वायु को प्रदूषित करने और जमीन की उर्वरा शक्ति को कम करने में ईंट भट्ठे महती भूमिका निभा रहे हैं। भट्ठा प्रदूषण फैलाए, इसके लिए इनके संचालन का नियम काफी सख्त रखा गया है। उत्तर प्रदेश में इस समय लगभग 16,885 ईंटभट्ठों का संचालन किया जा रहा है जबकि राजधानी लखनऊ और आसपास करीब 236 ईंटभट्ठे चल रहे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बगैर पर्यावरण सर्टिफिकेट के ईंटभट्ठों के संचालन पर रोक लगा रखी है। सख्ती के बावजूद ईंट-भट्ठा संचालक पर्यावरण की चिन्ता कर रहे हैं और ही सामाजिक सरोकार का निर्वहन। पेश है रजनीश राज की रिपोर्ट –

ईंट-भट्ठा चलाने के नियम

  • आबादी से 200 मीटर दूर होना चाहिए भट्ठा
  • मिट्टी खनन के लिए खनन विभाग की अनुमति जरूरी
  • लोहे के बजाय सीमेंट की होनी चाहिए चिमनी
  • पर्यावरण लाइसेंस व प्रदूषण विभाग से एनओसी जारी होनी चाहिए
  • ईंट-भट्ठा चलाने के लिए जिला पंचायत, प्रदूषण विभाग और पर्यावरण विभाग की अनुमति लेना जरूरी

तय है प्रदूषण का मानक

एक ईंट-भट्ठे से सामान्यत: 750 एसएमपी तक प्रदूषण होता है। इसको कम करने की कवायद जारी है। नई टेक्नोलॉजी से प्रदूषण को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में स्थित सभी ईंट-भट्ठों को नई टेक्नोलॉजी से हाई ड्राफ्ट बनाने के निर्देश दिए थे। इनमें कोयले से पका कर ईंट बनाई जाती हैं, जिससे सफेद धुआं आसमान में जाएगा और हाई ड्राफ्ट फैन कोयले की राख बनाएगा। इस विधि से भट्ठा लगाने से हवा में केवल 250 एसएमपी तक प्रदूषण रह जाएगा।

विशेषज्ञों की मानें तो नई टेक्नोलॉजी से ईंट की क्वालिटी में भी सुधार होता है। इस विधि में कच्ची ईंट नहीं बनेगी और पकाई अच्छी होगी। इस टेक्नोलॉजी से जो ईंट बनेंगी, उनकी क्वालिटी उच्च स्तर की रहेगी। ईंट-भट्ठों को हाई ड्राफ्ट बनाने के लिए चिमनी को छोड़कर पूरा भट्ठा दोबारा बनाना पड़ेगा। इसमें दो पंखे परमानेंट और दो जेनरेटर भी रखने होंगे, जिससे ईंट बनाने में निकलने वाली डस्ट नीचे ही रह जाएगी और हवा में मोटे कण नहीं जाएंगे। आमतौर से एक भट्ठे की निर्माण लागत 1.5 करोड़ के करीब होगी। इसमें जमीन का रेट अलग है।

 

प्रकृति को हो रहा है नुकसान

ईंट-भट्ठे भूजल को और गहरे भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इंडियन जनरल ऑफ एम्‍प्‍लॉयज रिसर्च में प्रकाशित शोध में स्पष्ट किया गया है कि जगह-जगह स्थापित ईंट-भट्ठे किस कदर प्रकृति को प्रभावित कर रहे हैं। भट्ठों में उपयोग होने वाला ईंधन (सरसों की तूरी व पूर्व में उपयोग किया गया कोयले का पत्‍थर) जमीन के तापमान में वृद्धि कर रहा है। एक ईंट-भट्ठा अपने चारों ओर 1500 मीटर के दायरे को प्रभावित करता है।

ईंट-भट्ठों के कारण तापमान वृद्धि से जलस्तर नीचे जा रहा है। शोध में कहा गया है कि तापमान बढ़ने के कारण जमीन की नमी समाप्त हो रही है और ईंट-भट्ठे से प्रभावित दायरे से लगी जमीन की उर्वरा शक्ति भी कमजोर हो रही है, क्योंकि उच्च तापमान के कारण मिट्टी में अवशोषित पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इससे यहां की जमीन किसी लायक नहीं रह जाती है। ईंट-भट्ठों में सरसों की तूरी व पूर्व में उपयोग किए गए कोयले के पत्‍थर का ईंधन के रूप में प्रयोग होने से समस्या बढ़ रही है। ईंधन के जलने से नाइट्रस ऑक्साइड, कार्बनडाइ ऑक्साइड व मीथेन गैस बड़ी मात्रा में निकलती है, जिससे ओजोन परत भी प्रभावित होती है। विडम्बना यह है कि ईंट-भट्ठों में किस तरह का ईंधन प्रयोग किया जाना है, इसके लिए कोई दिशानिर्देश नहीं हैं।

