@शौचालय, ईंधन, पक्का घर, साफ पानी की सुविधा दूर कर सकती है इन्सान – बाघ संघर्ष को

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत टाइगर रिज़र्व के आस पास के इलाकों में बाघों की इंसानी बस्तियों में घुसपैठ और हमले करना आम बात हो गई है. लेकिन ख़ास बात यह है कि बाघ के हमलों का शिकार अमूमन गरीब लोग ही बनते हैं. असल में साधन-संपन्न ग्रामीणों या किसानों के लिए ऐसे हालात ही नहीं बनाते कि उनका बाघ से आमना – सामना होने की स्थितियां बनें. बाघ के हमलों का कारण जंगलात में इंसानी अतिक्रमण तो है ही, इसके सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं. बता रहे हैं देवांश शर्मा :

बाघ का हमला आमतौर तब होता है जब लोग जंगल में लकड़ी वगैरह लेने घुसते हैं, गन्ने के खेतों में शौच के लिए जाते हैं, पानी के लिए जंगल में जाते हैं और कच्चे मकानों में रहते हैं. यह सभी हालात गरीबों में ज्यादा होते हैं. असला में संपन्न ग्रामीण या किसान के मकान पक्के होते हैं, टॉयलेट की व्यवस्था मकान में ही होती है, पानी के लिए बोर वेल या हैण्ड पम्प घर में ही होता है, ईंधन के लिए एलपीजी होती है.



गाँव वाले हमेशा से ही जंगल में लकड़ी लेने जाते रहे हैं. जानवर इसको अपने इलाके में घुसपैठ मानते है और उन पर आक्रमण करते हैं. अगर ग्रामीण एलपीजी का इस्तेमाल करें और उन्हें लकड़ी के लिए कभी जंगल ही न जाना पड़े तो हमले टाले जा सकते हैं. इससे तरह पानी के लिए भी उन्हें नदी या जलाशय जाना पड़ता है. पानी के इन्हीं स्रोतों पर बाघ भी पानी पीने आते है. अगर लोगों को घर में ही पानी मिले तो उनको नदी के पास नहीं जाना पड़ेगा. इसके अलावा बड़ी संख्या में गाँव वाले कच्चे मकानों में रहते हैं. इनमें बाघ आसानी से घुस सकते हैं. कई बार बाघ जंगल से निकल कर गन्ने के खेतों में आ जाते हैं. इन्हीं खेतों में गांववाले जब शौच के लिए जाते हैं तो बाघ के आक्रमण की स्थिति बन जाते है. घर में ही शौचालय होगा तो लोग खुले में नहीं जायेंगे.

एक और कारक है खेती के उपकरण का. संपन्न किसान हार्वेस्टर या अन्य मशीनों का इस्तेमाल करते हैं. चूँकि जानवर शोर से डरते हैं सो जहाँ मशीनें चलती हैं उसके आस पास नहीं जाते. पीलीभीत के गरीब किसान इन उपकरणों से वंचित हैं और खेतों में हाथ से काम करते हैं और बाघ का आसान निशाना बन जाते हैं.

पीलीभीत बाघ रिज़र्व का आकार अंग्रेजी के उलटे ‘U’ की तरह है. इस U के बीच की जगह में बस्तियां हैं, जहाँ आसानी से बाघ घूमते है. अगर इसके चारो ओर जाल लगा दिया जाये तो बाघों की घुसपैठ रोकी जा सकती है. अगर किसानों के पास पैसा हो तो वे अपने घर और खेतों के आस पास जाल लगा सकते हैं.

गाँव की उन्नति ही बाघ और मनुष्य के आपसी संघर्ष की रोकथाम में सहायक हो सकती है. एलपीजी, स्वच्छ पानी, पक्के मकान, शौचालय व कृषि के नवीन उपकरण विकसित समाज की निशानी हैं. जब तक गाँव वालों को यह सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होंगी ये संघर्ष यूँ ही चलता रहेगा.

बाघो की बढ़ती संख्या

पीलीभीत में 2014 में बाघों की तादाद 22 थी जो 2015 में 42 हो गई. 2016 के हिसाब से यह संख्या 60 के आसपास होने का अनुमान है. अन्य जानवरों की संख्या भी इसके साथ बढ़ी है.

Sources

http://www.epw.in/journal/2015/20/reports-states-web-exclusives/pilibhit-tiger-reserve.html