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  • अमेरिकी वैज्ञानिकों के शोध से इत्तेफाक रखते हैं कई डॉक्टर

  • नकटी में होते हैं कई बैक्टेरिया जो मजबूत करते हैं प्रतिरोधक सिस्टम

  • दूर करते हैं पाचन से जुड़ी समस्याएँ

दीपाली अग्रहरी, लखनऊ

आप सबने बचपन में ये कहावत सुनी ही होगी

‘’नाक में उंगली मत कर, मत कर!! कान में लकड़ी मत कर, मत कर !! दांत में मंजन नित कर, नित कर!!’’

और हर दूसरे बच्चे को नाक में उंगली करने के लिए डांट खाते हुए भी देखा सुना होगा। हर बार यही बताया और समझाया जाता है कि नाक में उंगली करना गन्दा है और शिष्टाचार में नहीं आता। यह भी बताया गया कि यह सेहत के लिए अच्छा नहीं है। लेकिन कुछ वैज्ञानिक इसे सेहत के लिए अच्छा बता रहे हैं।

लखनऊ में ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. पंकज श्रीवास्तव का कहना है कि जो बच्चे मिट्टी खाते हैं उनका बॉडी इम्यून सिस्टम मिट्टी खाने वाले बच्चों की तुलना में ज्यादा अच्छा होता है। नाक के आगे के हिस्से में जो चीज़ें जमा होती हैं उनमें अगर उंगली करके बच्चें उसे मुह में डालते हैं तो कुछ हिस्सा उनके मुंह में चला ही जाता है जो किसी भी तरह बच्चों के लिए नुकसानदेह नहीं हैं। जब हम सांस लेते हैं तो हवा में तैर रहे बारीक कण भी नाक द्वारा अन्दर प्रवेश करते हैं. नाक का म्यूकस इन कण को पकड़ लेता है और नाक में इसकी परत जैम जाती है. इसे गंदगी या मैल मान लिया जाता है. बहरहाल, यह छोटे बच्चों में दूध से जुड़ी पाचन समस्या को दूर करता है. बहुत छोटे बच्चों में लगातार नाक बहने की शिकायत देखी जाती है जो बहते हुए उनके मुह में चली जाती है। अक्सर माँ सोचती हैं कि मुंह में गंदगी चली गयी. असल में इस ‘गंदगी’ की थोड़ी मात्रा बच्चों की पाचन संबंधी समस्या को दूर करता है। बच्चों द्वारा नाक में उंगली से जख्म न होने पाए यह ध्यान रखना ज्यादा जरूरी है.

नाक का बलगम एक अच्छा बैक्टीरिया है

हार्वर्ड विश्वविध्यालय और मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेकनोलोजी के वैज्ञानिकों ने पाया कि नाक का म्यूकस या बलगम एक अच्छा बैक्टीरिया है जो दांतों में चिपके हुए बैक्टीरिया से बचाता है।माइक्रोबायोलॉजी की अमेरिकन सोसायटी की मैगज़ीन में एक अध्ययन प्रकाशित भी हुआ है कि नाक का म्यूकस सांस के इन्फेक्शन, पेट के अल्सर और एचआईवी तक से बचाव में मदद कर सकते हैं. कनाडा के सास्केचेवान विश्वविद्यालय के बायोकैमिस्ट्री के प्रोफेसर डॉ. स्कॉट नेपर का कहना है कि प्रकृति हमें अलगअलग चीज़ें करने के लिए कहती है जो अक्सर हमारे लिए फायदेमंद होता है।



Image Credit: doctoranddad.com

लखनऊ के चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ.संजय निरंजन ने भी दिए अपने विचार..

