माहवारी के दौरान हुई इस मौत ने महिलाओं से भेदभाव पर फिर चर्चा गरमा दी है

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नई दिल्ली। देश भले विकसित हो रहा हो। भले ही लोग पढ़-लिख रहे हों, लेकिन जब बात महिलाओं की हो, तो उनकी दयनीय दशा अब भी बरकरार है। केरल के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं को कोर्ट के आदेश के बाद भी प्रवेश न करने देना इसी का एक नमूना है। तर्क दिया जा रहा है कि रजस्वला महिलाओं को अपने मंदिर में प्रवेश न करने देने का नियम खुद भगवान अयप्पा ने बनाया है। अब तमिलनाडु से एक ऐसी खबर आई है, जिसने माहवारी को लेकर महिलाओं से होने वाले भेदभाव का सबसे काला सच सामने ला दिया है।

तमिलनाडु में बीते दिनों “गज” नाम के तूफान ने भारी तबाही मचाई। तमाम लोगों की मौत इस तूफान की वजह से हुई, लेकिन राज्य के पुडुकोट्टई इलाके में एक लड़की की मौत ने माहवारी के दौरान लड़कियों से भेदभाव का नया रूप सामने ला दिया है। इस लड़की का पिता गरीब किसान है। लड़की को पहली बार माहवारी आई थी। उसे स्थानीय रुढ़ियों के मुताबिक घर से बाहर एक झोपड़ी बनाकर उसमें रहने को कहा गया। इसी दौरान तूफान आ गया और एक पेड़ झोपड़ी पर गिरने से लड़की की जान चली गई।

माहवारी के दौरान रूढ़ि की वजह से जान गंवाने की ये अकेली घटना शायद नहीं होगी। आज भी देश के तमाम हिस्सों में माहवारी आने पर लड़कियों को रोजमर्रा के कामकाज से अलग-थलग कर दिया जाता है। साथ ही उन्हें इस दौरान जिस असीम कष्ट को सहना होता है, उससे भी परिवार के लोग मतलब नहीं रखते।
साल 2017 में सैनिटरी प्रोटेक्शन, एवरी वूमेन्स हेल्थ राइट नाम की एक स्टडी हुई थी। इसमें पता चला था कि भारत में अभी भी 88 फीसदी महिलाएं माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करतीं। वो आज भी कपड़े, अखबारों या सूखी पत्तियों के जरिए माहवारी के दौरान खून का बहाव रोकने की कोशिश करती हैं। इसकी वजह सैनिटरी नैपकिंस का महंगा होना है।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक गांवों और कस्बों के स्कूलों में पढ़ने वाली कई बच्चियां माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जातीं। 23 फीसदी बच्चियों की उनके घरवाले माहवारी शुरू होने पर पढ़ाई छुड़वा देते हैं। सरकार ने हालांकि स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन बांटने की योजना चला रखी है, लेकिन दूर-दराज के गांवों तक ये योजना नहीं पहुंच सकी है और इस वजह से लड़कियों से भेदभाव जारी है।

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