• शायद नदियों ने भी सोचा तुम गन्दा करो, हम बीमारी देंगे
  • दवा प्रतिरोधक बैक्टीरिया और जीन दे रहे हैं खतरनाक बीमारियाँ फैलाने के संकेत
  • नदियों के बैक्टीरिया में एम्पीसिलिन, सेफोटैक्सिम और सिप्रोफ्लोक्‍सासिन जैसी एंटीबॉयटिक का कोई असर नहीं
  • किसी पर्व के दौरान स्नान करने वाले श्रद्धालुओं से पूरे भारत में फैल रहा है प्रतिरोधक बैक्टीरिया

कहते हैं गंगा, यमुना या कावेरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं, लेकिन आज यही नदियाँ बीमारियों का भण्डार बन चुकी हैं। इन नदियों का प्रदूषित पानी आज ऐसी-ऐसी बीमारियाँ दे रहा है, जिन पर नई–नई एंटी बॉयटिक्स भी असर नहीं करतीं। किसी भी पर्व पर इन नदियों में स्नान करना आपको और आपके परिवार को कभी भी बीमार बना सकता है। प्रस्‍तुत है दीपाली अग्रहरि की रिपोर्ट

वर्ष 2015 में हुए कावेरी नदी पर शोध में शोधकर्ताओं ने पाया कि नदी के पानी में पाए जाने वाले 100% ईकोलाई (बैक्टीरिया) पर तीसरी पीढ़ी का एंटीबॉयटिक सेफ्लोस्पोरिंस असर नहीं करता है |

ईकोलाई एक तरह का बैक्टीरिया है जो मनुष्यों और पशुओं के पेट में  रहता है। कई बार इनकी ज्यादा मौजूदगी से गुर्दा काम करना बंद कर सकता है। इसके अलावा यूरिन इन्फेक्शन भी हो सकता है।

बंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान और दयानंद सागर संस्थान के विशेषज्ञों  ने साल 2011-2012 में नदियों के पानी पर एक शोध किया। उन्होंने 283 जगहों से नदियों के पानी के नमूनों को इकट्ठा कर उनकी जांच की। विशेषज्ञों ने पाया कि नमूनों से अलग किए गए बैक्टीरिया एम्पीसिलीन और सेफोटेक्सिम एंटीबॉयटिक दवा के प्रति और 75% बैक्टीरिया सिप्रोफ्लॉक्‍सॉसिन के प्रति प्रतिरोधी थे। यानी साफ़ है कि नदियों के पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों पर इन दवाओं का असर शून्य है।

ऐसा ही एक अन्य शोध 2013 और 2014 के बीच बिहार, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना की नदियों के पानी और सीवेज ट्रीटमेंट प्लान से एकत्र किए गए पानी के नमूनों पर किया गया। इनमें मिले 446 ईकोलाई बैक्टीरिया में से  37.9% (169) ईकोलाई बैक्टीरिया स्पेक्ट्रम सेफ्लोस्पोरिन एंटीबॉयटिक के प्रति प्रतिरोधी थे।

प्रतिरोधी कीड़ों के अतिरिक्त, एंटीबॉयटिक प्रतिरोधी जीन प्रमुख भारतीय नदियों में पाए गए थे। ये जीन विस्तृत-स्पेक्ट्रम की एंटीबॉयटिक दवाओं, जिनमें अंतिम-उपाय के एजेंट भी शामिल हैं, के असर के विरुद्ध प्रतिरोध पैदा करते हैं। कावेरी जल के नमूने पर तीसरे अध्ययन ने नदी में इन जीनों की उपस्थिति दिखाई है।

