‘दिल टूट जाना’ आमतौर पर एक मुहावरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है.दिल किसी भी स्थिति में ‘टूट’ सकता है. प्रेम में असफलता, परीक्षा में असफलता, किसी के द्वारा धोखा वगैरह. लेकिन दिल का टूटना असली मायने में भी हो सकता है यानी दिल का दौरा या दिल का काम करना ही बंद कर देना !! इसलिए दिल को जल्दी टूटने नहीं दीजिये, इसी में दिल की भलाई है. शैली अस्थाना की रिपोर्ट :

एक रिसर्च से पता चला है कि गहरे सदमे या किसी प्रकार के शोक से इंसानों में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है. अमेरिका के कार्डियोलोजिस्ट मार्क गिल्लिनोव और स्टीवन निसीन ने अपनी रिसर्च में बताया है कि, इमोशनस चाहे सुख के हो या दुःख के, आपके हार्ट पर असर ज़रूर डालते हैं. ज़िन्दगी में अपने किसी प्रिय को खोने का गम सबसे ज्यादा दुखदायी होता है. कुछ अपने आपको संभाल ले जाते है और कुछ को बहुत समय लगता है. जैसे, पति या पत्नी में से किसी एक कि मृत्यु हो जाए तो कुछ ही महीने बाद उसके साथी की भी मृत्यु होने के वाकये आम हैं. इसका कारण आपस में उनका इमोशनली अटैचमेंट होता है



ऐसा क्यूँ होता है और इसके लक्षण क्या है ?

हारवर्ड मेडिकल स्कूल  ने एक अध्ययन में बताया है कि अचानक लगे सदमे की वजह से हमारे शरीर में बड़ी मात्रा में स्ट्रेस हारमोंस रिलीज़ होते है जो हार्ट की रक्त वाहिकाओं में अस्थियाई रूप से बदलाव लाते है. इसकी वजह से हार्ट धीमी गति से काम करने लगता है और यह हार्ट फेलियर का कारण बनता है. ऐसे पेशेंट को सीने में दर्द व सास लेने में कमी महसूस होती है.

बेसिक सेहत से भी पड़ता है फर्क

ऐशबाग के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पियूष खरे का कहना है कि सिर्फ इमोशनल स्ट्रेस ही हार्ट अटैक का कारण नहीं हो सकता है. ये दो फैक्टर पर निर्भर करता है, एक स्थापित रिस्क फैक्टर जिसमे धुम्रपान, शराब, तम्बाकू का सेवन और मधुमेह जैसी बीमारियाँ शामिल होती हैं. दूसरा कारण होता है ‘प्रेसीपिटेट फैक्टर’ यानि पहले से मौजूद कारणों को बढ़ावा जो स्ट्रेस या डिप्रेशन देते हैं.

इंदिरानगर के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ विवेक अग्रवाल बताते हैं कि इमोशनल झटका प्रेसीपिटेट फैक्टर को बढ़ावा देता है. अपने करीबी को खोने का दुःख हो या अपने को किसी लायक ना समझने का, सोसाइटी का टेंशन या परीक्षा का प्रेशर, ये सब  इंसान को स्ट्रेस और डिप्रेशन का शिकार बनाते हैं. जिसकी वजह से हार्ट अटैक, स्ट्रोक, लीवर फेलियर का खतरा होता है

महानगर स्तिथ लाइफलाइन अस्पताल के डॉ आशुतोष वशिस्ठ बताते है कि  रिस्क फैक्टर को संभालना ज़रूरी होता है अगर कोई मधुमेह से ग्रसित है तो उसे इसको कण्ट्रोल रखना चाहिए. इससे प्रेसीपिटेट फैक्टर से होने वाला असर कम होता है. रिस्क फैक्टर को काबू में रखने से स्ट्रेस, डिप्रेशन ट्रौमा या किसी इन्फेक्शन से होने वाले हार्ट अटैक का खतरा कम होता है.

दिल पर मत लीजिये

लखनऊ की मनोवैज्ञानिक डॉ कविता धींगरा का कहना है कि इमोशनल होना तो व्यक्ति के स्वाभाव पर निर्भर है. किसी भी दुःख से उबरने में टाइम लगता है जो मजबूत या सामान्य प्रकृति के होते है वो जल्दी उबर जाते है वहीँ जो सेंसिटिव होते है वो कई बार डिप्रेशन का शिकार हो जाते है. वो सुसाइड करने की भी सोच सकते है और ऐसे में हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है. ऐसे मामलों में पेशेंट के पेरेंट्स या किसी करीबी को उनका कॉन्फिडेंस लेवल बढाने में उनकी मदद करनी चाहिए और उन पर किसी चीज़ का प्रेशर नहीं डालना चाहिए.

राजाजीपुरम के डॉ ओ.पे श्रीवास्तवा बताते है कि, स्ट्रेस और डिप्रेशन का असर सीधे दिल और दिमाग की उन नसों पर पड़ता है जो सबसे कोमल होती है. ऐसे में हाई ब्लडप्रेशर का खतरा हार्ट अटैक का कारण बन जाता है.किसी प्रिय को खोने का गम उसके प्रिय के लिए जानलेवा साबित हो सकता है. हम अक्सर उस इंसान पर ध्यान नहीं देते जिसको सबसे ज्यादा सदमा लगता है. ऐसे ही अचानक सदमे का शिकार हुए लोगो पर हार्ट अटैक का खतरा मंडराता है.

Sources: https://www.psychologytoday.com/blog/heart-411/201201/can-you-really-die-broken-heart