• रजनीश राज

बधाई हो यूपी वालों ! हमें वायु प्रदूषण के क्षेत्र में बड़ी ‘इज्जत’ हासिल हुई है। हमारे उत्तर प्रदेश के कई शहर टॉप फाइव की पोजीशन पर पहुंच चुके हैं। चलिए अब कोई नहीं कह सकता कि हम यूपी वाले फिसड्डी हैं। नवाबों का शहर हो या ताज की नगरी, प्रदूषण सभी को जोड़ रहा है। विकास हर ओर बोल रहा है। भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत होकर हम प्रदूषण से भी प्यार कर बैठे हैं। इसी प्यार का रिजल्ट है कि प्रदूषण के मामले में हमारे प्रदेश के शहर झंडा लेकर हमेशा सबसे आगे रहते हैं।

लखनऊ के हजरतगंज में छाई धुंध

प्रदेश की राजधानी लखनऊ तो देश में तीसरे स्थान पर जगह बनाने में भी कामयाब हो चुकी है। …बधाइयां ! …बधाई इसलिए भी कि यह उपल​ब्धि लखनऊ को तब मिली है, जब यहां कल-कारखाने न के बराबर हैं। अब चूरन-चटनी वाले भला क्या प्रदूषण करेंगे। इस प्रदूषण का ही कमाल है कि हम लखनऊवालों को घनघोर मैदान में रहते हुए भी पहाड़ी इलाके जैसा मजा मिल जाता है। पूरी फिज़ा में धुंध ही धुंध दिखती है, जो अलग रूमानी अहसास कराती है। अलीगंज में रहने वाले एचएएल के शर्माजी को पहले लगता था कि यह दीपावली के पटाखों का साइड इफेक्ट है, लेकिन अब समझ में आया कि यह पटाखों की धुंध नहीं, बल्कि ऐसा सड़कों पर धुआं छोड़ते हुए बेतहाशा दौड़ रहीं डीजल गाड़ियों की वजह से है। इनमें शर्माजी के बच्चे को स्कूल ले जाने वाला टेम्पो भी है जो गाड़ी पर लिखे है ‘सीएनजी’, लेकिन भरवाता डीजल है।

लखनऊ में वाहनों की रेलमपेल भी प्रदूषण बढ़ाने में निभा रही प्रमुख भूमिका

कमाल का शहर है लखनऊ भी। यहां प्रदूषण सर्टिफिकेट से प्रदूषण दूर होता है। विकासनगर के गुप्ताजी का फार्मूला है कि जब तक गाड़ी चलती रहे, चलाते रहो। सर्विसिंग के लिए गाड़ी गैराज ले जाने का मतलब है हजार, दो-चार हजार की चोट। अब गुप्ताजी को कौन समझाए कि हजार बचाने के चक्कर में लाखों की सेहत से वे रोज खेल रहे हैं। अपनी गाड़ी से निकलने वाले धुएं को वे अगर झुककर देख लें तो शाहरूख खान से कालिया खान हो जाएंगे। …और नाका वाले मिश्राजी तो और कमाल के हैं। उनके घर के सामने साफ-सफाई रहे, बाकी दुनिया जाए भाड़ में। लोग साल में एक बार होलिका दहन करते हैं, वे हर दिन कूड़ा दहन करते हैं। उनको आसपास के लोग कैसे वहन करते हैं, यह तो कोई त्रिपाठीजी से ही पूछे। अब एक ही मोहल्ले में रहना है तो सब कुछ सहना है, वरना रोज ही पुलिस-कचेहरी हो।

हैरानी की बात तो यह है कि मिश्राजी से प्रदूषण पर कोई बात करो तो अगले ही पल से वे दार्शनिक भाव में आ जाते हैं। वे कहते हैं – अरे भाई! अब हमें कितने साल और जीना है। काहे का सिरदर्द लें। उन जैसे पढ़े-लिखे महापुरुष जैसा विचार अनपढ़ कल्लू नाई का भी है। कल्लू साफ कहते हैं कि ठंड रख यार। रुमाल है ना। घर से निकलते वक्त मुंह-नाक पर रख लिया कर।

चलो यारों, अब तैयारी करो कि हम टॉप पर पहुँच जाएं क्योंकि साफ़ आबोहवा तो कहीं पतली गली से निकल गई है और वो गली ठेलम ठेल रेलम पेल से अब इतनी संकरी हो गई कि वापस उसमें घुस पाना मुश्किल ही लग रिया है।