लुप्त होने के कगार पर हैं भारत की 183 बोलियां, 7 राज्यों में ज्यादा खराब हालात

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नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को ने भारत की 183 बोलियों पर संकट का इशारा किया है। यानी अगर वक्त रहते कदम न उठाए गए, तो इन बोलियों के खत्म होने की आशंका है। इन 183 बोलियों को बोलने वाले लोग कम हो रहे हैं और दूसरी बोलियों को अपनाया जा रहा है। जिसकी वजह से ये बोलियां संकटग्रस्त की श्रेणी में आ गई हैं।

यूनेस्को की रिपोर्ट कहती है कि भारत में मौजूदा दौर में 780 तरह की बोलियां हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 183 बोलियों के लुप्त होने का खतरा है, क्योंकि इन्हें बोलने वाले लोग या तो कम हो रहे हैं, या उनकी प्राचीन बोलियों पर दूसरी बोलियां हावी हो रही हैं। इसके अलावा अपनी पैतृक जमीन छोड़ने की वजह से भी परिवारों के युवा अपनी प्राचीन बोली को नहीं जान पा रहे हैं।

किसी बोली के लुप्त होने का खतरा भांपने के लिए यूनेस्को ने 9 सूत्र तय किए हैं। इनमें अपनी बोली छोड़ दूसरी बोली बोलने लगना, खास बोली को बोलने वाले लोगों की संख्या में कमी, कुल जनसंख्या में ऐसे लोगों का प्रतिशत, संबंधित इलाके में उस खास बोली को बोलने वालों की तादाद, मीडिया और बोलचाल में उस बोली का इस्तेमाल, प्राचीन बोली को जीवित रखने के लिए उन्हें दूसरों को बताना, सरकार की प्राचीन बोलियों को संरक्षित करने की नीति, अपनी बोली के प्रति समुदायों का भाव और इन बोलियों का दस्तावेजीकरण शामिल है। इन सूत्रों में कमी का मतलब ये होता है कि संबंधित प्राचीन बोली लुप्त होने का खतरा झेल रही है।

इसके अलावा घर के बाहर अपनी बोली न बोलने, बच्चों को अपनी प्राचीन बोली न आने, सिर्फ बुजुर्गों की जुबान से प्राचीन बोली निकलने, कुछ ही बुजुर्गों की जुबान पर बोली आने, बोली को जानने वाला कोई भी न होने से भी प्राचीन बोलियों के लुप्त होने का खतरा यूनेस्को भांपता है।

यूनेस्को के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, नगालैंड, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा में सबसे ज्यादा प्राचीन बोलियों के लुप्त होने का खतरा है। जबकि, यूपी, बिहार और केरल में एक-एक बोली के लुप्त होने का खतरा बन गया है।

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