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निमोनिया और डायरिया से भारत में हर दो मिनट में मरता है एक बच्चा

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नई दिल्ली। हालांकि, भारत ने बच्चों में निमोनिया और डायरिया की बीमारी को रोकने में सफलता हासिल की है, लेकिन हकीकत ये भी है कि आज भी यहां हर दो मिनट में एक बच्चा इन दोनों में से किसी एक बीमारी की वजह से जान गंवा रहा है।

भारत ने 2017 तक निमोनिया के मामले 84 फीसदी कम करने का लक्ष्य तय किया था। इसे वो 65 फीसदी तक हासिल कर सका है। वहीं, डायरिया यानी दस्त के मामलों को 82 फीसदी के लक्ष्य के मुकाबले 39 फीसदी तक हासिल किया गया है। साल 2016 में पांच साल की उम्र हासिल करने से पहले 2 लाख 61 हजार बच्चों की मौत निमोनिया या डायरिया से हुई थी। दुनिया के किसी देश में इतने बच्चों की मौत इन दो बीमारियों से नहीं हुई।

12 नवंबर को विश्व निमोनिया दिवस पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में हर दिन औसतन 735 बच्चों ने भारत में निमोनिया या डायरिया से जान गंवाई। यानी हर दो मिनट में एक बच्चे की मौत हुई। बता दें कि वैश्विक स्तर पर निमोनिया और डायरिया से पांच साल से कम उम्र के बच्चों में से एक-चौथाई की जान चली जाती है। दोनों बीमारियों को मिटाकर ही बच्चों की उम्र बढ़ाई जा सकती है।

निमोनिया और डायरिया से बचाने के लिए टीकाकरण का काम चल रहा है, लेकिन जॉन हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की रिपोर्ट कहती है कि टीकाकरण भले ही बेहतर हो, लेकिन जब किसी बच्चे को निमोनिया या डायरिया होता है, तो उसके इलाज पर ध्यान नहीं दिया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्तनपान, टीकाकरण, बच्चों की देखभाल, एंटीबायटिक का इस्तेमाल, ओआरएस घोल पिलाने और जिंक सप्लीमेंट्स देने से बच्चों की निमोनिया और डायरिया से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है।

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि साल 2015 से निमोनिया की रोकथाम के लिए दिए जाने वाले हेमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी यानी एचआईबी टीके लगाने का काम भारत में सिर्फ 8 फीसदी ही बढ़ा है। खतरनाक डायरिया को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रोटावायरस टीका सिर्फ 9 फीसदी ज्यादा बढ़ा।

वैसे, कुल मिलाकर डायरिया और निमोनिया की वजह से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले घटे हैं। आंकड़े बताते हैं कि साल 2000 से 2018 के बीच डायरिया से होने वाली मौतों में 69 फीसदी की गिरावट आई है। साल 2000 में डायरिया से 3 लाख 39 हजार 937 बच्चों की मौत हुई थी। जबकि, 2018 में ये संख्या घटकर 1 लाख 2 हजार 813 हो गई। वहीं, न्यूमोनिया से साल 2000 में 4 लाख 85 हजार 94 बच्चों ने जान गंवाई थी। 2018 में ये संख्या 1 लाख 58 हजार 176 यानी 67 फीसदी घट गई।

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