क्‍या है समाधान

वैज्ञानिकों का कहना है कि ईंट-भट्ठों में सरसों की तूरी की जगह लकड़ी का कोयला जलाया जाए तो समस्या काफी कम होगी, क्योंकि इसका पूर्ण दहन होता है। ईंट-भट्ठों को सामान्य जमीन पर न लगवाकर पथरीली जमीन के आसपास लगाने से जलस्तर गिरने व तापमान बढ़ने जैसी समस्या कम होगी।

फ्लाई ऐश की ईंटों को बढ़ावा

प्रदूषण नियंत्रण पर प्रभावी रोक के लिए फ्लाई ऐश (राख की ईंट) का विकल्प उपयोगी साबित हो सकता है। फ्लाई ऐश का मतलब उस राख से है जो थर्मल पावर प्रोजेक्ट से निकलती है। राख में चूना और रेत मिलाकर ये ईंट बनाई जाती हैं। फ्लाई-ऐश से बनने वाली ईंटों की लागत परंपरागत लाल मिट्टी से बनी ईंटों से काफी कम आती है। राजधानी के बिल्डर अंकुर सिंह बताते हैं कि फ्लाई-ऐश परम्परागत ईंटों से अधिक मजबूत होती हैं। इन ईंटों का प्रयोग दिल्ली मेट्रो रेल परियोजना में बड़े पैमाने पर किया गया है।

वहीं ईंट भट्ठा संचालकों का कहना है कि सरकार ईंट-भट्ठा कारोबार को बंद करने के लिए फ्लाई ऐश की ईंटों को बढ़ावा दे रही है। इससे हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाएगा। ईंट-भट्ठा संचालक गुलाब श्रीवास्तव का दावा है कि भट्ठे की ईंटों जैसी मजबूती भी फ्लाई एश की ईंटों में नहीं है। ये ईंटें खड़ंजा में प्रयोग की जा सकती हैं, लेकिन महंगी पड़ती हैं।

ईंट-भट्ठों के आधुनिकीकरण की मुहिम

ईंट-भट्ठों के माध्यम से कम से कम प्रदूषण फैले, इसको ध्यान में रखकर उनके आधुनिकीकरण की मुहिम शुरू की गई है। एनजीटी के आदेश के बाद यह कदम उठाया गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी निर्देशों में कहा गया है कि सभी ईंट-भट्ठा संचालक अपने भट्ठों को नेचुरल ड्राट से इन्डयूज्ड ड्राट क्लीन में परिवर्तित करें। ईंट-भट्ठों को जिगजैग विधि में परिवर्तित कराने को कहा गया है। इस विधि से ईंट भट्ठे से निकलने वाली राख वातावरण में नहीं फैलती है, जिसके कारण प्रदूषण कम होता है। नियमानुसार सिस्टम अपग्रेड न करने पर बोर्ड और जिला प्रशासन द्वारा ईंट-भट्ठों को बंद किया जा सकता है। इसके अलावा ईंट निर्माण के लिए मिट्टी खनन करने से पहले भी अनुमति लेनी होगी। इस अनुमति के बाद बोर्ड से जल और वायु की सहमति प्राप्त करनी होगी। एनओसी लेने के बाद ही ईंट-भट्ठे का संचालन किया जा सकता है।

कौन कर सकता है कार्रवाई

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल
  • नगर निगम
  • विकास प्राधिकरण
  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
  • जिला प्रशासन

आपका कहना है

ईंट-भट्ठे का संचालन साल में कुछ ही माह के लिए किया जाता है। इस समय इनका संचालन बंद है। ऐसे में वर्तमान में फैले प्रदूषण का कारण इनको नहीं माना जा सकता है। बोर्ड समय-समय पर यह जांच करता है कि ईंट-भट्ठा मानकों के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं। नियमों का उल्लंघन कर प्रदूषण फैलाने की छूट किसी को नहीं है।

डॉ. रामकरन, क्षेत्रीय अधिकारी उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

सरकार ने ईंट-भट्ठा वालों के लिए नियम इतने सख्त कर दिए हैं कि काम करना कठिन हो गया है। एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी जांच के नाम पर संचालन कठिन कर देते हैं। श्रम विभाग का शिकंजा भी हम पर रहता है। हमारी पूरी कोशिशें रहती हैं कि मानकों को पूरा करते हुए ही भट्ठा का संचालन किया जाए।

अशोक सिंह भाटी, अध्यक्ष, ईंट भट्ठा संघर्ष समिति