जो लोग अपनी नाक में बारबार उंगली करते हैं, उनके शरीर में स्टैफाइलोकॉकस ऑरस बैक्टीरिया के प्रवेश होने का खतरा ज्यादा होता है। इस बैक्टीरिया के चलते शरीर में कई तरह के इंफेक्शन हो सकते हैं। एक तो ये एक अच्छी आदत नहीं है और इससे स्वास्थ्य से जुड़े कई नुक्सान भी होते हैं।

लेकिन ‘नोज पिकिंग’ एक लिमिट में करना नुकसानदेह नहीं है। ये डेड वेस्ट को बाहर कर देता है।

1 – कुछ लोग अपनी नाक में उंगली इसलिए करते हैं कि वो उसके अन्दर की गन्दगी को साफ कर सकें। छोटे बच्चों की माँ ही ऊँगली या किसी सॉफ्ट बड से अपने बच्चों की नाक साफ़ करती हैं, जिससे उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो। तो उस लिहाज में ये गलत आदत नहीं है।

2- इसे सार्वजनिक रूप से करना गलत है, ही ये अच्छे मैनर में आता है। मैं लोगों से यही कहता हूँ अगर आपको अपने नाक साफ़ करनी ही है तो सबके सामने करें।

3- नोज पिकिंग से अक्सर नाक के अन्दर की स्किन डैमेज हो जाती है, जिससे खून भी आने लगता है जो बाद में बड़ी समस्या बन जाता है. कई बार बच्चों में ये शिकायत आती है।

लखनऊ के किंग जोर्जे मेडिकल कॉलेज के आयुर्वेद डॉ. सुमित कुमार मिश्रा का कहना है कि नाक में उंगली करना बिलकुल गलत है. लेकिन आयुर्वेद में बताया गया है कि रात में ताम्बे के बर्तन में पानी ढक कर रखने और सुबह बिना कुल्ला किये यह पानी पीने से बहुत फायदा होता है. असला में रात भर में मुंह के अन्दर जो एंजाइम इकठ्ठा होते हैं वह पानी के साथ पेट में पहुँचते हैं और पाचन क्रिया में बहुत सहायक साबित होते हैं.

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हमारे शरीर में मौजूद हैं मददगार बैक्टीरिया

  • 2013 में नार्वे के शोधकर्ताओं ने पाया कि नाक के बलगम में माइक्रोकोकस लिट्यूस होता है जो स्किन कैंसर से बचाव में मदद कर सकता हैं. वैज्ञानिक माइक्रोकोकस लिट्यूस को ‘सुपर सनस्क्रीन’ मानते हैं क्योंकि इसमें अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन को सोख लेने की ताकत होती है.
  • पेट की आँतों में बिफिड़ोबैक्टीरियम एनीमेलिस रहता है जो प्रतिरक्षा बढ़ाने ट्यूमर से लड़ने , पाचन सुधारने और कोलेस्ट्रोल घटाने में मदद करता है।
  • स्त्रेप्तोकोकस थर्मोफिलस प्रोबायोटिक के रूप में प्रयोग किया जाता है. ये पेट में ऐंठन, डायरिया और दूध में मौजूद लेक्टोस को पचाने में मदद करता है।

जल्द ही मिलेगी सिंथेटिक नकटी जो करेगा बच्चों की रोगों से सुरक्षा

इस अध्ययन पर काम कर रही एम आई टी के बायोलॉजिकल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर केथरीन रिब्बेक का कहना है कि वह अपने अन्य रिसर्च साथियों के साथ मिलकर एक ऐसा सिंथेटिक म्यूकस एंटीबायोटिक तैयार कर रही हैं जो बच्चों को संक्रमण से बचाएगा, जिससे उन्हें कम एंटीबायोटिक लेना पड़ेगा। इतना ही नही वह सिंथटिक नकटी (बलगम) से च्वीइंगम और टूथपेस्ट बनाने पर भी काम कर रही है। जो बच्चो के दांतों में होनी वाली केवटीस को रोकेगा।

और अधिक जानकारी के लिए इस लिंक को पढ़ें. https://be.mit.edu/directory/katharina-ribbeck