• यूपी बोर्ड से पास युवाओं में बेरोजगारी ज्‍यादा

  • नौकरियां मिलती भी हैं तो छोटीमोटी

  • इसका नकारात्‍मक असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी

The2Is टीम



यूपी में बलिया के एक दूरदराज के गांव के कुन्नू मिश्रा ने हाईस्कूल से पोस्‍ट ग्रेजुएट तक की डिग्री ‘प्रथम श्रेणी’ में प्राप्‍त की है। करीब एक दशक से भी ज्यादा समय तक एक अदद सरकारी नौकरी का इंतजार करने के बाद अंततः उन्‍हें विश्‍वास हो गया कि अब नौकरी नहीं मिलेगी। वैसे भी उनकी उम्र 42 वर्ष हो गई है। उनके छोटे भाई ओम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

हजारों युवाओं की भीड़ में से ये तो दो बानगी भर हैं, जिनको अपना अंतिम लक्ष्य यानी सरकारी नौकरी प्राप्त करने में उनकी शिक्षा ने कोई मदद नहीं की। कुन्नू और उस जैसे अन्य कई लोग हैं जिन्होंने अपने गांव या आसपास के क्षेत्र से ही पढ़ाई की है। उन्होंने यूपी बोर्ड से इंटरमीडिएट आसानी से पास कर लिया और ग्रेजुएशन व पोस्‍ट ग्रेजुएशन के अलावा पीएच.डी. तक भी पूरी कर ली लेकिन इसके बावजूद वे आज बेरोजगार हैं। वास्‍तव में ऐसे लोगों के लिए डिग्री प्राप्‍त कर लेना ही नौकरी की गारंटी नहीं है। इससे यह भी पता चलता है कि यहां शिक्षा की गुणवत्‍ता कैसी है। यही कारण है कि स्‍कूल से लेकर कॉलेज तक सारी परीक्षाएं आसानी से पास कर लेने के बाद भी ज्‍यादातर मामलों में ऐसे लोग बेरोजगार हैं। हर साल स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। इस वर्ष यूपी बोर्ड में 34 लाख छात्र हाईस्कूल परीक्षा में और 26 लाख से अधिक छात्र इंटरमीडिएट परीक्षा में शामिल हुए हैं।

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  • डॉ. संतोष सोनी, जो ‘मानसगंगा’ नाम से एजुकेशन कंसल्‍टेंसी फर्म और एक प्लेसमेंट एजेंसी भी चलाते हैं, कहते हैं कि यूपी बोर्ड से परीक्षा पास करने वाले अधिकतर युवा निजी क्षेत्र में अकुशल या अर्द्ध कुशल नौकरियों के लिए ही ज्‍यादा उपयुक्‍त पाए जाते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि ऐसे युवाओं को पर्याप्‍त ज्ञान और जानकारी ही नहीं होती और न ही वे अपने काम में कुशल होते हैं। यही नहीं, उनका कहना है कि यूपी बोर्ड से ज्‍यादा परसेंटेज से हाई स्‍कूल और इंटर पास होने वाले युवाओं को संदेह की निगाह से भी देखा जाता है, खासकर अगर उन्‍होंने ग्रामीण क्षेत्र के स्‍कूलकॉलेज से परीक्षा पास की हो।
  • एके मिश्रा जो कुछ कारपोरेट्स के प्‍लेसमेंट सेल से जुड़े हैं, कहते हैं कि यूपी बोर्ड परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर नकल की वजह से छात्रों के कॅरियर पर काफी नकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है। कंपनियों के प्रबंधक ज्‍यादा परसेंटेज वाली मार्कशीट्स को संदेह की नजरों से देखते हैं। और यह बात तब सही भी साबित होती है जब इंटरव्‍यू या लिखित परीक्षा में ऐसे ‘ब्रिलिएंट’ छात्र बहुत खराब प्रदर्शन करते हैं। हालांकि उनका यह भी कहना है कि इसका मतलब यह नहीं कि यूपी बोर्ड के सारे छात्र खराब ही होते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों में यह समस्‍या अधिक गंभीर है।
  • सेवानिवृत्‍त प्रोफेसर डॉ. आर. रॉय चौधरी कहती हैं कि नकल और धोखाधड़ी का खामियाजा सिर्फ छात्रों को ही नहीं उठाना पड़ता, बल्कि इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसकी वजह से बेरोजगार या बेरोजगार होने वाले लोगों की संख्‍या अचानक बढ़ जाती है और इनका भार अंतत: हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को ही उठाना पड़ता है। इसका कारण बताते हुए वह कहती हैं कि ज्‍यादातर छात्र इस वजह से धोखाधड़ी और नकल का सहारा लेते हैं कि इससे उनके अच्‍छे नंबर आ जाएंगे और सरकारी नौकरी प्राप्त करने में मदद मिलेगी। ऐसे युवा या उनके मातापिता, शिक्षक या उनके साथी कभी भी उन्‍हें निजी क्षेत्र में नौकरी करने या स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। वास्‍तव में यह एक गंभीर मुद्दा है और केवल दीर्घकालिक रणनीति बनाकर ही इसका समाधान किया जा सकता है।
  • मार्केटिंग गुरु एफए अब्बासी अफसोस जताते हुए कहते हैं कि वास्‍तव में इस स्थिति से ठीक ढंग से निपटा ही नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे युवा रोजगार के लिए अन्य राज्यों में जाते हैं जहां उन्हें अर्धकुशल या छोटीमोटी नौकरियां ही मिलती हैं। वह आश्‍चर्य जताते हैं कि आखिर इस तरह के युवा मानव संसाधन का उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में क्‍या योगदान है?
बेरोजगारी

per capita income

क्‍या कहते हैं आंकड़े

  • उत्तर प्रदेश पुरुषों की साक्षरता दर 79.20% और महिलाओं की 59.30% है। यह राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, जहां पुरुषों की साक्षरता दर 82.14% और महिलाओं की 65.16% है।
  • गुजरात में बेरोजगारी दर 9 है जबकि यूपी में यह दर इससे कहीं बहुत ज्‍यादा 74 है। (बेरोजगारी दर प्रति 1000 लोगों पर बेरोजगारों की संख्या है)