पॉटी पर नहीं खर्च करना चाहते भारतीय

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  • सुविधाएँ नहीं तो पैसा नहीं, पैसा नहीं तो कैसे बढ़ें सुविधाएँ
  • टायलेट इस्तेमाल पर खूब हैं पूर्वाग्रह जो बढ़ाती हैं मुश्किलें तो कैसे रुके खुले में शौच

Alex Armand, Britta Augsburg and Antonella Bancalari-Valderrama

लखनऊ। मुख्य शहर से लगा हुआ विश्व प्रसिद्ध मैनेजमेंट कालेज आईआईएम और उसी से सटा एक गांव मुबारकपुर। शाम के 6.30 बजे थे। 5-6 महिलाएं एक लाइन में चली जा रही थी। ध्यान से देखा तो हाथ में लोटा भी था। साफ था धुंधलका होते ही वो निकल पड़ी थीं, जिन्दगी का सबसे जरूरी काम निपटाने।

बड़े बड़े सरकारी दावों के बावजूद लखनऊ शहर की सीमा के अंदर ही मुबारकपुर गांव हो या नेपाल बार्डर के पास पचपकपकड़ी गांव या फिर शहर में बसी झुग्गी-झोपड़ियां हों, खुले में शौच जाते लोग आमतौर पर दिख जातें हैं। आखिर ऐसी क्या बात है कि करोड़ों सरकारी रुपए खर्च होने के बावजूद लोग खुले में शौच जाना पसंद करते हैं। कहां दिक्कत है?

इंस्टीट्यूट ऑफ़ फिस्कल स्टडीज (IFS)द्वारा लखनऊ और कानपुर में मार्सेल रिसर्च (Morsel) और फिनिश सोसाइटी के साथ चल रहे अध्ययन से यह बात साफ हुई है कि स्लम में रहने वाले लोग सामुदायिक शौचालय पर कुछ ज्यादा खर्च करने की इच्छा नहीं रखते। फिर शौचालयों को मोहल्ले के लोगों से पैसे लेने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती। आमदनी बढ़ती नहीं तो शौचालय बेहतर नहीं हो पाते और शौचालय की खराब हालत के लिए लोग पैसे देना चाहते।

यह दुष्चक्र दोनों शहरों के बस्तियों के 1500 घरों में चल रहे अध्ययन में सामने आया। यहाँ यही जानने की कोशिश की गई कि आखिर लोग सामुदायिक शौचालय के इस्तेमाल के लिए कितना खर्च करना चाहते हैं?

पुरुष हर बार शौच जाने पर लगभग 1.45 रुपए ही देना चाहते हैं, जो कि बाजार रेट से काफी कम है। लगभग हर सामुदायिक शौचालय शौच जाने पर 5 रुपए चार्ज करता है। वहीं महिलाएं केवल 1.33 रुपए ही देना चाहती हैं। हालांकि पुरुष और महिलाओं दोनों ने स्वीकारा कि अगर शौचालय में सुविधाएं बेहतर हो जाएं तो वो दोगुना भी देने को तैयार हैं। ये सुविधाएं बहुत बेसिक हैं, जैसे-हाथ धोने की सही व्यवस्था, साफ-सुथरा शौचालय, रोशनी की अच्छी व्यवस्था और दरवाजों को अंदर से सही से बंद करने के लिए अच्छी कुंडियां।

औसतन पुरुष और महिलाओं दोनों ने स्वीकारा कि अगर ये सुविधाएं मिल जाएं तो वे बाजार के रेट से ज्यादा भी देने को तैयार हैं और ये औसत करीब 5.3 और 5.5 रुपए है।

स्रोतः 1500 घरों में किए गया बेसलाइन सर्वे। पैसा खर्च करने की इच्छा जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने हर घर के दो सदस्यों को 0 से 60 की रेंज में रुपए और सामुदायिक शौचालय इस्तेमाल करने के लिए 10 टिकटों में किसी एक को चुनने को कहा गया।

इन परिणामों से साफ है कि भारत के स्लम में रहने वाले परिवार मौजूदा स्तर के टायलेट में बाजार के रेट से फीस नहीं देना चाहते। और यह भी साफ है कि बेहतर और साफ-सुथरे टायलेट के लिए वे ज्यादा फीस भी देने को तैयार हैं। हालांकि इसके बाद भी सबसे बड़ी मुश्किल है कि लोग टायलेट इस्तेमाल के बारे में भरपूर पूर्वाग्रह भी हैं और यही नीतियां बनाने वालों के लिए मुश्किलें भी खड़ी करती हैं। वैसे कई अध्ययनों में साफ हो चुका है कि जानकारी देने से लोगों का साफ-सफाई, पानी और स्वच्छता के बारे में विचार बदलते हैं। कई कार्यक्रमों में यह भी पाया गया कि इससे लोगों को प्रोत्साहन मिलता है।  (See Gertler et al. 2015Van Minh et al. 2013 and Pickering et al. 2015).

इन सारे अध्ययनों के बावजूद अबभी हमें बेहद मजबूत डेटा और साक्ष्य चाहिए कि आखिर कौन सी दिक्कत लोगों को टायलेट इस्तेमाल से रोकती है। खराब सुविधाएं या उन्हें और जानकारी चाहिए कि उन्हें क्यों शौचालय का इस्तेमाल करना चाहिए।

ज्यादा जानकारी के लिए क्लिक करें (IFS or Morsel)

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