पानी नहीं, ‘जहर’ पी रही है हिंडन नदी के किनारे बसी लाखों की आबादी

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नई दिल्‍ली। माना जाता है कि नदी के किनारे बसे गांव ख़ुशहाल होते हैं। गांव में नदी होना ख़ुशक़िस्मती माना जाता है, लेकिन हिंडन नदी के किनारे बसे गांवों पर आज यह बात लागू नहीं होती। पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के कई जिलों में हिंडन नदी के किनारे बसी लाखों की आबादी पर इसके प्रदूषित पानी की वजह से जान का खतरा मंडरा रहा है। इन ज़िलों के 154 गांव हिंडन और इसकी सहायक नदियों कृष्णा और काली के किनारे बसे हैं, जहां की आबादी जहरीला पानी पीने की वजह से अनेक बीमारियों से जूझ रही है।

हिंडन नदी से ऑक्‍सीजन गायब

वैज्ञानिकों की मानें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहने वाली हिंडन नदी के पानी में से ऑक्सीजन एक तरह से गायब हो चुकी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि नदी में लगातार औद्योगिक अपशिष्ट कूड़ा-कचरा आदि डालने से उसमें घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 2 से 3 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गई है। शोधकर्ता डॉ. प्रसूम त्यागी बताते हैं कि प्रायः ऑक्सीजन का स्तर 60 लाख मिलीग्राम प्रति लीटर या ज्यादा होना चाहिए। आज इस नदी में जो बह रहा है वो पानी नहीं है, बल्कि ऐसा तेजाब है जो पिछले एक दशक में सैकड़ों जिंदगियां बर्बाद कर चुका है।

कहां से निकलती है यह नदी ?

इतिहास खंगालेंगे तो इस नदी का जिक्र महाभारत में भी मिलता है। वैसे हिंडन नदी, उत्तरी भारत में यमुना की एक सहायक नदी है। इसका प्राचीन नाम हरनदी या हरनंदी भी था। इसका उद्गम सहारनपुर जिले में निचले हिमालय क्षेत्र के ऊपरी शिवालिक पर्वतमाला से होता है। यह पूरी तरह वर्षा पर आश्रित नदी है और इसका बेसिन क्षेत्र 7,083 वर्ग किलोमीटर है। यह गंगा और यमुना नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर की लम्बाई में मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद जिलों और नोएडा, ग्रेटर नोएडा से निकलते हुए दिल्ली से कुछ दूरी पर यमुना मिल जाती है।

हिंडन नदी में इस तरह गिरता है फैक्ट्रियों का जहरीला कचरा

लगातार बढ़ा प्रदूषण

हिंडन नदी में पश्चिमी जिलों के औद्योगिक क्षेत्र से डिस्टलरी और अन्‍य फैक्ट्रियों का अपशिष्ट, वेस्ट डिस्चार्ज, धार्मिक पूजन सामग्री और मलमूत्र मिलते हैं। कई गांवों के लोग तो अपने पशुओं को भी इसमें नहलाते हैं, जिसके कारण इसके प्रदूषण में लगातार बढोतरी हो रही है। अब इस नदी में प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि जलीय प्राणियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। लगभग 10 साल पहले तक नदी में अनेक कशेरुकी प्राणी, मछलियां व मेढक आदि मिलते थे, लेकिन आज प्रदूषण की वजह से इसमें सिर्फ सूक्ष्मजीव, काइरोनॉमस लार्वा, नेपिडी, ब्लास्टोनेटिडी, फाइसीडी, प्लैनेरोबिडी परिवार के सदस्य ही बचे हैं।

कैंसर समेत कई बीमारियों का प्रकोप

एम्स, दिल्ली में ऑन्कोलॉजी मेडिसिन के प्रोफ़ेसर अतुल शर्मा बताते हैं, ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च इन कैंसर’ ने एक अध्ययन में पाया है कि हैवी मेटल जैसे मर्करी, लेड, आर्सेनिक, क्रोमियम, निकिल, सल्फ़ाइड को पहली कैटेगरी के मेटल में रखा गया है। इसका अर्थ होता है कि इसके बात के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है कि इनसे कैंसर होता है।’ बता दें कि ये सारी चीज़ें फ़ैक्ट्री के कचरों में भारी मात्रा में होती हैं, खेतों में इस्तेमाल की जाने वाली खादों में भी यह होता है और इनके ज़रिए भूमिगत पानी और खाने-पीने की चीज़ों में पहुंच जाता है। प्रोफेसर शर्मा बताते हैं कि इनसे कैंसर के अलावा भी हार्ट से जुड़ी बीमारी, कई तरह के चर्म रोग और किडनी फ़ेल होने की आशंका भी होती है।

कैंसर से सैकड़ों मौतें

सहारनपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर  है, जो कागजों के लिए मशहूर है। यहां कागज की करीब आधा दर्जन फैक्ट्रियां हैं और इन्हीं फैक्ट्रियों का जहरीला पानी नदी को लगातार जहरीला बना रहा है। सहारनपुर के कुतबा माजरा, अंबेहटा, ढायकी, महेशपुर, शिमलाना आदि गांवों में कैंसर से 220 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। यहां के परागपुर गांव में पिछले दो साल में करीब एक दर्जन से ज्‍यादा लोगों की कैंसर से मौत हुई है और ढेर सारे लोग त्वचा, टीबी और दमा जैसी बीमारियों से लड़ रहे हैं। यही नहीं, हिंडन किनारे बसे मुजफ्फरनगर जिले के नरा गांव में तो प्रदूषित पानी की वजह से 70 साल से ज्यादा की उम्र का कोई बाशिंदा ही नहीं है। प्रदूषित पानी की वजह से कई गांवों में बच्‍चे अपंग पैदा हो रहे हैं।

भूजल भी हुआ जहरीला

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़,  हिंडन किनारे बसे 6 ज़िलों में लगभग 316 फ़ैक्ट्रियां हैं जिनमें से वर्तमान में 221 फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं। इनका कचरा नदी में जाता है इसलिए नदी का पानी ज़हरीला हो चुका है।  लेकिन बात यहीं खत्‍म नहीं होती। अगर बात सिर्फ इतनी ही होती तो गांव के लोग नदी का पानी पीने की बजाय कुएं, ट्यूबवेल या हैंडपंप का पानी पी सकते थे। लेकिन हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि यह ज़हरीला पानी अब ज़मीन के नीचे तक पहुंच चुका है। यहां पानी में निकल, पारा, कैडमियम, सल्फ़ाइड, क्लोराइड जैसे जानलेवा हैवी मेटल काफ़ी ज़्यादा मात्रा में है, जिसके कारण गांवों के हैंडपंप का पानी ज़हरीला हो चुका है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो ग्रामीणों के पास पास अब कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। वे जानते हैं कि हर घूंट के साथ ज़हर उनके शरीर में जा रहा है, लेकिन वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

तेजाबी पानी ने किया बुरा हाल

हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुख रह चुके डॉ. सीवी सिंह बताते हैं, ‘जब मैंने हिंडन नदी के पानी की जांच कराई थी तो लैब के वैज्ञानिक ने हैरानी से कहा था कि यह पानी नहीं हो सकता। यह तो केमिकल का मिश्रण है। आज यही पानी लोगों तक पहुंच रहा है। मेरठ के किनौनी गांव में खेतों में काम करने वाले कई ग्रामीणों को नदी के पानी ने ही विकलांग बना दिया है। खेतों में इस्तेमाल होने वाले नदी के प्रदूषित पानी ने उनके पैरों का अंगूठा और उंगलियां छीन ली हैं।

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