अब टीबी की होगी सटीक पहचान, वैज्ञानिकों ने खोजीं परीक्षण की नई विधियां

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नई दिल्‍ली। हर साल दुनियाभर में लगभग 20 लाख लोगों की मौत क्षयरोग (टीबी) के कारण हो जाती है। टीबी के प्रसार से बचने और रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए इस मर्ज की पहचान और उपचार महत्वपूर्ण है। अब वैज्ञानिकों ने टीबी परीक्षण के लिए कुछ ऐसी नई विधियां खोजी हैं, जिनकी मदद से इस रोग की सटीक ढंग से पहचान संभव हो सकेगी।

किसने विकसित की तकनीक ?

फरीदाबाद स्थित ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (THSTI) और नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के वैज्ञानिकों ने फेफड़ों और उसके आसपास की झिल्ली में टीबी के संक्रमण के परीक्षण के लिए नई विधियां विकसित की हैं।  परीक्षण की ये विधियां अत्यधिक संवेदनशील, प्रभावशाली और तेज हैं और इनकी सहायता से टीबी की बेहतर ढंग से पहचान की जा सकेगी।

कई प्रकार की टीबी

माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु के कारण होने वाला टीबी या क्षयरोग संक्रमित हवा में सांस लेने से एक-दूसरे में फैलता है। फेफड़ों की टीबी यानी पल्मोनरी टीबी क्षयरोग का एक आम रूप है, जिसमें जीवाणु फेफड़ों पर हमला करते हैं। हालांकि,  वर्ष 2016 में लगभग 15 प्रतिशत ऐसे नए मरीज सामने आए, जिनमें फेफड़ों के अलावा अन्य अंग भी टीबी से संक्रमित पाए गए। इसे एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी कहते हैं।

अभी कैसे होती है जांच ?

टीबी के विभिन्न रूपों की पहचान के लिए आमतौर पर सूक्ष्मदर्शी द्वारा बलगम की जांच (स्मीयर माइक्रोस्कोपी) और कल्चर जैसे परीक्षण किए जाते हैं। स्मीयर माइक्रोस्कोपी सरल और तेज विधि है, लेकिन यह कम संवेदनशील होती है। कल्चर परीक्षण अत्यधिक संवेदनशील विधि है, इसके बावजूद इस परीक्षण के परिणाम आने में 2 से 8 हफ्ते लग जाते हैं। परीक्षण के पारंपरिक तरीकों में कफ के नमूनों में जीवाणु युक्त प्रोटीन का पता लगाने के लिए एंटीबॉडीज का उपयोग किया जाता है। हालांकि,  इन परीक्षणों में विभिन्न रोगियों, उपचार की निर्धारित समय सीमा और लागत जैसी समस्याएं आड़े आती हैं। मौजूदा डीएनए-आधारित परीक्षण इसके लिए उतने शुद्ध परिणाम भी नहीं दे पाते हैं।

वैज्ञानिकों ने विकसित की हैं ALISA और ECS नामक दो नई परीक्षण विधियां

क्‍या है नई विधि ?

इन समस्याओं से निपटने के लिए ही वैज्ञानिकों ने हाल ही में एपटामर लिंक्ड इमोबिलाइज्ड सॉर्बेंट एसे (ALISA) और इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर (ECS) नामक डीएनए एपटामर-आधारित दो नई परीक्षण विधियां विकसित की हैं। एपटामर डीएनए, आरएनए या पेप्टाइड अणु होते हैं, जो अपनी अति संवेदनशीलता के कारण विशिष्ट आणविक स्थानों पर जाकर जुड़ते हैं। यही नहीं, उनमें उन स्थानों पर संलग्न दूसरे अनापेक्षित बंधनों को तोड़ने की विशिष्ट क्षमता भी होती है।

कैसे किया शोध ?

शोधकर्ताओं ने रिसर्च के दौरान कफ के 314 नमूनों का नई विकसित विधियों से परीक्षण किया और इनसे प्राप्त परिणामों की तुलना पारंपरिक एंटीबॉडीज आधारित निष्कर्षों से की। इनमें ALISA परीक्षण ने 92 प्रतिशत संवेदनशीलता प्रदर्शित की, जबकि एंटीबॉडीज आधारित विधि केवल 68 प्रतिशत संवेदनशील पाई गई। हालांकि, ALISA विधि से परिणाम आने में लगभग 5 घंटे लग गए। इसके बाद वैज्ञानिकों को सरलीकृत ECS परीक्षण विधि विकसित करने में सफलता मिली। इस विधि से महज 30 मिनट में परिणाम मिल जाते हैं। यह अत्यधिक संवेदनशील विधि है। इससे 91 प्रतिशत नमूनों में टीबी के जीवाणु का पता लगाया जा सकता है।

क्‍या कहना है वैज्ञानिकों का ?

शोध टीम में शामिल एम्स की प्रमुख शोधकर्ता जया त्यागी के अनुसार, ‘फुफ्फुसीय टीबी, फुफ्फुसीय झिल्ली टीबी और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाली मेनिंगिटिस टीबी के लिए एपटामर-आधारित जांच परीक्षण भारत जैसे देश के लिए लाभकारी साबित हो सकते हैं, जहां इस बीमारी से बड़ी संख्या में लोग ग्रस्त हैं। उनके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल किसी सपने की तरह है। ऐसी जगहों तक आसानी से ECS परीक्षण की सुविधा पहुंचाने के लिए एक मोबाइल स्क्रीनिंग वैन का उपयोग किया जा सकता है।’ शोध टीम की एक अन्‍य सदस्य सागरिका हल्दर का कहना है कि यदि डॉक्टर इलाज के लिए इस परीक्षण को अपनाते हैं तो फुफ्फुसीय झिल्ली से संबंधित टीबी के निदान में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है।

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