• सप्लाई लपक ली चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और पाकिस्तान ने

दुनिया में चमड़ा उत्पादों के निर्यात में भारत का हिस्सा 50% है। वर्ष 2016-17 में विदेशी बिक्री का अनुमान करीब 5.7 अरब डॉलर था, जो एक साल पहले की तुलना में 3.2 फीसदी कम था। लेकिन फुटवियर निर्यात अप्रैल-जून में 4 प्रतिशत से अधिक गिरकर 674 मिलियन डॉलर का रह गया है। एनजीटी की सख्‍ती, नोटबंदी, जीएसटी, स्लाटर हॉउस बंद किए जाने और मवेशियों के कारोबार पर लगाम लगने से चमड़ा व्यापारियों के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। यही वजह है कि भारत से चमड़े के जूतों का निर्यात करीब 13 फीसदी कम हो गया है। देश के सबसे बड़े आगरा और कानपुर के चमड़ा उद्योग आज संकट में हैं। प्रस्‍तुत है धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी की रिपोर्ट –  

भारत से चमड़े के जूते का निर्यात 13 प्रतिशत कम हो गया है। एचएंडएम, इंडीटेक्स, ज़ारा और क्लार्क्स जैसे टॉप ब्रांडों ने भारत में दिए गए ऑर्डर रद्द करके सप्लाई के लिए चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और पाकिस्तान का रुख कर लिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति भारत के लिए बड़ा झटका है क्योंकि सरकार 2020 तक चमड़ा उद्योग की आय 27 अरब डॉलर से दोगुना करने और लाखों नई नौकरियां पैदा करने का दावा करती रही है। चमड़ा निर्यात परिषद के क्षेत्रीय निदेशक (मध्य क्षेत्र, कानपुर) अली अहमद कहते हैं, ‘यूरोपीय संघ से चमड़ा और उत्पादों की मांग में पिछले कुछ वर्षों से कमी आई है।’

स्लाटर हाउस की बंदी

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मार्च, 2017 में शपथ लेने के बाद अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई का आदेश दिया था। मई में केंद्र की मोदी सरकार ने भी बूचड़खानों पर कार्रवाई करते हुए वध के लिए पशुओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस आदेश को पलट दिया था। लेकिन इसके बाद भी चमड़े और मांस उद्योग में किसी तरह की राहत नहीं मिली। हालांकि चमड़ा उद्योग से जुड़े लोग कहते हैं कि भारत के मांस और चमड़े का अधिकतर व्यापार अनौपचारिक क्षेत्र पर निर्भर है क्योंकि लाइसेंस लेने की प्रक्रिया काफी मुश्किल है। आगरा के शौमेर पार्क एक्स्पोर्ट्स समूह के मुखिया नजीर अहमद कहते हैं कि देश में जगह-जगह गौरक्षक समूह सक्रिय हैं, ऐसे में कोई भी मवेशियों को लाने-ले जाने में जोखिम मोल लेना नहीं चाहता।

चमड़ा उद्योग पर नोटबंदी की मार : एसोचैम

उद्योग मण्डल ‘एसोचैम’ के मुताबिक, नोटबंदी की वजह से भी भारत के चमड़ा उद्योग पर सख्त मार पड़ रही है। चमड़े की वस्‍तुओं के उत्पादन में 60 प्रतिशत की गिरावट आने से करीब 75 फीसदी कामगार बेरोजगार हो गए हैं। नकद लेनदेन में परेशानी की वजह से जानवरों की खालें नहीं मिल पा रही हैं। देश के प्रमुख चमड़ा क्लस्टरों आगरा, कानपुर और कोलकाता में खालों की उपलब्धता में 75 प्रतिशत तक गिरावट आई है। वहीं चेन्नई के चमड़ा कारखानों में यह गिरावट करीब 60 प्रतिशत है। इसके अलावा ब्वायलर चलाने के लिए कोयले की आपूर्ति में भी गिरावट आई हैI आगरा, चेन्नई, कानपुर और कोलकाता के प्रमुख चमड़ा केंद्रों में चमड़ा उद्योग को उत्पादन के मोर्चे पर भी कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मौजूदा हालात में वे नए ऑर्डर भी नहीं ले पा रहे हैं, क्योंकि समय से तैयार माल की आपूर्ति नहीं हो सकेगी।