कावेरी नदी पर हुए तीसरे शोध में कुछ ऐसे भी बैक्टीरिया दिखे जो लेटेस्ट एंटीबॉयटिक से लड़ने की क्षमता रखते हैं। जाहिर है, अगर इन बैक्टीरिया से खुद को बचाना है तो हमें और स्ट्रांग एंटीबॉयटिक्‍स की जरूरत पड़ेगी। यह रिपोर्ट साफ़ बताती है कि किस तरह से नदियों और भूजल के पानी में मिले बैक्टीरिया पर ये प्रतिरोधक दवाएं बेअसर हैं और उस पानी का इस्‍तेमाल खतरे से खाली नहीं है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सरकार ने गंगा नदी की साफ-सफाई पर पिछले दो साल में 7,000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन इसके बावजूद हालत जस की तस है। केंद्र सरकार, यूपी सरकार और राज्य के स्थानीय निकायों ने गंगा नदी की सफाई पर मार्च-2017 तक 7304.64 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, लेकिन नदी की हालत में कोई उल्‍लेखनीय सुधार नहीं आया है।

लखनऊ के नदी एवं पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. वेंकटेश दत्ता कहते हैं कि नदियों के किनारे बसे लोग ज्यादातर नदी के पानी का ही हर काम में उपयोग करते हैं। लखनऊ में रिवरफ्रंट को जिस तरह से डेवलप किया गया है, वह तरीका ही ठीक नहीं है। यह न सिर्फ रुपयों की बर्बादी है बल्कि नदी को मारने जैसा है। डॉ. दत्ता के मुताबिक, लखनऊ, पीलीभीत के माधोटांडा से निकली गोमती जिन-जिन गाँवों से होकर आती है, उनमें से ज्यादातर जगहों पर पानी पीने लायक है। इस नदी के किनारे बसे गाँवों के लोग गोमती का पानी ही पीते हैं। उनका कहना है कि गोमती में पीने वाले पानी में जो तत्व होने चाहिए, वे लखनऊ से पहले तक मौजूद रहते हैं। डॉ. दत्ता ने गोमती के उद्गम स्थल से लेकर गोमती के पूरे रूट को देखा है। उनका कहना है कि गोमती जिस तरह से लखनऊ में आकर गंदी होती है, उतनी गंदी गोमती कहीं नहीं है क्योंकि इस वक्त लखनऊ के 38 गंदे नाले इसमें गिर रहे हैं।

इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी  (पानी की विद्युत चालकता)

पानी में कौन-कौन से घुलनशील पदार्थ शामिल हैं, इसका पता इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी  से लगाया जाता है। जैसे पानी का टीडीएस (Total Dissolved System) लेवल, पानी का भारीपन आदि।

पानी में होते हैं ये रासायनिक तत्त्व

पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन, मैग्नीशियम, नाइट्रेट, ई-कोलाई, क्लोरिफॉर्म, मैलापन, अम्ल/क्षारीयता, सल्फेट, कैल्शियम, भारीपन, कॉलीफॉर्म काउंट इत्‍यादि रासायनिक तत्‍व पाए जाते हैं।  

कॉलीफॉर्म काउंट

  • गोमती नदी में कॉलीफॉर्म काउंट का स्तर बसहरी घाट पर तकरीबन 100 मिलीलीटर पानी में 5 का है।
  • यही कॉलीफॉर्म काउंट गऊघाट पर बढ़ जाता है लेकिन शहीद स्मारक पर आते-आते इसका प्रति 100 मिलीलीटर पर कॉलीफॉर्म काउंट 35000 से 50000 तक हो जाता है, जो बेहद खतरनाक है।

(कॉलीफॉर्म काउंट पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी बताता है। यह संख्या शून्‍य होनी चाहिए।)

पीएच लेवल (फोवियर हाइड्रोजीन)

  • बसहरी घाट पर गोमती नदी के पानी का पीएच लेवल5 से 7.5 है।
  • लखनऊ शहर के गऊघाट पर यह स्तर बढ़कर5 हो गया।
  • शहीद स्मारक पर गोमती में यह स्तर पर बढ़कर8 हो जाता है।

