सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की भरमार, जानिए दुनिया में कहां से फैला यह जाल

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नई दिल्‍ली। फेक न्यूज आज पूरी दुनिया के लिए चुनौती है और इससे निबटने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। वर्ष 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इसका बाजार तेजी के साथ बढ़ा और पिछले दिनों मैसिडोनिया को भी इससे दो चार होना पड़ा है। सवाल उठता है कि आखिर फेक न्‍यूज का सिलसिला कैसे शुरू हुआ। सासका नाम के एक खोजी पत्रकार हैं, जो फेक न्यूज उद्योग पर रिसर्च कर रहे हैं। उनका मानना है कि मैसिडोनिया एक ऐसा देश है जहां फेक न्यूज तैयार होने के साथ उसकी खपत भी होती है। फेक न्यूज का सबसे अधिक इस्तेमाल इस छोटे से देश में ही होता है।

यहां बिक चुका है स्‍थानीय मीडिया

सासका बताते हैं कि मैसिडोनिया का स्थानीय मीडिया पूरी तरह बिका हुआ है। आज आलम यह है कि मैसिडोनियन के लोगों को देश के बारे में खबरें फेसबुक और छोटी वेबसाइट चलाने वाले लोगों से ही मिलती हैं। इन खबरों पर रोक लगाने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। इसका परिणाम यह है कि 20 लाख की आबादी वाला यह देश उन्हीं खबरों पर भरोसा करता है। इसी का नतीजा है कि जनता फर्जी खबरों के जाल में फंसकर गलत फैसला करती है। ऐसी खबरें लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरे में डालती हैं।

मैसिडोनिया में जनमत संग्रह

मैसिडोनिया छोटा देश है जिसकी आबादी करीब 20 लाख है। यह बेहद गरीब देश है। बता दें कि मैसिडोनिया का संवैधानिक नाम उत्तरी मैसिडोनिया करने के लिए पिछले महीने वहां जनमत संग्रह हुआ। मैसिडोनिया के संविधान का प्रारूप बनाने वाले लजोंबिर फ्रकोस्कि का कहना है कि किसी भी देश की जनता शांति और विकास चाहती है और मैसिडोनियावासी भी यही चाहते हैं। हालांकि लोगों को जनमत संग्रह में भाग लेने से रोकने के लिए सुरक्षाकर्मी, विरोधी ताकतें और फर्जी खबरें या सोशल मीडिया पर अफवाह ने इसके लिए पूरी ताकत लगा दी। इसी का नतीजा रहा कि बहुत कम लोगों ने जनमत संग्रह में भाग लिया और कोई निर्णय नहीं हो सका।

इंटरनेट से होती है कमाई

इंटरनेट मार्केटिंग कंसलटेंट मिर्को सेसेलकोस्कि लोगों को इंटरनेट से पैसा कमाने के गुर सिखाते हैं। वे कहते हैं कि पढ़े-लिखे युवा खबरों और सूचनाओं को बेहतर ढंग से प्रसारित करने में कुशल होते हैं। ये वही युवा हैं जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप को चुनाव जीतने में मदद की थी। वे बताते हैं कि इनके बहुत सारे स्टूडेंट कंप्यूटर साइंस के जानकार थे जिनके पास नौकरी नहीं थी। ये लोग कार, हेल्थ फिटनेस और सेलिब्रिटीज के बारे में खबरें लिखकर अपना खर्च चलाते थे। जब इन्हें ट्रंप के पक्ष में खबरें चलाने को कहा गया तो ये इनके लिए बेहतर मौका था। सभी ने इस मौके को भुनाया और आज दुनियाभर में यही हो रहा है।

एक खबर की 10 हेडिंग

जानकार बताते हैं कि इंटरनेट से शब्दों और खबरों का चयन करने के बाद उसको 10 तरह की हैडिंग देकर उसकी गंभीरता की जांच की जाती थी जिससे वह आक्रामक और रोचक बन सके। फेसबुक को खबरों के प्रचार-प्रसार का सबसे आसान माध्यम माना जाता है और खबरों पर काम करने वाले लोग इससे अच्छा पैसा भी कमाते हैं। 20 वर्ष से कम उम्र के युवा इस ओर अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं क्योंकि उन्हें अच्‍छे से पता होता है कि इंटरनेट यूजर किन चीजों को पढऩा या देखना पसंद करते हैं। प्लेटफॉर्म पर खबरों के आने के बाद शुरू होता है लाइक और शेयर का खेल, जिससे कडिय़ां आपस में जुड़ती हैं और मैसेज व पोस्ट एक से दूसरे स्थान या फिर एक देश से दूसरे देश तक फैलते हैं।

भारत में फेक न्‍यूज

भारत में भी फेक न्यूज  की समस्या लगातार बढ़ रही है। फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया मंचों का गलत और झूठी सूचनाएं फैलाने के लिए धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। व्हाट्सएप ग्रुपों और फेसबुक पर फैलने वाली फर्जी खबरें  देश में बेहद गंभीर समस्याएं पैदा कर रही हैं और लोगों की जान तक चली जा रही है। इसकी वजह से विभिन्न समुदायों, जातियों और धर्मों के बीच मतभेद पैदा हो रहे हैं। पिछले दिनों में ऐसी कई मिसालें हैं जब लोगों को गुमराह करने वाली खबरें और प्रोपेगेंडा सोशल मीडिया पर वारयल हो गया। पिछले साल ही रोहिंग्या लोगों के खिलाफ खूब दुष्प्रचार किया गया। इससे पहले झारखंड में व्हाट्सएप के जरिए बच्चों को अगवा करने वाले एक गैंग के बारे में अफवाह फैली। इसके बाद कई लोगों को सरेआम लोगों ने पीटकर मार डाला। बाद में पता चला कि वह झूठी अफवाह थी और मारे गए लोग निर्दोष थे।

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