उठाने होंगे ये कदम, जिनसे मध्यप्रदेश की जनता को खुशहाल बना सकेगी नई सरकार

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विश्वजीत भट्टाचार्य

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए वोटिंग हो चुकी है। 11 दिसंबर को पता चलेगा कि बीजेपी को लगातार चौथी बार राज्य की सत्ता मिलती है या कांग्रेस यहां सरकार बनाती है। सरकार किसकी बनेगी, इसे लेकर चर्चाओं का दौर जारी है, लेकिन हकीकत ये है कि जिसकी भी सरकार बने, उसके सामने क्षेत्रफल के लिहाज से देश के सबसे बड़े और आबादी के हिसाब से देश के पांचवें बड़े राज्य की जनता को खुशहाल बनाने के लिए बड़ी चुनौतियों से निबटना होगा।

साल 2000 में मध्यप्रदेश से काटकर नया राज्य छत्तीसगढ़ बनाया गया था। इसके बाद मध्यप्रदेश में खनिज संपदा भी करीब-करीब खत्म हो गई है। फिलहाल मध्यप्रदेश में 72 फीसदी आबादी गांवों में रहती है और 30 फीसदी हिस्सा जंगलों का है। बात करें आदिवासियों की, तो आबादी का करीब 21 फीसदी यानी 1 करोड़ 53 लाख आदिवासी हैं और 16 फीसदी यानी 1 करोड़ 13 लाख दलित हैं।

मध्यप्रदेश में 2015-16 में 82 फीसदी पुरुष और 59 फीसदी महिलाएं साक्षर थे। ये आंकड़ा देश में सबसे कम है। हालांकि, साक्षरता में बढ़ोतरी ऐसे समझी जा सकती है कि साल 2005-06 में साक्षरता की दर 44 फीसदी थी। यानी साक्षरता को बढ़ाना नई सरकार की प्राथमिकताओं में से एक होनी चाहिए।

लिंगानुपात की बात करें, तो मध्यप्रदेश में साल 2015-16 में ये प्रति 1000 बालक पर 927 बालिकाओं की थी। जबकि, 2005-06 में प्रति 1000 बालकों पर 960 बालिकाओं की थी। ये आंकड़े राष्ट्रीय औसत यानी 919 बालिकाओं से ज्यादा भले ही है, लेकिन इसमें भी सुधार की दिशा में नई सरकार को काम करना होगा।

मध्यप्रदेश की सड़कों की दुर्दशा को लेकर हमेशा चर्चा होती है। राज्य में 87 फीसदी ग्रामीण इलाकों से गुजरने वाली सड़कें तारकोल से बनी हैं। ये आंकड़ा राष्ट्रीय आंकड़े 64 फीसदी से कहीं ज्यादा है, लेकिन सिर्फ 72 फीसदी गांवों में ही पक्की सड़कें हैं। जो 80 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। ये यहां हमेशा चुनावी मुद्दा भी बनता है। ऐसे में मध्यप्रदेश की नई सरकार को सड़कों को पक्का कराने की चुनौती से भी निबटना होगा।

मध्यप्रदेश में इस बार हुए विधानसभा चुनावों में किसानों की बदहाली का मुद्दा विपक्ष ने जमकर उछाला। वजह ये है कि मध्यप्रदेश में साल 2016 के आंकड़े बताते हैं कि औसतन हर दिन एक किसान ने आत्महत्या की। लोकसभा में मोदी सरकार ने 20 मार्च 2018 को बताया था कि 1321 किसानों की खुदकुशी के मामलों के साथ मध्यप्रदेश महाराष्ट्र (3661 खुदकुशी) और कर्नाटक (2079 खुदकुशी) देश में तीसरे नंबर पर है। जिस राज्य की ज्यादातर आबादी खेती करती हो, उसे खुशहाल बनाने के लिए मध्यप्रदेश की नई सरकार को ऐसी योजनाएं बनानी पड़ेंगी, जो किसानों को नुकसान से उबारकर उनकी खुदकुशी की घटनाओं को रोक सके।

मध्यप्रदेश में आम लोगों को खुशहाल बनाने के लिए उनकी प्रति व्यक्ति आय में भी बढ़ोतरी की चुनौती से नई सरकार को निबटना होगा। साल 2005-06 में मध्यप्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 16 हजार 631 रुपए थी। जबकि 2014-15 के आंकड़ों में प्रति व्यक्ति आय औसतन 56 हजार 182 रुपए बताई गई। ये आंकड़ा पूरे देश में पांचवीं सबसे कम औसत आय है।

मध्यप्रदेश की कुल आबादी का 31 फीसदी यानी 2 करोड़ 34 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। ग्रामीण इलाकों में ये गरीब औसतन हर महीने 717 और शहरी इलाकों में औसतन हर महीने 897 रुपए ही कमा पाते हैं। ऐसे में गरीबी उन्मूलन के कदम उठाकर समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों को खुशहाल बनाने का काम भी नई सरकार को करना होगा।

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