• यूपी, राजस्‍थान और मध्‍य प्रदेश में अश्व प्रजाति पर मंडराया ग्लैंडर्स बीमारी का गहरा खतरा
  • ग्‍लैंडर्स के संक्रामक रोग होने के कारण इसके दूसरे पशुओं और मनुष्‍यों में भी फैलने का खतरा
  • ग्‍लैंडर्स रोग का नहीं मिला कोई सटीक इलाज, बीमारी से ग्रस्‍त घोड़ों को मारना ही एकमात्र विकल्‍प

उत्तर प्रदेश में अश्व प्रजाति (घोड़ा, गधा, खच्चर ) के लगभग 2 लाख 51 हजार पशुओं पर ग्लैंडर्स का गहरा खतरा मंडरा रहा है। यह बीमारी अब यूपी के अलावा राजस्‍थान और मध्‍य प्रदेश में भी फैल चुकी है। जितनी तेजी से यह बीमारी फैल रही है, अगर उसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो हो सकता है कि आगे ये महामारी का रूप ले ले। ऐसे में दूल्हे का घोड़ी चढ़ना दूभर हो जाएगा तो रेसकोर्स भी वीरान नजर आने लगेंगे और पोलो जैसे खेल इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। यह नहीं भूलना चाहिए कि इस बीमारी का संक्रमण इंसानों में भी हो सकता है, इसलिए अतिरिक्त सतर्कता जरूरी है। इस बीमारी के प्रति सचेत कर रहे हैं रजनीश राज

लाइलाज़ बीमारी

ग्लैंडर्स वायरस से फैलने वाली लाइलाज़ बीमारी है, जो बरसात से पहले होती है। इस बीमारी का अब तक कोई टीका विकसित नहीं किया जा सका है, इस कारण बीमारी से पीडि़त पशु को मारना ही एकमात्र उपाय है। अगर कोई मनुष्य इस बीमारी से ग्रसित पशु के संपर्क में आता है तो उसमें भी यह बीमारी फैलने की आशंका होती है। यूपी के छह जिले मेरठ, बुलंदशहर, हापुड़, गाजियाबाद, नोएडा और बागपत में इसका अधिक प्रकोप देखने को मिल रहा है। इस बीमारी का न तो कोई उपचार है और न ही इसके लिए कोई टीका। प्रदेश में सितम्बर, 2017 तक 180 पशु इस बीमारी से ग्रस्त पाए गए। अकेले सितम्बर माह में 21 नए रोगी पशु पाए गए हैं। इस वर्ष इस दौरान 143 बीमार पशुओं की मौत भी हो चुकी है।

ग्‍लैंडर्स बीमारी से ग्रस्‍त एक घोड़ा

सावधानी जरूरी

अगर अश्व प्रजाति के पशु लसलसा पदार्थ निकालना शुरू करें और उनके गले व पेट में गांठ दिखे, श्वास नली में छाले या फेफड़े में इन्फेक्शन के लक्षण मिलें तो सावधान हो जाएं। यह ग्लैंडर की शुरुआत हो सकती है। पशुपालन विभाग रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र संयुक्त निदेशक डॉ. एसके अग्रवाल कहते हैं कि पशुपालन  विभाग द्वारा तो समय-समय पर जिले में जांच की ही जाती है, अगर पशुपालक को भी इस बीमारी के लक्षण दिखें तो तुरंत पास के पशु चिकित्सालय में इसकी सूचना दें और खून की जांच कराएं। इस बीमारी से प्रभावित पशु को मारने के बाद छह फीट गहरे गड्ढे में दबा देना चाहिए या जला देना चाहिए। डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि ईंट-भट्ठों पर ईंट ढोने वाले खच्चर और गधों और सवारी ढोने वाले घोड़े या खच्चर में यह बीमारी सबसे अधिक होती है और तेजी से फैलती है। वे समूह में रहते हैं, इस कारण भी वहां बीमारी तेजी से फैलती है।

मुआवजे का है प्रावधान

इस कुदरती बीमारी का कोई इलाज अभी तक सामने नहीं आया है, इस कारण सरकार की ओर से पशुओं की मौत पर मुआवजे का प्रावधान किया गया है। ग्लैंडर से घोड़े के मरने पर 25,000 रुपए और गधे-खच्चर के मरने पर 16000 रुपए की धनराशि पशुपालकों को दी जाती है। हालांकि पशुपालकों को यह मुआवजा कम लगता है। इस वर्ष सितम्बर माह तक 22 लाख 49 हजार रुपए की धनराशि मुआवजे के रूप में वितरित की जा चुकी है।

हर तरफ है भय का माहौल

वर्ष 2006 में महाराष्ट्र में इस बीमारी के संक्रमण के बाद सैकड़ों घोड़ों, गधों और खच्चरों को मारना पड़ा था। इसके बाद इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी और सरकारी स्तर पर भी जांच और जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए गए। ग्लैंडर के खौफ का ही असर रहा कि राजस्थान में लगने वाले अंतरराष्ट्रीय पुष्कर मेले में इस साल अश्व वंश को मेले में साथ लाने पर रोक लगा दी गई। हालांकि पशुपालकों तथा पशु व्यापारियों ने इसका विरोध भी खूब किया, लेकिन कोई रिस्क नहीं लिया गया। मध्‍य प्रदेश के ग्‍वालियर और राजगढ़ में भी घोड़ों में ग्‍लैंडर्स के मामले सामने आए हैं।

क्‍या कहते हैं विशेषज्ञ

इस बीमारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए प्रदेश भर के पशु चिकित्सकों को इससे जुड़ी जानकारी और ट्रेनिंग दी जा रही है। इसकी रोकथाम के लिए प्रदेश में सर्विलांस चलाया जा रहा है। इसके तहत यूपी के गांव-गांव में जाकर पशुओं की जांच की जा रही है। हर जिले से प्रति माह औसत 20 सैम्पल लिए जाते हैं, जिन्हें जांच के लिए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान संस्थान, हिसार (हरियाणा) भेजा जाता है। पॉजीटिव रिजल्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाती है।

– डॉ. ए.एन. सिंह, निदेशक, रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र पशुपालन विभाग

यह बीमारी घोड़ों से मनुष्य में होती है, लेकिन इतनी जल्दी नहीं होती है। इस कारण घबराने की जरूरत नहीं है। इधर कई वर्षों से ऐसा कोई मामला नहीं आया है, जिसमें इस बीमारी से कोई व्यक्ति मरा हो। फिर भी सावधानी अत्यंत जरूरी है।

– डॉ. एसके अग्रवाल, संयुक्त निदेशक, रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र पशुपालन विभाग