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मिसाल : गांववालों की प्यास बुझाने को 70 साल के सीताराम ने अकेले खोद डाला कुआं

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छतरपुर। बिहार में दशरथ मांझी ने अपने हौसले और जज्‍बे से अकेले पहाड़ को काटकर रास्‍ता बना दिया था। अब मध्य प्रदेश में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है। राज्‍य के छतरपुर जिले में एक 70 साल के बुजुर्ग को गांव वालों की परेशानी नहीं देखी गई। उन्‍होंने गांव वालों को पानी मुहैया कराने के लिए अकेले कुआं खोदने का बीड़ा उठाया है। वृद्ध शरीर और लड़खड़ाते कदमों के बावजूद सीताराम का जोश जवानों से कहीं ज्यादा है। सोशल मीडिया पर लोग उन्‍हें दूसरा दशरथ मांझी कहकर पुकारते हैं।

गांव में है सिर्फ एक हैंडपम्‍प

ये मामला है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के प्रतापपुरा पंचायत के हदुआ गांव का। इस गांव की आबादी लगभग 300 है। पूरे गांव में पीने के पानी के लिए सिर्फ एक हैंडपंप है। इस हैंडपंप से भी इतना पानी नहीं आता है कि ग्रामीणों की आधी प्यास भी बुझ सके। गांव में सूखा पड़ने के बाद यहां की स्थिति और भी दयनीय हो गई। इंसान ही नहीं, जानवर भी बेहाला प्यासे घूम रहे हैं। गांव के 70 वर्षीय सीताराम राजपूत से ग्रामीणों का दुख नहीं देखा गया। उन्‍होंने वर्ष 2015 में कुआं खोदने का फैसला किया। इस बुजुर्ग आदमी का जब गांव में किसी ने साथ नहीं दिया तो वह अकेले ही इस काम में जुट गए।

खुद ही मिट्टी खोदते हैं, खुद ही निकालते हैं

सीताराम के जज्‍बे की जितनी भी सराहना की जाए, कम है। अब सीताराम की दिनचर्या बन गई है कि वे कुएं में जाकर खुद ही मिट्टी खोदते हैं और मिट्टी फेंकने के लिए नंगे पैर रस्सी के सहारे कंटीली झाड़ियों से होकर बाहर आते हैं। सीताराम ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि पूरे गांव की प्यास बुझ सके। सीताराम ने 70 साल की उम्र में वो कर दिखाया है, जो शायद नौजवान भी न कर सकें।

कुआं खोदने के दौरान निकली मिट्टी बाहर लेकर जाते सीताराम

एक बार खोदने के बाद ढह गया कुआं

सीताराम पूरी लगन से कुआं खोदने में लग गए। लगातार 8 महीने की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार सीताराम की मेहनत रंग लाई और 33 फीट खुदाई करने के बाद धरती का सीना चीरते हुए कल-कल करता पानी निकलने लगा। लेकिन इसे सीताराम का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि वर्ष 2017 में ऐसी बरसात हुई कि कच्चा कुआं ढह गया। सीताराम के पास इतना पैसा नहीं था कि वह कुएं को पक्का बनवा पाते। वे कहते हैं कि न तो गांव वालों और न ही सरकार ने उनकी कोई मदद की। इससे वे थोड़े निराश जरूर हैं।

दोबारा जुटे कुआं खोदने में

बारिश में कुआं ढहने के बाद सीताराम की सारी मेहनत पर पानी फिर गया। एकबारगी ऐसा लगा कि सीताराम हताश हो गए हैं, लेकिन अपनी धुन के पक्के इस बुजुर्ग ने हौसला नहीं खोया। उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके सीताराम ने अब भी हार नहीं मानी है और फिर से कुआं खोदने में जुट गए हैं। सीताराम ने फैसला किया कि वह दुनिया छोड़ने से पहले गांव को कुछ ऐसा देकर जाएंगे कि आने वाली पीढ़ियां भी उनका नाम याद करेंगी।

कौन हैं सीताराम प्रजापति ?

सीताराम की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उन्होंने शादी नहीं की और आजीवन अविवाहित रहने का फैसला किया। वह अपने छोटे भाई के साथ संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके भाई हलके लोधी की उम्र 60 साल है और उनके पास 20 एकड़ की खेती भी है। सीताराम बताते हैं कि परिवार वालों ने उन्हें कुआं खोदने से मना किया था, लेकिन सीताराम गांव वालों की परेशानी देखते हुए अपने फैसले पर अटल रहे।

मदद को कोई नहीं आया आगे

गांव में पानी की किल्‍लत को देखते हुए सीताराम राजपूत ने अकेले कुआं खोदना शुरू किया, लेकिन कोई सीताराम की मदद को आगे नहीं आया। 70 साल की उम्र में गांव के लिए कुआं खोद रहे सीताराम राजपूत के जज्बे को लोगों ने सलाम किया है। लोगों ने सरकार से अपील की है कि इस काम में उनकी मदद की जाए। उधर, कुछ लोगों ने गांव में पानी न पहुंचाने के लिए शिवराज सिंह चौहान की सरकार पर भी हमला बोला है। लोगों का कहना है कि मुख्‍यमंत्री प्रदेश की तुलना अमेरिका से करते हैं और हाल यह है कि लोगों के पास पीने के लिए पानी तक नहीं है।

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