• मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की पहल पर आईआईटी कानपुर ने कमर कसी

लखनऊ-कानपुर सहित प्रदेश के अन्‍य शहरों में बढ़ रहे वायु प्रदूषण (स्मॉग) से चिंतित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब इस पर काबू पाने के लिए कमर कस ली है। इसके लिए लखनऊ में कृत्रिम बारिश कराने की तैयारी है। इसका जिम्‍मा उन्‍होंने आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों को सौंपा है। पिछले हफ्ते वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए हुई बैठक में उन्‍होंने यह फैसला किया। क्‍या होती है कृत्रिम बारिश और यह कैसे कराई जाती है, बता रहे हैं धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी – 

प्रदूषण के कारण कोहरे के साथ धुआं मिलकर धुंध (स्मॉग) में तब्दील हो रहा है और यह इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। लखनऊ की आबोहवा में सड़कों पर वाहनों से उड़ने वाली धूल-मिट्टी से बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने के लिए लखनऊ में पानी का छिड़काव किया गया। डीएम कौशलराज शर्मा ने पिछले हफ्ते ही फायर ब्रिगेड और नगर निगम को टैंकरों से रोजाना एक हफ्ते तक पेड़ों और सड़कों पर पानी के छिड़काव के निर्देश दिए थे।

लखनऊ में पानी का छिड़काव करता फायर ब्रिगेड का टैंकर

प्रदूषण पर काबू पाने के लिए आईआईटी कानपुर भी लखनऊ में कृत्रिम बारिश कराने की तैयारी कर रहा है। दरअसल, लखनऊ में बढ़े प्रदूषण को कम करने के लिए आईआईटी ने यूपी सरकार को कृत्रिम बारिश कराने के लिए पत्र भेजा था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आईआईटी के इस प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए आईआईटी निदेशक से जल्द कृत्रिम बारिश कराने का आग्रह किया है। इसके बाद आईआईटी के वैज्ञानिक डॉ. सच्चिदानंद त्रिपाठी ने अपनी टीम गठित कर इस पर काम शुरू कर दिया है।

आईआईटी कानपुर के कार्यवाहक निदेशक प्रो. मणींद्र अग्रवाल बताते हैं कि उनका संस्‍थान कृत्रिम बारिश कराने में सक्षम है। अगले कुछ दिनों में बादल आते ही लखनऊ में कृत्रिम बारिश कराई जाएगी। इससे हवा में फैले जहरीले कण नीचे आकर मिट्टी में मिल जाएंगे। प्रो. मणींद्र ने बताया कि आईआईटी कानपुर के एरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग ने करीब एक साल पहले कृत्रिम बारिश कराने पर एक शोध शुरू किया था। शोध में बॉयोसाइंस एंड बॉयोटेक्नोलॉजी इंजीनियरिंग और इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट एंड इंजीनियरिंग विभाग भी सहयोगी थे। तीनों विभागों की मेहनत रंग लाई और आईआईटी ने कृत्रिम बारिश कराने में सफलता हासिल की।

क्‍या है कृत्रिम बारिश  

बादलों में पानी भरा होता है। कई बार बारिश होने की अनुकूल स्थिति नहीं होती है, ऐसी दशा में बादल बिना बरसे निकल जाते हैं। जब बादलों की भौतिक अवस्था में आर्टिफिशयल तरीके से बदलाव कर उसे बारिश के अनुकूल बनाया जाता है तो ऐसी अवस्‍था में हुई बरसात को कृत्रिम बारिश कहते हैं। यह प्रक्रिया ‘क्लाउड सीडिंग’ कहलाती है। इसमें कई तरह के रासायनिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। कृत्रिम रूप से ऐसी स्थिति बनाई जाती है कि बादल से बारिश शुरू हो जाती है।

कैसे होती है कृत्रिम बारिश

कृत्रिम बारिश के लिए सामान्‍यत: विमान या रॉकेट की मदद ली जाती है। विमान में सिल्वर आयोडाइड के दो बर्नर या जनरेटर लगे होते हैं, जिनमें सिल्वर आयोडाइड का घोल हाई प्रेशर पर भरा होता है। सिल्वर आयोडाइड के स्थान पर कैल्शियम क्लोराइड का प्रयोग भी किया जाता है। जिस इलाके में बारिश करानी है, वहां विमान को हवा की उल्टी दिशा में चलाया जाता है। सही बादल से सामना होते ही बर्नर चालू कर दिए जाते हैं। शुष्क बर्फ, पानी को जीरो डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर देती है, जिससे हवा में मौजूद पानी के कण जम जाते हैं। इसके लिए बैलून या विस्फोटक रॉकेट का भी प्रयोग किया जाता है।

कृत्रिम बारिश कराने के 3 चरण
कृत्रिम बारिश तकनीक के तीन चरण होते हैं। पहले चरण में रसायनों का इस्तेमाल कर उस इलाके के ऊपर बहने वाली हवा को ऊपर की ओर भेजा जाता है, जिससे वे बारिश के बादल बना सकें। इस प्रक्रिया में कैल्शियम क्लोराइड, कैल्शियम कार्बाइड, कैल्शियम ऑक्साइड, नमक तथा यूरिया के यौगिक और यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट के यौगिक का इस्तेमाल किया जाता है। ये यौगिक हवा से जलवाष्प को सोख लेते हैं और दबाव बनाने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं।

दूसरे चरण में बादलों के द्रव्यमान को नमक, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट, सूखा बर्फ और कैल्शियम क्लोराइड का प्रयोग करके बढ़ाया जाता है और तीसरे चरण में सिल्वर आयोडाइड और शुष्क बर्फ जैसे ठंडा करने वाले रसायनों की आसमान में छाये बादलों में बमबारी की जाती है। ऐसा करने से बादल में छुपे पानी के कण बिखरकर बारिश के रूप में जमीन पर गिरने लगते हैं।

कृत्रिम बारिश की चुनौतियां

कृत्रिम बारिश के दौरान यह ध्यान रखना होता है कि कौन सा केमिकल कितनी मात्रा में इस्तेमाल करना है। यह भी देखना जरूरी होता है कि मौसम का मिजाज कृत्रिम बारिश के अनुकूल है या नहीं। जहां बारिश करानी है, वहां बादल की किस्म, हवा की गति और दिशा क्या है। बरसने वाले बादलों में अति शीतल जल व बर्फ के अंश मौजूद होना जरूरी है। जहां रसायन फैलाना है, वहां का वातावरण कैसा है। इसके लिए कंप्यूटर और रडार के जरिए हर पल नजर रखनी होती है। हालांकि कृत्रिम बारिश बहुत खर्चीली प्रक्रिया है। आंध्र प्रदेश का अनुभव बताता है कि कृत्रिम बारिश पर रोज़ाना करीब 18 लाख रुपये का खर्च आता है। इससे अस्थायी समाधान तो हासिल किया जा सकता है लेकिन प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए हमें अन्‍य उपाय तो अमल में लाने ही होंगे।