• स्मार्टफोन और इंटरनेट की लत से किशोरों में बढ़ रहीं तनाव और अनिद्रा जैसी खतरनाक समस्याएं

इंटरनेट आज हमारे जीवन का अहम हिस्‍सा बन चुका है। सुबह से लेकर शाम तक या कहें कि देर रात तक हम तकनीक के इस बड़े आविष्‍कार पर निर्भर रहते हैं। दफ्तर में कोई काम हो या रेल-बस के टिकट बुक कराना, कुछ खरीदारी करनी हो या फिर किसी बिल का भुगतान ही क्‍यों न हो, इंटरनेट हमारी हर जरूरत को पूरा करने में सक्षम है। लेकिन, हमें सावधान रहने की भी जरूरत है। यदि आप अधिक समय तक स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं तो आपको स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। दक्षिण कोरिया में हुई ताजा शोध के अनुसार, स्मार्टफोन और इंटरनेट की लत से किशोरों में तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी खतरनाक समस्याएं बढ़ रही हैं। पेश है धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट –

दक्षिण कोरिया की कोरिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्‍ययन में पाया है कि स्मार्टफोन और इंटरनेट के आदी बन चुके युवाओं के दिमाग में मौजूद रसायन में असंतुलन पैदा हो जाता है। शोधकर्ताओं ने दिमाग में स्मार्टफोन के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए मैग्नेटिक रिसॉनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी (MRS) का इस्तेमाल किया। एमआरएस एक प्रकार का एमआरआई है जिससे दिमाग के रासायनिक संतुलन का अध्ययन किया जाता है।

19 युवकों पर किया गया अध्‍ययन

यह शोध रेडियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका (RSNA) की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किया गया। इस शोध में कुल 19 युवकों पर इंटरनेट के दुष्प्रभाव का अध्‍ययन किया गया है। इन युवाओं में इंटरनेट और स्मार्टफोन की लत पड़ चुकी थी। अध्ययन में इन प्रभावित युवकों की तुलना स्वस्थ लोगों से की गई। इसके बाद 12 युवकों को एक विशेष प्रकार की व्‍यावहारिक थेरेपी दी गई। यह थेरेपी गेमिंग एडिक्शन के लिए दी जाती है, जो इस शोध का एक हिस्सा थी।

शोधकर्ताओं ने बताया कि स्मार्टफोन और इंटरनेट की लत को लेकर एक टेस्ट किया गया जिससे यह पता किया जा सके कि इसकी लत युवाओं में कितनी तेज है। टेस्ट में ऐसे सवालों को रखा गया कि जिससे पता लगाया जा सके कि स्मार्टफोन लोगों के दैनिक और सामाजिक जीवन, नींद के समय और भावनाओं को कितना प्रभावित करता है। जांच में पाया गया कि जिस युवक का स्कोर हाई था, उस पर उतना ही ज्यादा इंटरनेट और स्मार्टफोन का प्रभाव था।

शोध में पता चला कि दिमाग में मौजूद रसायन गामा एम्यूनोब्यूटीरिक एसिड (GABA), जो दिमाग में न्यूरोट्रांसमीटर का काम करता है, इसके प्रभावित होने से दिमाग को मिलने वाले संकेत धीमे हो जाते हैं और न्यूरोट्रांसमीटर दिमाग की नसों को उत्तेजित बनाए रखता है। यही कारण है कि इससे दिमाग को प्रभावित करने वाली समस्याएं जैसे तनाव, चिंता और अनिद्रा बढ़ जाती हैं।

बच्‍चे भी बन रहे इंटरनेट के आदी

इंटरनेट न केवल वयस्कों के लिए, बल्कि बच्चों के लिए भी लत बनता जा रहा है। देश में 7 साल से 11 साल तक की उम्र के कई बच्चे प्रतिदिन पांच घंटे से भी अधिक समय इंटरनेट पर बिताते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यह आदत बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। देश के चार महानगरों दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु और चेन्नई में एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM) द्वारा किए गए एक हालिया सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि इंटरनेट बच्चों की लत बनता जा रहा है।

