गलत सोचने से पहले हो जाएं सावधान, मन की बात पढ़ लेगी यह डिवाइस

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न्‍यूयॉर्क। आपने कई कहानियों में सुना होगा कि प्राचीन काल में कई ऋषि-मुनियों को इतनी सिद्धि प्राप्‍त होती थी कि वे उसके बल पर दूसरे के मन की बात भी जान लेते थे। हालांकि समय बीतने के साथ ये क्षमताएं भी विलुप्‍त हो गईं, लेकिन अब एक बार फिर वैज्ञानिकों ने ऐसा चमत्कार कर दिखाया है। दरअसल वैज्ञानिकों ने एक ऐसी डिवाइस बनाई है, जो बता सकती है कि आपके सामने बैठे व्यक्ति के दिमाग में क्या चल रहा है।

किसने बनाई डिवाइस ?

दरअसल, ऐसा अमेरिका के मैसाचुएट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत और उच्‍च तकनीक के कारण संभव हो पाया है। शोधकर्ताओं ने आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस को आधार बना कर एक ऐसा कंप्यूटर इंटरफेस बनाने का दावा किया है जो इंसान के मन में सोचे गए शब्दों को बिना सुने ही चेहरा पढ़कर बता देगा। इस सिस्‍टम को शब्दों के साथ विशेष संकेत से परस्पर जुड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया है।

शोधकर्ताओं में भारतीय मूल के अर्नव भी

इस डिवाइस के मुख्य शोधकर्ताओं में भारतीय मूल के वैज्ञानिक अर्नव कपूर भी शामिल हैं। अर्नव ने इस डिवाइस को नाम दिया है ‘एल्टर इगो’ हेडसेट। उन्‍होंने बताया‍ कि इस डिवाइस को सिर पर पहना जा सकता है। एक बार आप किसी शख्स के सिर और चेहरे पर इस डिवाइस को लगा देंगे तो उसके बाद आप यह जान सकते हैं कि उस शख्स के दिमाग में क्या चल रहा है।

कैसे काम करती है यह डिवाइस ?

दरअसल यह डिवाइस एक कम्प्यूटर सिस्टम पर काम करती है जो किसी भी शख्स के दिमाग में हो रही हलचल को पहले एनालाइज़ करता है और उसके बाद इन्हें शब्दों में बदल देता है। दरअसल इस डिवाइस में इलेक्ट्रोड लगे होते हैं जो यूजर के जबड़े और चेहरे के संकेतों से उसके दिमाग में चल रहे न्यूरोमॉलिक्यूलर सिग्नल को आसानी से पकड़ लेते हैं। ये न्यूरोमॉलिक्यूलर सिग्नल तब पैदा होते हैं, जब हम अपने मन में कुछ सोच रहे होते हैं। इसके बाद इन तरंगों को शब्दों में बदलकर यह बता देते हैं कि सामने वाले के दिमाग में क्या चल रहा है।

क्‍या कहना है शोधकर्ताओं का ?

शोधकर्ताओं का मानना है कि अबतक मिले परिणाम काफी उत्‍साहजनक हैं और उनके अच्‍छे नतीजे मिल रहे हैं। उनका ये भी मानना है कि भविष्‍य में वे पूरी बातचीत को पढ़ सकने का लक्ष्य हासिल कर लेंगे। बता दें कि यह डिवाइस अभी परीक्षण के दौर में है। अर्नव की टीम का दावा है कि मौजूदा समय में इस डिवाइस की सत्‍यता 92 फीसदी है, जो गूगल के वायस ट्रांसक्रिप्‍शन से थोड़ी ही कम है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस डिवाइस का इस्तेमाल मुजरिमों से जुर्म क़ुबूल करवाने के लिए भी किया जा सकता है।

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