सांसें बेशकीमती हैं। हम खुशकिस्मत हैं कि बिना किसी मशक्कत के सांसें ले पा रहे हैं। लेकिन हमारी सांसों पर पहरा बढ़ता जा रहा है। ये खतरें जाने अनजाने हम पैदा कर रहे हैं। लखनऊ की आबोहवा जहरीली हो चुकी है। सड़क किनारे जलता कूड़ा-कचरा, धुआं उगलते टेम्पो और छोटे-बड़े ट्रक, अनगिनत डीजल गाड़ियाँ तथा अंधाधुंध और बेलगाम निर्माण। नतीजा शहर के ऊपर धुएं की चादर या स्मॉग। धुंए और धूल का ये ‘कोहरा’ घरों के भीतर तक घुस आया है और बच्चों-बूढों को सांस की बीमारी, एलर्जी , स्किन, दिल के रोग और कैंसर जैसी बीमारियाँ दे रहा है। अब सवाल एक ही है: इसका जिम्मेदार कौन? प्रस्तुत है the2is.com  के लिए दीपाली अग्रहरि की रिपोर्ट:

क्या है स्मॉग?

ठंडी हवा भारी होती है इसलिए ठण्ड के मौसम में वह रिहायशी इलाके की गर्म हवा के नीचे एक परत बना लेती है। जैसे  पूरे शहर को कंबल की तरह लपेट लिया हो। धूल और धुएं की इस परत को ही ‘स्मॉग’ नाम दिया गया है। दरअसल ये धूल और धुएं के नन्हें कणों के कारण है , जिन्हें पीएम 2.5 और पीएम 10 का नाम दिया गया है। पीएम 2.5 का स्तर ज्यादा होने पर ही धुंध बढ़ती है और विजिबिलिटी का स्तर गिर जाता है। सांस लेते वक्त इन कणों को रोकने का हमारे शरीर में कोई सिस्टम नहीं। ऐसे में पीएम 2.5 हमारे फेफड़ों में काफी भीतर तक पहुंचते हैं। पीएम 2.5 बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। पीएम 10 धूल के मोटे कण होते हैं। इनका का साइज 10 माइक्रोमीटर होता है।

सांस लेना बना खतरा

ये धुंध आँखों, गले और फेफड़े की तकलीफ को बढ़ा रहा है। इसके लगातार संपर्क में रहने पर फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है। यह जहर सांस की समस्या उत्पन्न कर रहा है। इसी को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने  दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में यह सख्त निर्देश दिए हैं कि न ही कूड़ा जलाया जाए, न फसलें जलाई जाएँ और न ही डीजल और पेट्रोल की पुरानी गाड़ियों को शहर में न उतारा जाय, पर कोई असर नहीं हुआ।

लखनऊ जैसे छोटा शहर भी बेहाल

मानकों के अनुसार पीएम 10 का स्तर हवा में  100 माइक्रो ग्राम क्‍यूबिक मीटर (एमजीसीएम) होना चाहिए। जबकि आनंद विहार, दिल्‍ली में तो यह 1600 तक पहुंच गया है। पीएम 2.5 का नॉर्मल लेवल 60 एमजीसीएम होता है लेकिन लखनऊ में  469 से अधिक है।

लखनऊ आईआईटीआर की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों का पीएम लेवल :

यह डब्ल्यूएचओ के मानक मीटर से काफी ज्यादा है।

लखनऊ इन्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ टौक्सीलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर)  के डॉ अमित मिश्रा बताते हैं कि स्मॉग पार्टिकल्स फेफड़े से लेकर दिमाग तक में जगह बना रहे हैं। डीजल ही एकमात्र प्रदूषणकारी ईंधन नहीं है। इसमें अधिक ईंधन दक्षता है, जिससे पेट्रोल वाहन की तुलना में 10 से 15 फीसदी कम कार्बन डाइऑक्साइड निकलता है। शहर का स्मॉग दे रहा ये बीमारियाँ:


क्या कहते हैं जिम्मेदार

लखनऊ एआरटीओ परिवहन अधिकारी राघवेन्द्र सिंह का कहना है कि मेरी जानकारी के अनुसार शहरों में गाड़ियों का सञ्चालन तय मानकों के आधार पर किया जा रहा है। यदि कोई मामला सामने आता है तो तुरंत कार्यवाही की जाती है. 1 मई 2017  से 31 अक्टूबर 2017 तक पीयूसी (पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल) के तहत 2253 गाड़ियों पर अब तक 8 लाख 61 हज़ार रूपए का चालान काटा जा चुका है. लखनऊ जनपद के लिए अभी तक ऐसा कोई आदेश नहीं आया है, जिससे पुरानी गाड़ियों का सड़कों पर चलाना बंद हों, लेकिन यह जरुर नियम है कि एनओसी लेकर आने वाली दूसरे शहर की गाड़ियों का लखनऊ में कोई रजिस्ट्रेशन  नहीं होता है। सड़क सुरक्षा के दैनिक अभियान के अंतर्गत ही प्रदूषण नियंत्रण से सम्बंधित कैम्प चलते हैं।

डीजल वाली ऑटो ने किया नाक में दम

लखनऊ के ट्रैफिक इंस्पेक्टर प्रेम शंकर शाही बताते हैं कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तय मानकों को यदि कोई वाहन चाहे वह बस हो, विक्रम हो, ऑटो हो या दुपहिया का कोई भी वाहन हो, पूरा नहीं करता है तो उस पर पहली बार 1000 रूपए का जुर्माना और दूसरी बार में 2000 रूपए का जुर्माना है। एक अनुमान के अनुसार इस समय लखनऊ शहर में 8000 ऑटो हैं जिसमें से केवल 2575 सीएनजी पंजीकृत ऑटो हैं और 9000 विक्रम हैं जिसमें से केवल 4311 सीएनजी की हैं। यानी बाकी डीजल पर चल रहें हैं। यह वाहन प्रदूषण नियंत्रण द्वारा बनाये जा रहे सर्टिफिकेट्स पर सड़कों पर चल रही हैं। अभी तक सरकार से हमें ऐसा कोई आदेश नहीं प्राप्त है जिसमें वायु प्रदूषण कर रही गाड़ियों पर फाइन लगाया जाय।

हर शहर का ये हाल

उत्तर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से इस संबंध में जरूरी तैयारियां और उपायों पर कोई कार्रवाई शुरू ही नहीं की गई। इससे भी समस्या बढ़ रही है। पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारी बताते हैं कि वाहनों पर जो पॉल्यूशन सर्टिफिकेट दिया जाता है उसमें बोर्ड का सिर्फ नाम है। वाहनों को चलने से रोकना और उनका लाइसेंस रद्द करना हमारी पॉवर में शामिल नहीं है। यह काम आरटीओ विभाग का है जो उन्हें लाइसेंस देते हैं। बोर्ड प्रदूषण नियंत्रण से सम्बंधित समय – समय पर कैम्प लगवाते हैं और वाहनो की जांच करवाते हैं। इनसे प्राप्त आंकड़ों को आरटीओ के साथ साझा भी किया जाता है।

ये हो उपाय तो मिल सकती है साफ़ हवा :