52% बच्‍चे रोज औसतन 5 घंटे करते हैं नेट सर्फिंग

सर्वे के नतीजे बताते हैं कि 7 साल से 11 साल की उम्र के 52 फीसदी बच्चे रोजाना औसतन 5 घंटे नेट सर्फिंग करते हैं। इसी आयु वर्ग के 30 फीसदी बच्चे एक से 5 घंटे नेट पर बिताते हैं। सर्वे के अनुसार, 12 से 15 साल तक के 58 फीसदी बच्चों को इंटरनेट अन्य किसी काम से कहीं अधिक प्यारा है और वह न्यूनतम 5 घंटे इस पर लगाते हैं। सवाल यह है कि नेट पर इतने छोटे बच्चे आखिर करते क्या हैं? सर्वे का निष्कर्ष है कि ये बच्चे चैटिंग करते हैं और गेम खेलते हैं। ऐसे बच्चों की संख्या कम पाई गई, जो स्कूल के काम के लिए नेट की मदद लेते हैं।

बच्‍चों में गलत आदतें डाल रहा इंटरनेट
हाल ही में लंदन में समरसेट स्थित टॉनटन स्कूल के प्रमुख जॉन न्यूटन ने एक अध्ययन के बाद कहा कि फेसबुक, ट्विटर और बेबो जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स बच्चों के नैतिक विकास के लिए खतरा बन रही हैं। बच्‍चे इनके जरिए झूठ बोलना और दूसरों को अपमानित करना सीख रहे हैं। हालांकि वे चाहें तो इन साइट्स के जरिए अच्छी बातें भी सीख सकते हैं, लेकिन ज्‍यादातर बच्‍चे इसका इस्तेमाल फूहड़ बातों और तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने में कर रहे हैं।

क्‍या कहते हैं डॉक्‍टर

लखनऊ के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार सिंह कहते हैं – ‘आज के युग में बिना इंटरनेट के जीवन की कल्‍पना नहीं की जा सकती। कोई भी आयाम इससे अछूता नहीं रहा तो भला बच्‍चे कैसे बच सकते हैं। लोरी और नर्सरी राइम्‍स से लेकर स्‍कूल के प्रोजेक्‍ट्स तक सब कुछ इंटरनेट पर ही है। और अब तो मोबाइल पर इंटरनेट होने से चीजें और भी आसान। बच्‍चों को मोबाइल पर यूट्यूब की वीडियो दिखाकर खाना खिलाया जाता है। लेकिन इंटरनेट एक मायाजाल है और इसकी आभासी दुनिया बच्‍चों के लिए बेहद खतरनाक। एक तो इंटरनेट पर उपलब्‍ध अधिकतर जानकारी प्रामाणिक नहीं होती और अक्‍सर बच्‍चों को गलत ज्ञान मिलता है। दूसरे, अक्‍सर जाने-अनजाने लिंक्‍स बच्‍चों को पोर्न की ओर ले जाते हैं। तीसरा, बच्‍चे सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए अनजान लोगों के करीब आ जाते हैं और अक्‍सर ‘चाइल्‍ड एब्‍यूज’ का शिकार बनते हैं। चौथा, गेमिंग की लत के चलते बच्‍चे सामान्‍य खेलकूद से दूर हो जाते हैं। मेरी अभिभावकों को सलाह है कि छोटे बच्‍चों को या तो इंटरनेट से दूर रखें, और अगर जरूरत हो तो डेस्‍कटॉप पीसी पर ही इंटरनेट दें और नजर रखें। कुछ सॉफ्टवेयर, जैसे net nanny भी आते हैं, लेकिन व्‍यक्तिगत निगरानी से अच्‍छा कुछ भी नहीं।

मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख कहते हैं कि इस समस्या को शहरीकरण की देन कह सकते हैं, क्योंकि अगर बच्चे के माता-पिता दोनों ही नौकरी करते हैं तो उसकी देखरेख कौन करेगा? ऐसे में बच्चे को लंबे समय तक अकेले रहना पड़ता है। फिर समय बिताने के लिए उसे इंटरनेट के रूप में एक दोस्त मिल जाता है। कई बार बच्चे नेट से अच्छी बातें सीखते हैं और कई बार जिज्ञासा उन्हें गलत बातों की ओर भी ले जाती है। अभिभावकों को ही इसका समाधान खोजना होगा, ताकि बच्चे नेट पर ज्यादा समय न बिताएं।