(पीने योग्य पानी में पीएच लेवल न्यूट्रल होना चाहिए। लेकिन नदियों के पानी का पीएच लेवल 6.5 या 7 से कम है तो उसको पिया जा सकता है।)

पीएच लेवल कम और ज्यादा होने के नुकसान

पावर ऑफ हाइड्रोजन यानी हाइड्रोजन की शक्ति। हाइड्रोजन के अणु किसी भी वस्तु में उसकी अम्लीय या क्षारीय प्रवृत्ति को तय करते हैं। अगर किसी घोल या उत्पाद में पीएच 1 या 2 है तो वो अम्लीय है और अगर पीएच 13 या 14 है तो वो क्षारीय है। अगर पीएच 7 है तो वह न्यूट्रल है। पीने योग्य पानी का पीएच लेवल यदि 7 है तो वह पानी की सही गुणवत्ता को बताता है। 7 से कम होने पर पानी में एसिटिक गुण बढ़ जाते हैं और ज्यादा होने पर यह क्षारीय हो जाता है।

क्या करें उपाय

लखनऊ मनकामेश्वर मंदिर की महंत देव्या गिरिजी का कहना है कि लोगों की गहरी आस्था है कि अगर हम गंगा में स्नान करेंगे तो हमारे पाप धुल जाएंगे और हम पवित्र हो जाएँगे। उन्हें आप समझाएं कि नदियों के पानी में अब स्नान करना सुरक्षित नहीं रह गया है तो वो इसे अपनी आस्था के प्रति निंदा समझते हैं। सदियों से यह विश्‍वास रहा है कि नदियों का पानी ही पवित्र है और उसमें स्नान करने से हम भी पवित्र हो जाएंगे।

महंत जी का कहना है कि नदियों के पानी में पाप तत्व के प्रदूषण का स्तर इतना ऊंचा है कि उसे दूर करने में कम से कम पांच सदियां लग जाएंगी। यह तभी संभव होगा जब एक भी व्यक्ति को उसमें अपने पाप धोने की अनुमति नहीं दी जाए। इसके अलावा नालों से निकलने वाले गंदे पानी के लिए अलग से व्यवस्था बनाई जाए।

लखनऊ के हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ. राजेश गुप्ता का कहना है कि जो लोग नदियों के पानी का उपयोग पीने के लिए करते हैं, उनमें डायरिया जैसी समस्या आम है। इस पानी के लगातार इस्तेमाल से कैंसर जैसी बीमारी भी हो सकती हैं।

लखनऊ के चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ. रतन कुमार सिंह ने बताया कि उनके पास ज्यादातर मरीज नदी के पास रहने वाले आते हैं जिन्हें स्किन से जुड़ी कई समस्याएँ रहती हैं।

उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के लैब टेक्नीशियन अशोक वर्मा से जब नदी के पानी की जांच को लेकर बात की तो उन्होंने बताया कि इस तरह की अभी तक कोई जांच नहीं हुई है। लेकिन जब फैक्ट्रियों से निकलने वाला कचरा नदियों के पानी में जाकर मिलता है तो समय–समय पर पानी का टेस्ट कराया जाता है।

उन्‍होंने बताया कि जल संस्‍थान द्वारा जो पानी सप्लाई होता है, उसे गोमती नदी के अपस्ट्रीम से उठाया जाता है ताकि उसमें क्लोरीन डालने से बैक्टीरिया नष्ट हो जाए। इसके अलावा पानी के डिजाल्व ऑक्सीजन सिस्टम (डीओबी) और बायो केमिकल सिस्टम (बीओबी) का भी टेस्ट होता है। पानी का भारीपन और मटमैलापन टेस्ट होने की बाद ही जल संस्‍थान द्वारा पानी सप्लाई किया जाता है। हालाँकि अशोक वर्मा यह नहीं बता सके कि एंटी बॉयटिक रेसिस्‍टेन्स को कैसे खत्म किया जाए।