक्षित महसूस करता है। हर चार में से एक परिवार ने बच्चे के साथ हुए यौन शोषण की शिकायत तक नहीं की। पीड़ितों में लड़के-लड़कियों की संख्या करीब-करीब बराबर बताई गई है। यही नहीं, करीब 98 फीसदी मामलों में बच्चों के परिचित या संबंधी ही यौन शोषण करने वाले थे।



    वर्ल्ड विजन इंडिया’ ने 2021 तक बाल यौन उत्पीड़न को खत्म करने का अभियान शुरू किया है। संस्‍था के राष्ट्रीय निदेशक चेरियन थॉमस का कहना है कि ‘हर दूसरा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, लेकिन इस बारे में समाज में भयानक चुप्पी है। थॉमस ने बताया  कि संस्‍था ने ‘इट टेक्स द वर्ल्ड टू एंड वॉयलेंस अगेंस्ट चिल्ड्रेन’ अभियान शुरू किया है जिसका उद्देश्‍य देश के 25 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के एक करोड़ बच्चों को यौन शोषण से मुक्ति दिलाना है। अभियान के तहत बच्चों को विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा, जहां उन्हें सही और बुरी मंशा से छूने जैसी अनेक बातें बताई जाएंगी।

    क्या बताते हैं सर्वे :

    • 1997 में ‘साक्षी’ संस्थान द्वारा दिल्ली की 350 स्कूली छात्राओं के सर्वेक्षण से पता चला कि 63 प्रतिशत लड़कियों का पारिवारिक सदस्यों द्वारा शोषण हुआ। इनमें से 25 प्रतिशत रेप का शिकार हुईं. लगभग 33 प्रतिशत ने कहा कि उनका शोषण पिता, दादा या अन्य पारिवारिक सदस्यों-मित्रों द्वारा हुआ।
    • 1999 में टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ़ सोशल सर्विसेज़ ने मुम्बई की 150 लड़कियों पर अध्ययन किया। इसके अनुसार 58 प्रतिशत लड़कियों का यौन शोषण 10 वर्ष की उम्र से पहले हुआ। इन 58 में से 50 प्रतिशत का शोषण करने वाले परिवार के सदस्य ही थे।
    • 1997 में दिल्ली में ‘राही’ (RAAHI) ने दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता और गोवा में मध्य और उच्चवर्गीय लड़कियों के अध्ययन में पाया कि इनमें 76 प्रतिशत का शोषण बचपन में हो चुका था। 71 प्रतिशत का शोषण परिवार के सदस्य ने या परिचित ने किया।
    • बैंगलोर की संस्था ‘संवाद’ के अनुसार, 1996 में हाई स्कूल में पढ़ने वाली छात्राओं से मालूम हुआ कि 47 प्रतिशत का यौन शोषण हो चुका था। 1985 के एक अन्य अध्ययन में देखा गया कि 30 प्रतिशत औरतों और दस प्रतिशत पुरुषों का बचपन में ही यौन शोषण हो चुका था।

  • भारत जैसे देश के समाजों में, जहां आज भी खुल कर यौन शोषण की बात न की जा सकती हो, वहां ये आंकड़े एक ऊपरी तस्वीर ही दिखाते हैं। वास्‍तव में समस्या आंकड़ों से कहीं अधिक गम्भीर है। घरेलू या सगे-संबंधियों द्वारा किए जाने वाले शोषण आमतौर पर सामने ही नहीं आते, और अगर पता चल भी जाए तो लोक-लाज के भय से अक्‍सर उन्‍हें दबाने का ही प्रयास होता है। सच्‍चाई यह है कि मासूम बच्चे अपने चारों ओर की बड़ों की दुनिया में निडर होकर, अपनी पीड़ा कह सकें, ऐसा माहौल उन्हें नहीं मिलता।

    शोषण की प्रवृत्ति मानसिक विकार या कुछ और ?

    लखनऊ के आशियाना में रहने वाली मनोचिकित्‍सक और महिला हेल्प लाइन 1090 में सीनियर कंसल्‍टेंट डॉ. नेहा आनन्‍द का मानना है कि यौन शोषण करने वाले लोग मनोवैज्ञानिक विकार के शिकार ज़रूर होते हैं। इनमें असुरक्षा की भावना बड़ी प्रबल होती है। वह समाज से किसी न किसी तरह उपेक्षित होते हैं तथा भावनात्‍मक रूप से शून्‍य हो जाते हैं। जो लोग परिवार या समाज से बहुत कटे रहते हैं उनके अंदर परपीड़क की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। कुछ मामलों में ये भी संभव है कि ऐसे लोग खुद बचपन में शोषण का शिकार हुए हों और वे बदले की भावना से ऐसा कर रहे हों।

    बच्‍चों पर क्‍या होता है प्रभाव

    डॉ. नेहा आनन्‍द बताती हैं कि शोषण के शिकार बच्‍चों में अचानक अकेलापन वाले लक्षण आ जाते हैं। बच्‍चा सामाजिक, भावनात्‍मक और मनोवैज्ञानिक समेत कई स्‍तरों पर खुद को अलग कर लेता है। वह डरा-सहमा रहने लगता है, किसी से बात नहीं करता है, लोगों से मिलने-जुलने से कतराने लगता है। बच्‍चे का बौद्धिक विकास भी कमजोर पड़ जाता है। उनमें संबंधों के प्रति अविश्‍वास का भाव उत्‍पन्‍न हो जाता है जो बड़े होने के बाद भी बना रहता है। उनके भीतर एक असुरक्षा की भावना घर कर जाती है जो आजीवन दूर नहीं हो पाती। अभिभावक अगर बच्‍चे के व्‍यवहार में अचानक परिवर्तन देखें तो सतर्क हो जाएं।

  • बाल यौन शोषण से निपटने के लिए कानून

    वर्ष 2012 में 2012 में भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने के लिए पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस) एक्ट बनाया गया। 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का सेक्सुअल बर्ताव इस कानून के दायरे में आता है। इसके तहत बच्चों को सेक्सुअल असॉल्ट, सेक्सुअल हैरेसमेंट और पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों से प्रोटेक्ट किया गया है। ऐसे मामलों में दोषियों को उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

    साल 2014 में नए क़ानून के तहत 8904 मामले दर्ज किए गए लेकिन उसके अलावा इसी साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले, बच्ची पर शीलभंग के इरादे से हमला करने के 11,335 मामले, यौन शोषण के 4,593 मामले, बच्चियों को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले, घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए गए। ये आंकड़े बताते हैं कि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पोक्‍सो लगाया ही नहीं गया।

    आवश्‍यकता इस बात की है कि शैक्षिक संस्थानों में जागरूकता कैंप लगाने के साथ बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं। इससे ऐसी घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही, अपराधियों के मन में डर पैदा करना भी जरूरी है। वास्‍तव में अपने बच्चों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है कि उन्हें एक सुरक्षित बचपन दें