जंगलों पर जिनका पहला हक, छत्तीसगढ़ में बेहाल हैं वही आदिवासी

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रायपुर। जंगल पर पहला हक किसका है ? इस सवाल का आदिकाल से जवाब है कि जंगल पर आदिवासियों का पहला हक है, लेकिन देश के सबसे ज्यादा जंगल वाले राज्य छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का बुरा हाल है। हालत ये है कि इस राज्य में हमेशा नेता कहते हैं कि आदिवासियों को उनका ये हक दिलाकर रहेंगे, लेकिन मध्यप्रदेश का हिस्सा रहने और बाद में अलग राज्य बनने के बाद भी छत्तीगढ़ के आदिवासी अपने इस हक से महरूम हैं।

महाराष्ट्र और ओडिशा में तो आदिवासियों को जंगल के हिस्से पट्टे पर देने का काम बेहतर तरीके से किया गया है, लेकिन छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को ये सौभाग्य हासिल नहीं हो सका है। यहां के 8 लाख 87 हजार 665 आदिवासियों ने जंगल की जमीन पर पट्टे के लिए आवेदन किया, लेकिन बांटे गए हैं सिर्फ 4 लाख 16 हजार 359 पट्टे। यानी कुल मांग का 53 फीसदी सरकारी तंत्र ने देने से इनकार कर दिया है।

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों कुल 27 लाख एकड़ जमीन के पट्टे मिले हैं। ये राज्य के 18 फीसदी वन क्षेत्र का महज 7.8 फीसदी है। ये हालत भी उस वक्त है कि आदिवासियों में साक्षरता की दर 2001 के 52.1 फीसदी के मुकाबले अब करीब 60 फीसदी है, लेकिन पढ़ा-लिखा होने भर से सरकारी तंत्र के नियम-कायदों की जाल से निकल पाना उनके लिए मुश्किल होता है और इस वजह से छत्तीसगढ़ के ज्यादातर आदिवासियों के पास गुजर-बसर करने के लिए जमीन नहीं है।

आदिवासियों को जंगल की जमीन पर हक दिलाने के लिए छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन नाम की एक समिति काम कर रही है। समिति के संयोजक आलोक शुक्ला ने इंडियास्पेंड डॉट कॉम को बताया कि अब तक 15 लाख लोगों को जंगल की जमीन का पट्टा मिल जाना चाहिए था, लेकिन सरकारी तंत्र की उदासीनता ऐसा होने नहीं दे रही है।

छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस समेत सभी पार्टियों ने आज तक चुनाव में कभी आदिवासियों के जंगल पर हक की बात नहीं की है। इस बार कांग्रेस ने हालांकि अपने घोषणापत्र में जंगल पर आदिवासियों के हक संबंधी कानून के बारे में लिखा है, लेकिन कांग्रेस की पहले रही सरकारों ने भी उनके लिए कभी कुछ नहीं किया।

जंगलों पर हक की बात छोड़ दें, तो भी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए हालात ठीक नहीं हैं। स्वास्थ्य और विकास के सूचकांक की बात करें, तो ये भी उनके पक्ष में नहीं हैं। बस्तर में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में से करीब 16 फीसदी पौष्टिकता की कमी से जूझ रहे हैं। सरगुजा में ये आंकड़ा 7.1 फीसदी है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में खनन भी खूब होता है, लेकिन खनन का पट्टा लेने वाले आदिवासियों को इस काम में कम ही लेते हैं। 2013 के आंकड़े बताते हैं कि यहां के कुल खनन कार्य में 5 हजार 830 अनुसूचित जनजाति के लोगों को काम दिया गया था। वहीं, 14 हजार 760 पिछड़े वर्ग के लोगों को खनन के काम में रखा गया, लेकिन आदिवासियों में से सिर्फ 3 हजार लोगों को ही खनन के काम में रखा गया था।

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