बूचड़खाने बंद होने से चमड़े के व्यापार पर असर
कानपुर चमड़ा कारोबार का हब हैI यहाँ तमाम टैनरी हैं, जहाँ घोड़ों की जीन, चमड़े की बेल्ट से लेकर बैग, जैकेट और जूते बनते हैं। देशभर में कच्चा चमड़ा भी कानपुर से जाता है। यहाँ से हर साल करीब 12 अरब डॉलर का चमड़े का सामान निर्यात होता है। कानपुर में सिर्फ 6 वैध बूचड़खाने हैं जबकि अवैध बूचड़खानों की संख्या 50 से ज्यादा है। अकेले कानपुर से रोजाना करीब 50 करोड़ के गोश्त का व्यापार होता है।

आंकड़ों के मुताबिक, भारत से 2015-16 में चमड़ा उत्पादों के निर्यात में 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई जबकि इसी अवधि में कानपुर से होने वाले इस निर्यात में 11 फीसदी की गिरावट आई। वहीं, जून में चमड़े के जूतों के निर्यात में 13 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।

यूपी के उद्योग विभाग में एक संयुक्त सचिव के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में कानपुर की 400 चमड़ा इकाइयों में से 176 बंद हो गई हैं। कुछ साल पहले तक कानपुर में विदेशी खरीदार आते रहते थे। रेड टेप, बाटा, हश पप्पिज, गुच्ची, लुइस वितों जैसे लगभग हर बड़े ब्रांड को चमड़े की सप्लाई कानपुर से होती थी। आज फैक्ट्रियों में कुछ दिनों का ही स्टॉक बचा है।

क्‍या कहते हैं व्‍यापारी

  • उत्तर प्रदेश लेदर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के महासचिव इफ्तिखारुल अमीन के अनुसार, चमड़ा उद्योग बहुत कठिन दौर से गुजर रहा है। वे कहते हैं, ‘जब माल आएगा नहीं तो टेनरी बंद हो जाएंगी। आगे काम कैसे होगा? खाल कहीं से मिल नहीं रही है, उनकी आवक मंडी में कम हो गई है।
  • लखनऊ में चमड़े के बड़े व्यापारी सलीम का कहना है कि प्रदेश में पहले से ही चमड़े की वस्तुओं पर कमी चल रही थी। जीएसटी से स्थितियां और भी प्रतिकूल हो गई हैं। फुटवियर में पहले 12% कर था, अब 18 प्रतिशत जीएसटी ली जा रही है।
  • कानपुर के एक व्यापारी असलम का कहना है कि अवैध बूचड़खानों को बंद करने का असर बाजार में दिखा है और निर्यात भी कम हुआ है, लेकिन यह जरूरी था। प्रदेश सरकार के साथ प्रदेश का व्यापारी खड़ा है। रही बात जीएसटी की, तो इसने तो सभी ट्रेड को प्रभावित किया है।
  • उत्तर प्रदेश आदर्श व्यापार मंडल के अध्यक्ष संजय गुप्ता का कहना है कि जीएसटी के कारण भी निर्यात प्रभावित हुआ है। सरकार व्यापारियों की समस्याओं को ध्यान में रखकर काम कर रही है। उम्मीद है कि जल्द ही निर्यात सामान्य हो सकेगा।

(जैसा रजनीश राज से बातचीत में बताया)

चमड़ा क्षेत्र को 2,600 करोड़ के पैकेज की तैयारी

चमड़ा क्षेत्र में रोजगार और निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार द्वारा जल्द ही 2600 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की जा सकती है। वरिष्ठ अधिकारियों और चमड़ा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने बताया है कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय अगले दो सप्ताह में यह प्रस्ताव मंत्रिमंडल को भेज सकता है। इस पैकेज में चमड़ा क्षेत्र के लिए, खासकर उद्योग में छोटी और मझोली इकाइयों के लिए कर और गैर-कर प्रोत्साहन दोनों शामिल हैं।

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने भी इसकी पुष्टि की और कहा, ‘हमने सभी पक्षों के साथ चर्चा की है और अब अन्य मंत्रालयों द्वारा उठाए मुद्दों पर विचार कर रहे हैं।’ पहले से ही दबाव से जूझ रहे चमड़ा उद्योग को नोटबंदी और जीएसटी के क्रियान्वयन के बाद दोहरी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि इस उद्योग में लेन-देन मुख्य रूप से नकदी पर ही आधारित थे। उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि इस क्षेत्र के लिए पैकेज बेहद जरूरी है, क्योंकि इसमें लघु व मझोली (एसएमई) इकाइयों की संख्या अधिक है।