सामाजिक-मानसिक लर्निंग से बच्चों में आती है खुद की ताकत पहचानने की क्षमता

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लखनऊ। प्राइमरी स्कूलों को स्टैंडराइज्ड करने से ही बेसिक शिक्षा में बदलाव आ सकता है। एक्टिविटी बेस्ड और रूचिपूरक पढ़ाई से बच्चों की अटेंडेंस बढ़ाई जा सकती है और ड्रापआउट कम किया जा सकता है। जबकि सामाजिक-मानसिक लर्निंग देने से बच्चों में इंटरपर्सनल और इंटरापर्सनल व्यक्तित्व का विकास होता है। इससे बच्चों में खुद की ताकत को समझने और कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने की क्षमता विकसित होती है और सबसे बड़ी बात वो दूसरे के इमोशन को अच्छी तरह से समझ पाते हैं।

 


अभिज्ञा फाउडेंशन में आयोजित राउंड टेबल डिबेट आन सोशियो-इमोशनल लर्निंग एंड इट्स इम्पैक्ट आन प्राइमरी एजुकेशन इन उत्तर प्रदेश में बाल-मनोचिकित्सक डा. अर्चना शुक्ला ने बताया कि सरकार सारे काम नहीं कर सकती। हम छोटी-छोटी चीजों के बारे में पूछ कर, बच्चों के आईक्यू लेवल और इमोशनल क्षमता के बारे में पता लगा सकते हैं। जैसे-आपके पास वाली नदी का नाम क्या है और पानी का क्या-क्या इस्तेमाल हो सकता है। उन्होंने बताया कि बच्चे के साथ-साथ मां का भी ध्यान रखना होगा क्योंकि बच्चे के दिमाग का 70
फीसदी विकास गर्भ में ही हो जाता है और 6 साल की उम्र तक ही आईक्यू लेवल के विकास पर काम किया जा सकता है।

डा. शुक्ला ने बताया कि बच्चों की इमोशनल क्षमता समझने के लिए सीधे उन्हीं से सवाल करने चाहिए। जैसे- उन्हें किस बात पर गुस्सा या रूलाई आती है और वो आस-पास की चीजों से क्या समझ रहें हैं। डा. अर्चना का कहना है कि आज-कल माता-पिता ही बच्चों के लिए सब चीजें करते हैं और वही सारी क्षमताएं डेवलप करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बच्चों में उनका खुद का कुछ नहीं है। माता-पिता ही बच्चों का पहला स्कूल है और उन्हें समझना होगा कि क्वालिटी समय का मतलब क्या है।

फ्रीलांस कल्सेंटेंट और जर्नलिस्ट प्रीति एम. शाह का कहना है कि मैं आज भी देखती हूं कि माता-पिता बच्चों का शारीरिक सजा देते हैं, मुर्गा बना देते हैं या धूप में खड़ा कर देते हैं। इन सब बातों का हमेशा बच्चों के सामाजिक-मानसिक विकास पर उल्टा ही असर पड़ता है। इसके साथ ही माता-पिता को ही बैड टच और गुड टच की जानकारी देनी होगी। उन्होंने बताया कि स्कूलों में खूब एक्टिविटी होनी चाहिए जैसे-सड़कों में लगने वाली गिट्टी को कलर करके कैलकुलेशन और गिनती की जानकारी दी जा सकती है और बहुत सस्ते में मिलने वाली रस्सी और टायर की मदद से शारिरिक प्रशिक्षण से उनके मानसिक विकास को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा बड़ी-बड़ी बातें बताने या तकनीकी पढ़ाई कराने से पहले बेसिक चीजों पर काम करना चाहिए और बच्चों में सीखने की क्षमता का विकास करना चाहिए।

बच्चों की शिक्षा के लिए काम करने वाली संस्था ग्लोबल क्लासरूम प्राइवेट लि. में कटेंट राइटर अनुराग मिश्रा ने बताया कि बच्चों को पढ़ाने का तरीका बदलना चाहिए। हमें ‘क’ से कबूतर नहीं, कबूतर से ‘क’ बताना चाहिए क्योंकि बच्चे कबूतर को पहचानते हैं और उन्हें आसानी से अक्षर ज्ञान दिया जा सकता है। इसके साथ ही हमें लर्निंग इनवायरेंमेंट पर काम करना चाहिए। उन्हें उनके आस-पास की चीजों से सिखाने की कोशिश करनी चाहिए, ना कि किताबों का बोझ डालना चाहिए।

अभिज्ञा फाउडेंशन के अध्यक्ष भारतेन्दु त्रिवेदी ने बताया कि संस्था मुख्य रूप से चार पैरामीटर्स पर काम कर रही है। इनमें पैरेंट्स-टीचर, टीचर और बच्चों के बीच और बच्चों और पैरेंट्स के बीच संचार को बढ़ावा देना मुख्य है। इससे बच्चों के मानसिक विकास के साथ-साथ उनका सामाजिक-भावनात्मक विकास भी होगा। इसके अलावा बच्चों को डांस का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है और हर महीने एक रोल माडल पर आधारित फिल्म भी दिखाई जा रही है। ये सारी चीजें मिलकर बच्चे के सम्पूर्ण विकास में मदद करेंगी। फाउडेंशन की प्राजेक्ट मैनेजर नीलिमा सिंह ने बताया कि सामाजिक-मानसिक विकास बच्चों के इंटरपर्सनल और इंटरापर्सनल व्यक्तित्व का विकास करता है। इससे बच्चों में खुद की ताकत को समझने और कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने की ताकत का विकास होता है और सबसे बड़ी बात वो दूसरे के इमोशन को अच्छी तरह से समझ पाते हैं।

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